खरी-खरी: क्यों उठ रहे हैं राफेल सौदे पर गंभीर सवाल?

खरी-खरी: क्यों उठ रहे हैं राफेल सौदे पर गंभीर सवाल?

राफेल एक फ्रांसीसी कम्पनी 'दसाल्ट एविएशन' द्वारा निर्मित दो इंजन वाला मध्यम मल्टी रोल काम्बैट एयरक्राफ्ट (एम.एम.आर.सी.ए.) है। इस विमान में कई ऐसी विशेषताएं हैं जो इसे विश्व का बेहतरीन लड़ाकू विमान बनाने के लिए पर्याप्त हैं। यह हवाई हमला, वायु वर्चस्व, जमीनी समर्थन, भारी हमला, परमाणु प्रतिरोध इत्यादि कई प्रकार के कार्य बखूबी करने में सक्षम है। इसकी टैक्नोलॉजी बेहतरीन है। यह परमाणु मिसाइल ले जाने में भी सक्षम हैं। भारत के लिए इसे इसलिए भी महत्त्वपूर्ण माना गया है क्योंकि इस तरह के विमान अभी तक पड़ोसी देशों चीन और पाकिस्तान के पास भी नहीं हैं।

वर्ष 2001 में भारतीय वायुसेना द्वारा अतिरिक्त लड़ाकू विमानों की मांग की गई थी किन्तु लड़ाकू विमानों की वास्तविक प्रक्रिया सही मायनों में अगस्त 2007 में उस समय शुरू हुई जब तत्कालीन रक्षामंत्री ए.के. एंटोनी की अध्यक्षता वाली रक्षा अधिग्रहण परिषद ने 126 लड़ाकू विमान खरीदने की प्रक्रिया को हरी झंडी दी। यह तय हुआ कि इन 126 राफेल जेट फाइटर विमानों में से 18 विमान कम्पनी भारत को तुरंत देगी जबकि शेष 108 विमान कम्पनी के सहयोग से बेंगलुरू में 'हिन्दुस्तान एयरोनाटिक्स लिमिटेड' में असेम्बल किए जाएंगे जिसकी सारी तकनीक कम्पनी द्वारा भारत को सौंपी जाएगी। उस समय उस सौदे पर करीब 10.2 अरब डालर अर्थात् 54 हजार करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान था।

कुछ अड़चनों के कारण यह सौदा अटक गया और फिर 2012 में भारत सरकार और 'दसाल्ट एविएशन' के बीच पुन: इस सौदे को लेकर बातचीत की प्रक्रिया शुरू हुई तथा 13 मार्च 2014 को 'हिन्दुस्तान एयरोनाटिक्स लिमिटेड' तथा 'दसाल्ट एविएशन' के बीच 'वर्कशेयर एग्रीमेंट' पर हस्ताक्षर हुए।

10 अप्रैल 2015 को प्रधानमंत्री मोदी की फ्रांस यात्रा के दौरान अचानक इसी कम्पनी से कुल 36 राफेल विमान खरीदने की घोषणा की गई और 30 जुलाई 2015 को यूपीए सरकार द्वारा 126 विमानों की खरीद की डील को रद्द कर दिया गया। 30 सितम्बर 2016 को प्रधानमंत्री की घोषणा के अनुरूप 36 राफेल विमान खरीदने की डील नई शर्तों पर साइन हुई और वो भी 56 हजार करोड़ की कीमत पर। एक ओर जहां सरकार द्वारा पुराने सौदे को रद्द कर तीन गुना कीमत पर उन्हीं विमानों का सौदा किया गया, वहीं नई डील के मुताबिक एक भी राफेल विमान भारत में नहीं बनाया जाएगा जबकि पूर्ववर्ती सरकार द्वारा 108 विमान भारत में ही बनाए जाने थे जिससे उनकी लागत भी बहुत कम रह जाती और भारत में 'हिन्दुस्तान एयरोनाटिक्स लिमिटेड' में ही 108 विमान बनाए जाते जिससे इस टैक्नोलाजी का भारत को भरपूर लाभ मिलता। यूपीए सरकार द्वारा खरीदे जाने वाले एक विमान की कीमत जहां करीब 526 करोड़ रुपये आती, वहीं नए सौदे में यह कीमत 1570 करोड़ हो गई। डिफेंस वेबसाइट जेन्स के मुताबिक इसी कम्पनी द्वारा नवम्बर 2017 में यही 12 विमान कतर को बेचे गए जिनकी कीमत प्रति विमान करीब 693 करोड़ रुपये थी यानी भारत को दिए जा रहे विमान की कीमत से 877 करोड़ रुपये कम। आखिर भारत सरकार की वो कौन सी मजबूरी थी कि ये विमान इतनी महंगी कीमत पर खरीदने का सौदा हुआ और वो भी प्रधानमंत्री की फ्रांस यात्रा के दौरान आनन-फानन में?

राफेल सौदे को लेकर सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण सवाल यह भी उठ रहा है कि एक निजी कम्पनी को लाभ पहुंचाने के लिए भारत सरकार की कम्पनी 'हिन्दुस्तान एयरोनाटिक्सÓ को इस सौदे के दौरान नजरअंदाज कर दिया गया। 'हिन्दुस्तान एयरोनाटिक्स' एकमात्र ऐसी भारतीय कम्पनी है जिसे विमान बनाने का दशकों का अनुभव है किन्तु इस तथ्य को दरकिनार कर रिलायंस डिफेंस कम्पनी पर मेहरबानी दिखाई गई जबकि उसे इस क्षेत्र का कोई अनुभव ही नहीं है? वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण के अनुसार अम्बानी ने मार्च 2015 में रिलायंस डिफेंस का पंजीकरण कराया था और उसके महज दो सप्ताह बाद ही राफेल सौदे की 526 करोड़ की पुरानी डील को 1570 करोड़ रुपये प्रति विमान की डील में बदल दिया गया। सौदे के मुताबिक सरकार कम्पनी को प्रति विमान 1570 करोड़ का भुगतान करेगी जिसका 50 फीसदी विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के रूप में रिलायंस डिफेंस के पास पहुंच जाएगा।

यह देश का दुर्भाग्य ही है कि यहां अतीत में भी रक्षा सौदों को लेकर इसी तरह के सवाल, आरोप और विसंगतियां सामने आते रहे हैं जिस कारण रक्षा सामग्री खरीदने की प्रक्रिया में भी अनावश्यक विलम्ब होता रहा है जिसका सीधा प्रभाव देश की रक्षा तैयारियों पर पड़ता है। बहरहाल, आज दरकार इस बात की है कि सरकार ऐसे मामलों में एक ऐसी पारदर्शी व्यवस्था विकसित करे, जिसके चलते भविष्य में विशेषकर रक्षा सौदों को लेकर किसी तरह के सवाल न खड़े हो सकें और जनता तथा सेना का भरोसा टूटने न पाए।

- योगेश कुमार गोयल

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