स्विस बैंकों में भारतीयों की जमाराशि में आए उछाल से उभरे कतिपय महत्त्वपूर्ण सवाल

स्विस बैंकों में भारतीयों की जमाराशि में आए उछाल से उभरे कतिपय महत्त्वपूर्ण सवाल

जब कालेधन पर चोट के बाद भारतीयों द्वारा सिंगापुर और हांगकांग जैसे फाइनेंशियल हब की ओर रुख किया गया हो, तब स्विस बैंकों में भारतीयों का जमा धन महज एक साल में ही डेढ़ गुना बढ़ जाना कई सवाल खड़े करता है। ऐसा इसलिए भी कि स्विस बैंकों में भारतीयों की जमाधनराशि में वर्ष 2014 से 2016 तक लगातार गिरावट दर्ज की गई थी जो 2016 में 45 प्रतिशत तक घटा था लेकिन 2017 में जिस तरह से इसमें 50.2 प्रतिशत का अप्रत्याशित उछाल आया, उससे लोगों के कान खड़े हो गए हैं।
चर्चा है कि कालेधन पर समग्र चोट की हुई तमाम सरकारी कोशिशों के बावजूद भी यदि ऐसा सम्भव हुआ है, तो स्पष्ट है कि सरकार की प्रशासनिक कोशिशों में कहीं न कहीं कोई बड़ी चूक अवश्य रह गई होगी जिसका फायदा करचोरों को मिल रहा है क्योंकि कालेधन पर गठित एसआईटी के अलावा वित्तीय खुफिया यूनिट, आयकर विभाग, ईडी समेत तमाम एजेंसियां भी आपसी तालमेल से कालेधन के खिलाफ लगातार कार्रवाई कर रही हैं लेकिन हकीकत क्या है, इस बात की चुगली स्विट्जरलैंड नेशनल बैंक (एसएनबी) के ताजा आंकड़े कर रहे हैं।
दरअसल, ये आंकड़े तब जारी किए गए हैं जब कुछ महीने पहले ही भारत-स्विट्जरलैंड के बीच सूचनाओं के स्वत: आदान-प्रदान की व्यवस्था लागू की गई है। लिहाजा, सीधा सवाल है कि स्विस बैंकों में भारतीयों के जमाधन सिर्फ एक वर्ष 2017 में ही 50.2 प्रतिशत कैसे बढ़े क्योंकि इससे पूर्व वर्ष 2004 में 56 प्रतिशत और 2013 में 43 प्रतिशत की अप्रत्याशित वृद्धि हुई दर्ज थी जबकि 2011 में मात्र 12 प्रतिशत की ही बढ़ोत्तरी दर्ज हुई थी।
जानकारों का कहना है कि सिक्युरिटीज और अन्य मदों में स्विस बैंकों में जमा भारतीय रकम अरबों रुपए में हुआ करती थी लेकिन भारतीय नियामकों की सख्ती के बाद उसमें गिरावट आनी शुरू हुई जो वर्ष 2006 में घटकर महज 23,000 करोड़ रुपए रह गई जो अबतक का सबसे उच्च स्तर था लेकिन बीते एक दशक में ही इसमें 90 प्रतिशत की गिरावट आई है जिससे यह महज 7000 करोड़ रुपए तक सिमट चुकी है हालांकि ताजा बढ़त जारी रही तो अगले कुछ सालों में स्थिति फिर से पुराना रुख भी अख्तियार कर सकती है।
खास बात यह कि 2004 में हुई भारी बढ़ोत्तरी के दौरान भी कुछ महीनों तक बीजेपी की ही सरकार केंद्र में थी, और 2017 में भी उसी की सरकार रही, जो अब भी सत्तारूढ़ है जबकि 2013 में कांग्रेस की सरकार थी, इसलिए आशंका है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि कालाधन के खिलाफ सक्रिय अधिकारी वर्ग छोटी-छोटी मछलियों को तो फंसा रहा है लेकिन निज स्वार्थ वश बड़ी-बड़ी मछलियों को छुट्टा छोड़ दे रहा है जिसके ताजा परिणाम और प्रथमदृदृष्टया साक्ष्य, दोनों सामने नजर आए हैं।
यह बात दीगर है कि महज स्विस बैंक में रकम जमा होने भर से ही इसे कालाधन नहीं करार दिया जा सकता इसलिए इसकी व्यापक जांच-पड़ताल तो होनी ही चाहिए। इसके अलावा, सिंगापुर और हांगकांग जैसे फाइनेंशियल हब में भी भारतीयों के कितने रुपए जमा हैं, इस बात के भी आंकड़े लोगों से साझा किए जाने की जरूरत है ताकि कालेधन से जुड़ी सच्चाई स्वत: ही सामने आ जाए। समझा जा रहा है कि स्विस बैंकों में सूचना साझा करने के दबाव के बाद कालेधन के जमाखोर कर चोरी के अन्य पनाहगाहों की ओर रुख कर रहे हैं और सिंगापुर एवं हांगकांग जैसे देशों के मुकाबले भारतीयों की जमा रकम स्विस बैंकों में अब काफी कम है जिसकी उचित छानबीन देश की आर्थिक सेहत के लिए जरूरी है।
दरअसल, संदिग्ध लेनदेन की सूचना पर स्विट्जरलैंड ने भारत को उसके नागरिकों के खाते के बारे में जानकारी देना तो शुरू कर दिया है, इसलिए स्विस बैंकों में भारतीयों द्वारा जमा की गई बड़ी रकम का ताजा आंकड़ा बेहद चौंकाने वाला है क्योंकि भारत पिछले कुछ वर्षों से दुनियाभर में भारतीयों द्वारा छुपाए गए कालेधन को वापस लाने की लगातार कोशिशें कर रहा है। यही वजह है कि भारत और कई अन्य देशों के द्वारा घपले-घोटालों के साक्ष्य मुहैय्या करवाने के बाद स्विट्जरलैंड ने विदेशी ग्राहकों की अद्यतन जानकारी देनी शुरू कर दी है जिसके तहत ताजा जानकारी मिली है लेकिन उछाल वाली बात तो कुछ और ही इशारे कर रही है।
लिहाजा, इस पर भी कतिपय सवाल उठना लाजिमी है क्योंकि ताजा आंकड़ा बेहद चौंकाने वाला है। सीधा सवाल है कि लगातार तीन वर्षों की लगातार गिरावट के बाद यदि पिछले साल 2017 में भारतीयों की जमा राशि में जो अप्रत्याशित उछाल पाया, देखा गया, उसका मौलिक कारण क्या है? क्या कालेधन पर किए गए विभिन्न तरह के कुठाराघातों का भी कोई असर ऐसे लोगों की मानसिकता पर नहीं पड़ा है या फिर बात कुछ और है जिसे समझना हर नागरिक के लिए जरूरी है।
यक्ष प्रश्न है कि जब देश के आम नागरिकों की अर्थव्यवस्था नोटबन्दी और जीएसटी के दुष्प्रभाव से तबाह हो चुकी है, तब वर्ष 2016 में स्विस बैंकों में जमा धनराशि जो घटकर महज 4500 करोड़ रुपए रह गई थी, वो 2017 में अचानक बढ़कर 7000 करोड़ रुपए कैसे हो गई? क्या नोटबन्दी के दौरान हुई परोक्ष लूट-खसोट और जीएसटी से भी बच निकलने के लिए ईजाद किए गए चोर दरवाजे से मिले अप्रत्याशित लाभ से ऐसा हुआ है, या फिर कुछ अन्य कारक भी इस स्थिति के लिए जिम्मेवार हैं।
शायद यह बदलते वक्त का तकाजा है कि कालाधन प्रवाह और उससे निबटने के सरकारी तौर-तरीकों पर एक बार फिर से तल्ख सवाल उठने लगे हैं, क्योंकि 2016 की नोटबन्दी और 2017 की जीएसटी जैसे सख्त वित्तीय उपायों को लागू करने के बाद भी जब यह हाल है, तो पहले क्या स्थिति रही होगी, सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
हालांकि, यह अजीबोगरीब स्थिति है कि एक तरफ कतिपय भारतीय बैंक घाटे में चल रहे हैं तो दूसरी ओर स्विस बैंकों में विदेशी दौलत बेहिसाब तौर पर बढ़ी है। इससे उसका लाभ भी बढ़ा है। आखिरकार भारत भी वैसी नीतियां क्यों नहीं बनाता जिससे दूसरे देशों के कर चोर अपना कालाधन हमारे यहां सुरक्षित रखें और उनकी पूंजी का सदुपयोग कर हमलोग मालामाल हो जाएं। एक आंकड़े के मुताबिक एसएनबी में विदेशी दौलत वर्ष 2017 में 1.46 लाख करोड़ स्विस फ्रैंक यानी कि 100 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच चुकी हैं। इसी वित्तीय वर्ष में उसके मुनाफे में 25 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है जो 9.8 अरब फ्रैंक हो गया है जबकि विदेशी ग्राहकों की जमा में गिरावट आई है। इससे पहले के वित्तीय वर्ष में यह मुनाफा मात्र 7.9 अरब फ्रैंक रह गया था।
यह ठीक है कि टैक्स हैवेन देशों में बेईमान भारतीयों के लिए कई और चोर दरवाजे भी खुल चुके हैं जिससे कर चोरों की चांदी है। इसलिए उनकी वास्तविक संख्या और अनुमानित राशि का महज अनुमान ही लगाया जा सकता है, लेकिन भरोसेमंद आंकड़े कैसे लोगों तक पहुंचे, यह देखना और उपाय करना सरकार का काम है जिसमें वह अब भी पूरी तरह से सफल प्रतीत नहीं हो पा रही है।
-नरेंद्र देवांगन

Share it
Top