विश्लेषण: रोजगार के अवसर बढ़ाने पर ध्यान दे सरकार

विश्लेषण: रोजगार के अवसर बढ़ाने पर ध्यान दे सरकार

देश में बढ़ रही बेरोजगारी को लेकर चिंता की लकीरें युवाओं के चेहरों पर हैं तो सरकार भी कम चिंतित नहीं है। वैसे रोजगार और स्वरोजगार का विवाद ऐसा मुद्दा है जिस पर कुछ भी ठोस रूप से जांच परख कर नहीं कहा जा सकता है। दरअसल रोजगार को लेकर कोई तथ्य परख सौ फीसद पुष्ट आंकड़ा ही नहीं है। सरकार के दावे और विपक्ष के आरोपों के बीच लड़ाई फिसलन भरी जमीन पर लड़ी जा रही है।
तेजी से बढ़ती युवा आबादी को रोजगार देना सरकार के लिए चुनौती बनता जा रहा है, वहीं देश की औसत आयु में बढ़ोत्तरी के कारण सेवानिवृत्ति की आयु सीमा बढ़ाने की मांग भी तेज होती जा रही है। चिकित्सा सेवाओं में सुधार की बदौलत आज रिटायर होने के बाद भी लोगों के पास काफी लंबा जीवन होता है और उनका स्वास्थ्य भी काम करने के लायक रहता है, इसलिए वे चाहते हैं कि उन्हें कुछ और बरस काम करने दिया जाए।
8 अप्रैल 2015 को प्रधानमंत्री ने मुद्रा योजना लांच करते हुए कहा था, 'बड़े-बड़े उद्योग सिर्फ एक करोड़ 25 लाख लोगों को रोजगार देते हैं, 5 करोड़ 70 लाख छोटे व मझोले उद्यमी 12 करोड़ लोगों को रोजगार देते हैं।'
श्रम संसार पहले ही रोबोट से त्रस्त था। रोबोट द्वारा अधिकाधिक कार्य जैसे असेंबली लाइन पर कारों का निर्माण किया ही जा रहा था। अब कंप्यूटर द्वारा बौद्धिक कार्यों को भी किया जाने लगा है। इसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई कहते हैं। जैसे यदि आपको कोर्ट में कोई मामला दायर करना हो तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्रोग्राम से आप जान सकते हैं कि उसी संबंध में कौन से पूर्व निर्णय दिए गए हैं। पूर्व में यह काम वकीलों द्वारा किया जाता था। अब एक सॉफ्टवेयर द्वारा किया जा सकता है।
सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने के लिए तर्क दिया जाता है कि नए तौर पर नियुक्त लोगों को काम करने योग्य बनाने से पहले प्रशिक्षित करने की जरूरत होती है जबकि सेवारत लोग पहले से प्रशिक्षित होते हैं और उन्हें लंबा अनुभव भी होता है। इन्हीं दलीलों के चलते चिकित्सा, शिक्षा, अनुसंधान से संबंधित विभागों में तो सेवानिवृत्ति की आयु सीमा बढ़ा दी गई है जबकि कुछ अन्य क्षेत्रों में विचार हो रहा है। इसके रास्ते में यदि कोई रूकावट है तो वह बेरोजगार युवाओं की बढ़ती संख्या है जिसे लंबे समय तक नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।
रोबोट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सीधा प्रभाव है कि श्रमिक की जरूरत कम होगी और रोजगार घटेंगे लेकिन दूसरी ओर इन तकनीकों से रोजगार के नए अवसर भी बनेंगे जैसे कंप्यूटर के माध्यम से ई-कॉमर्स को बढ़ावा मिला है। छोटे किराना दुकानदार भी इंटरनेट के जरिए ग्राहकों से ऑर्डर लेकर उनके घर पर माल पहुंचा रहे हैं। उनका कारोबार बढ़ा है। इसी तरह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से विधिक शोध करने से ज्यादा संख्या में मामले दायर किए जा सकेंगे जिन्हें निपटाने के लिए ज्यादा वकीलों की जरूरत पड़ेगी।
सरकार की मुद्रा योजना से अब तक 12 करोड़ से अधिक उद्यमियों को लाभ मिल चुका है। मोदी सरकार ने आम बजट 2018-19 में एमएसएमई श्रेणी की कंपनियों को बड़ी राहत दी। सरकार ने उन कंपनियों के लिए कारपोरेट टैक्स की दर 30 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत करने की घोषणा की जिनका सालाना टर्नओवर 2016-17 में 250 करोड़ रूपए तक था। सरकार के इस निर्णय से सूक्ष्म, लघु और मध्यम श्रेणी की शत प्रतिशत कंपनियों को लाभ मिला।
ध्यान दें कि आय बढऩे के बाद भी रोटी तो पूर्ववत उतनी ही खाई जाती है लेकिन ब्यूटीशियन, नर्सरी टीचर, गेम्स टीचर आदि सेवाओं की खपत ज्यादा बढ़ी है। इस प्रकार रोबोट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दो विपरीत प्रभाव हमारे सामने आते हैं। एक ओर सीधे रोजगार का हनन तो दूसरी ओर नए क्षेत्रों में रोजगार में वृद्धि। जानकारों के बीच सहमति नहीं है कि इन दोनों में से कौन सा प्रभाव ज्यादा कारगर होगा। एक अध्ययन के अनुसार 48 प्रतिशत जानकार मानते हैं कि रोजगार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा जबकि 52 प्रतिशत मानते हैं कि रोजगार पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
कुछ लोगों का मानना है कि देश की बढ़ती औसत आयु और सेवारत लोगों की काम करते रहने की इच्छा भी रोजगार के अवसर घटा रही है। यह एक नई तरह की चुनौती है जिससे निपटने के लिए तरह-तरह के उपाय सुझाए जा रहे हैं। पारंपरिक सोच कहती है कि लोग समय पर सेवानिवृत्त हों और उनके स्थान पर बिना देरी के नए लोगों को नौकरी मिले जबकि नई सोच रोजगार के नए अवसरों के सृजन की वकालत करती है। बहरहाल, जहां-जहां सेवानिवृत्ति की आयु सीमा में बढ़ोत्तरी की जा रही है, वहां-वहां रोजगार के अवसर बढ़ाने पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
कौशल विकास को अलग मंत्रलय बनाकर मोदी सरकार ने यह मंशा स्पष्ट कर दी थी कि वह रोजगार को लेकर गंभीर है, खासकर तब जबकि भारत में प्रशिक्षित कामगारों का आंकड़ा मात्र 2.3 प्रतिशत है पर यह बहुत परवान चढ़ती नहीं दिखी बल्कि कौशल विकास खुद कौशल के अभाव में विवादों में भी घिरा रहा। सरकारी विभागों में पनप रही नई कार्य संस्कृति भी चिंताजनक है जिसमें कर्तव्यनिष्ठा और लगन का अभाव दिखता है। अब तो जहां-जहां संभव है सरकारी विभाग अपना ज्यादा से ज्यादा काम प्राइवेट क्षेत्र से कराने लगे हैं।
आने वाले समय में हर व्यक्ति को रोजगार उपलब्ध कराना एक तरह से असंभव होगा। इस परिस्थिति के दो परिणाम हो सकते हैं। यदि हम बेरोजगारों को सार्थक दिशा में मोड़ ले गए तो यह एक स्वर्णिम युग का उदय होगा लेकिन यदि हम उन्हें सार्थक दिशा नहीं दे सके तो यह हमारे लिए भयंकर स्थिति पैदा करेगा। बेरोजगार लोग अपराध की राहत पकड़ सकते हैं।
-नरेंद्र देवांगन

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