आर्थिक चर्चा: इंडिया की तुलना में भारत अभी भी समृद्ध है

आर्थिक चर्चा: इंडिया की तुलना में भारत अभी भी समृद्ध है

स्वतंत्रता प्राप्त के उपरान्त से ही देश में सीमाओं के बंटवारे के अतिरिक्त एक और प्रकार का बंटवारा भारत में देखा जा रहा है, वह है इण्डिया व भारत के रुप में। इण्डिया के रुप में शहरी व महानगर संस्कृति है तथा बड़े बड़े शहरों की अपनी ही संस्कृति विकसित हो गयी है जबकि भारत के रुप में छोटे छोटे शहर कस्बे व ग्रामीण सभ्यताएं हैं व उनकी अपनी संस्कृति व संस्कार विकसित हुए हैं। एक व्यक्ति जो महानगरों में पला बढ़ा है, वह देश के किसी भी गांव को हीन नजरों से देखता है तथा वहां वह कभी भी जाना व बसना ही नहीं चाहता जबकि ग्रामीण परिवेश में पले बढ़े युवक व युवतियों को बड़े शहर माफिक नहीं आ पाते हैं।
इण्डिया व भारत में आर्थिक समृद्धि भी बंट गई है परन्तु तेजी से बदलते इस विकास के युग में देखा यह जा रहा है कि ग्रामीण क्षेत्र में भी करोड़पति अमीर परिवारों की संख्या बढ़ी है जबकि वहंा रहने वाले अधिसंख्य जनसंख्या गरीब ही रह गई है। एक तरफ ग्रामीण अमीरों को आय कर मुक्त करोड़ें रुपयों की कृषि आय फार्म हाउस संस्कृति से प्राप्त हो रही है तो दूसरी तरफ छोटे छोटे किसान पारिवारिक जमीनी बंटवारे के कारण निरन्तर न्यून होती जमीन से न्यून होती आय का दंश झेल रहे है जिस कारण उनकी आय का अधिकांश हिस्सा मुकदमे, बीमारी, झूठी शानो शौकत के दिखावे में व्यर्थ ही व्यय हो जाता है और वे गरीब के गरीब ही रह जाते हैं।
एन. सी. ए. ई. आर. ने अमीर भारत विषय पर किये अपने सर्वेक्षण में बड़े ही चौंकाने वाले निष्कर्ष निकाले हैं। देश में करीब 20,000 करोड़पति व अरबपति परिवार निवास करते हैं। दिल्ली व मुम्बई अभी भी आर्थिक समृद्धि के केन्द्र बने हुए हैं तथा इन करोड़पति व अरबपति परिवारों में से आधे अभी भी इन दो शहरों में निवास करते हैं। कोलकाता इस मामले में कहीं पीछे छूट गया है तथा वहां 525 करोड़पति व अरबपति परिवार ही रह गये हैं। बंगलौर में 137 तथा हैदराबाद में 226 करोड़पति व अरबपति परिवार रहते हैं।
इस सर्वे के निष्कर्ष के अनुसार भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले करोड़पति व अरबपति परिवारों की संख्या शहरों में रहने वाले करोड़पति व अरबपति परिवारों से कहीं अधिक है जिससे इस मान्यता को ठेस लगती है कि धन कमाना है तो बड़े शहरों की ओर पलायन किया जाना चाहिए। हरियाणा जैसे छोटे राज्य में एक करोड़ रुपये से अधिक वार्षिक आय के सहारे बने करोड़पति व अरबपति परिवारों की संख्या 482 है जिसने बंगलौर के करोड़पति व अरबपति परिवारों की संख्या को पीछे छोड़ दिया है। पंजाब में भी ग्रामीण व 5 लाख से कम आबादी वाले शहरों में 501 करोड़पति व अरबपति परिवार निवास करते है जिनके प्रत्येक सदस्य की आय एक करोड़ रुपये वार्षिक से अधिक है तथा पंजाब ने मैट्रो शहर जैसे कोलकाता, बंगलौर व हैदराबाद को पीछे छोड़ दिया है। महाराष्ट्र में 295 करोड़पति व अरबपति परिवार निवास करते है जबकि गुजरात में ग्रामीण क्षेत्रों में भी 187 करोड़पति व अरबपति परिवार रहते हैं। हरियाणा व पंजाब के ग्रामीण व छोटे शहरों में रहने वाले करोड़पति व अरबपति परिवारों का घनत्व बगंलौर या कोलकाता के घनत्व से कहीं अधिक है।
विपणन कार्य में लगे कारपोरेट क्षेत्र में इस बात को अचम्भे से देखा जा रहा है कि एक चौथाई कार ऋण उन लोगों के द्वारा लिए गये हैं जिन्होंने कभी भारत के 20 बड़े शहरों में रहने की कोशिश भी नहीं की। वर्ष 2003-04 में चार पहियों वाली गाडिय़ों की एक तिहाई मांग भारत के 20 बड़े शहरों के बाहर मांगी जा रही है। वर्ष 2003-04 में ही भारत के 60 बड़े शहरों के बाहर कुल मांगी गई कारों का 36 प्रतिशत से अधिक था जिसमें निरन्तर वृद्धि होती जा रही है। छोटे छोटे शहरों व ग्रामीण क्षेत्र में करोड़पति व अरबपति परिवारों की संख्या में आश्चर्यजनक रुप से बढ़ोत्तरी हुई हैं। वर्ष 1995-96 में महाराष्ट्र के नागपुर जैसे बड़े नगर में कुल 9 करोड़पति व अरबपति परिवार थे जबकि पांच वर्ष के उपरान्त ही वर्ष 2001-02 में 25 करोड़पति व अरबपति परिवार हो गये तथा 50 लाख रुपये से एक करोड़ रुपये की वार्षिक आय वालों की संख्या 23 गुनी की दर से 29 से बढ़ कर 707 हो गई। नागपुर अब प्रमुख औद्योगिक नगर का स्थान प्राप्त करता जा रहा है।
अब जरा उत्तरप्रदेश में किसानों की स्थिति का अवलोकन करें। उत्तरप्रदेश जहां गंगा- यमुना नदियों द्वारा सिंचित व उर्वरक बनाई हुई भूमि है, वहां अधिकांश किसान परिवार ऋणग्रस्त हैं। 17.6 मि. किसान परिवारों में से 6.9 मि. परिवार जो कुल परिवारों में से 40.3 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करते हैं, में औसत रुप से प्रति परिवार 6706 रुपये के ऋण से ग्रस्त हैं। किसानों की ऋणग्रस्तता के विषय में कराये गये एक राष्ट्रीय सर्वे में यह तथ्य प्रकाश में आया। बिहार जो घोर गरीबी व दरिद्रता से ग्रस्त है, राजस्थान जो बार बार सूखे की मार झेलता है, मध्यप्रदेश जो कृषि क्षेत्र में बहुत पिछड़ा है, की तुलना में उत्तरप्रदेश में किसानों की ऋणग्रस्तता अधिक है। उत्तरप्रदेश के बाद आन्ध्रप्रदेश में 4.9 मि. तथा महाराष्ट्र में 3.6 मि. परिवार ऋणग्रस्त है।
देश के विभिन्न राज्यों में किसानों की ऋणग्रस्तता जानने के लिए नेशनल सेम्पल सर्वे आरगेनाइजेशन (एन एस एस ओ) द्वारा करवाये गये राष्ट्रीय सर्वे के अनुसार सम्पूर्ण देश में उत्तरप्रदेश के किसान ऋणग्रस्तता में सबसे आगे है। बढ़ती हुई ऋणग्रस्तता के कोढ़ में खाज यह हो गई है कि 27 प्रतिशत परिवारों का कृषि से ही मोहभंग हो चुका है क्योंकि खेती करना अब लाभदायक नहीं रहा है तथा 40 प्रतिशत परिवार चाहते हैं कि यदि उन्हें अवसर मिले तो वे खेती करना छोड़ सकते हैं। ऋणग्रस्त आधे परिवार ऐसे है जिन्होंने पूंजी तथा चालू खर्चों को पूरा करने के लिए ऋण लिया तथा प्रति 1000 रुपये के ऋण में से 609 रुपये ऐसे व्यय के थे। विवाह व अन्य परिवारिक संस्कारों को निपटाने के लिए प्रति 1000 रुपये के ऋण में से 118 रुपये व्यय कर दिये गये जबकि बिहार में यह 229 रुपये तथा राजस्थान में 176 रुपये हैं।
किसानों ने जहां बैंकों, सहकारी समितियों, व्यापारियों, मित्रों व रिश्तेदारों से ऋण लिया वहीं बड़ी संख्या में पेशेवर साहूकारों से भी ऋण लिया है। एक प्रतिशत से भी कम किसान परिवार पंजीकृत किसान संगठनों के सदस्य हैं तथा अधिकांश किसान नई नई खेती करने के तरीकों से अनभिज्ञ हैं। उत्तरप्रदेश में सहकारिता आन्दोलन लगभग असफल ही हो चुका है।
अत: भारत में कृषि के नाम पर कुछ बड़किसान तो आयकर मुक्त कृषि आय का लाभ उठा कर करोड़पति व अरबपति परिवारों की श्रेणी में आते जा रहे हैं जबकि दूसरी तरफ छोटे किसानों का आर्थिक उत्थान किसी भी प्रकार से नहीं हो पा रहा है। ग्रामीण भारत अभी भी राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, व सामाजिक रुप से शहरी इण्डिया से बहुत समृद्ध है, केवल सरकार व अन्य संगठनों द्वारा ग्रामीण भारत पर अघिक ध्यान देने की आवश्यकता है। फिर भारत की आर्थिक समृद्धि को कोई नहीं रोक पायेगा व भारत विश्व में एक शक्ति बन कर उभरेगा।
- डा. सूर्य प्रकाश अग्रवाल

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