मुद्दा: दुराचार पर सजा-ए-मौत का शिकंजा?

मुद्दा: दुराचार पर सजा-ए-मौत का शिकंजा?

नाबालिग बेटियों पर बढ़ती बलात्कार की घटनाओं से पूरा देश हिल गया है। उन्नाव और कठुआ की घटना के बाद देश की छवि को विदेशों में भी नुकसान पहुँचा। संयुक्तराष्ट्र संघ ने भी इन घटनाओं को गम्भीरता से लिया। दिल्ली महिला आयोग की स्वाति पालीवाल को अनशन पर बैठना पड़ा।
सोशल मीडिया और मीडिया में इन घटनाओं को लेकर सरकारों को कटघरे में खड़ा होना पड़ा है जिसकी वजह से केंद्र की मोदी सरकार ने 2012 में बने पास्को एक्ट में कई अहम बदलाव किये हैं। नए कानून के मुताबिक 12 साल की मासूम बच्चियों को हवस का शिकार बनाने वाले दोषियों को मौत की सजा मिलेगी। कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद मानसून सत्र में इसे पेश किया जाएगा। पास्को यानी प्रोटेक्शन आफ चिल्ड्रेन फ्राम सेक्सुअल अफेंसेस एक्ट। निर्भया कांड के बाद लैंगिक उत्पीडऩ से बच्चों को बचाने के लिए बनाया गया था।

सवाल उठता है कि क्या पहले बने कानून पर्याप्त नहीं थे। क्या फांसी जैसे कानून से बलात्कार थम जाएगा। खैर, अभी इस पर कुछ कहना जल्दबाजी होगी। कानून से किसी समस्या का हल नहीं निकल सकता। देश में इसके पहले भी बलात्कार मामले में 14 साल पूर्व कोलकाता के धनंजय चटर्जी को अलीपुर जेल में फांसी दी गई थी। उस पर कालेज की एक छात्र से बलात्कार का आरोप था। इस मामले में 20 साल मुकदमा चला था। बाद में 2004 में फांसी दी गई थी लेकिन इसके बाद भी देश में बलात्कार की घटनाएं कम नहीं हुईं लेकिन कठोर कानून के अलावा सरकार और समाज के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता है। दुनिया भर में फांसी की सजा का विरोध किया जा रहा है जबकि हम उसी तरफ बढ़ रहे हैं।
सरकार ने पास्को में जो संशोधन किया है, उसके मुताबिक नए कानून में 12 साल की बच्चियों से रेप पर फांसी की सजा का प्रावधन किया गया है जबकि 16 साल से कम उम्र की लड़की से गैंगरेप पर उम्रकैद की सजा दी जाएगी। वहीं 16 साल से छोटी लड़की से बलात्कार साबित होने पर कम से कम 2० साल तक की सजा दी जा सकेगी। मामलों में कोर्ट को 6 महीने के अंदर अपना फैसला सुनाना होगा।
नए संशोधन के तहत रेप केस की जांच दो महीने में पूरी करनी होगी। इसके अलावा दोषी को अग्रिम जमानत भी नहीं मिलेगी। एफआईआर विलम्ब से दर्ज करने वाले अफसरों पर भी कारवाई होगी। इसके अलावा नए कानून में किसी महिला से बलात्कार पर अब सात साल के बजाय 10 साल की सजा मिलेगी हालांकि इस कानून से एक उम्मीद जगी है।
सवाल उठता है कि बालिग बेटियों और महिलाओं के साथ बलात्कार पर भी इसी तरह कठोर कानून की जरूरत है हालांकि इसमें कई समस्याएं भी आएंगी। कभी - कभी आपसी रंजिश में भी झूठे आरोप मढ़ दिए जाते हैं जिसमें निर्दोष व्यक्ति फंसता है लेकिन फांसी तो सभी बलात्कार केसों में होनी चाहिए। समाज के लिए यह अभिशाप है। बालिग होने की स्थिति में लचर कानून का फायदा उठा आरोपी बच सकता है। अदालत में मामला उलझ सकता है। उस स्थिति में होने वाले हर बलात्कार पर फांसी की सजा होनी चाहिए। दूसरी बात, कानून में फर्जी आरोप के खिलाफ भी सख्त सजा होनी चाहिए वरना इस कानून का दुरूपयोग भी हो सकता है। नए संशोधन में यह प्रावधान भी किया जाय की जाँच में मामला अगर फर्जी पाया गया तो आरोप लगाने व्यक्ति के खिलाफ भी कड़ी सजा होनी चाहिए।
सरकार के नए कानून से कुछ उम्मीद जगी है क्योंकि इस तरह के मामलों में जितनी शीघ्र सुनवाई होगी, सजा उतनी तेज मिलेगी जिससे दुराचार में शामिल लोगों में भय पैदा होगा। छोटे स्तर पर भी जाँच सुविधाएं उपलब्ध करानी होगी। सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट की संख्या बढ़ानी होगी। पुलिस थानों में त्वरित कार्रवाई के लिए अलग से सेल गठित करना होगा। इसके अलावा चाहिए कि सरकार कानून के अलावा बलात्कार के आरोपियों की भी मानसिक रिपोर्ट तैयार कराए। उनसे सवालों के आधार पर नतीजे निकाले जाएं कि आखिर उनके अंदर इस तरह की सोच क्यों और कैसे पैदा हुईं। इस तरह के अध्ययन से भी काफी मदद मिल सकती है।
अभी तक पाक्सो कानून के तहत गंभीर मामलों में आजीवन कारावास तक की सजा का ही प्रावधान था है। इसमें न्यूनतम सजा सात साल की है। दिसंबर 2012 में हुए निर्भया रेप केस के बाद तत्कालीन केंद्र सरकार ने कानून में संशोधन किया और रेप के बाद महिला की मृत्यु होने की स्थिति में या फिर कोमा जैसी स्थिति में चले जाने पर मौत की सजा का प्रावधान अध्यादेश के जरिये किया गया। बाद में इसे कानूनी जामा पहना दिया गया। राजस्थान , मध्यप्रदेश, हरियाणा व अरुणाचल में बलात्कार साबित होने पर फांसी का कानून है।
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के ताजा आंकड़ों में बताया गया कि 2013 से 2016 के दौरान तीन वर्षों में बच्चों के खिलाफ अपराध की घटनाओं में 84 प्रतिशत की वृद्धि हुई और इनमें से 34 प्रतिशत यौन उत्पीडऩ के मामले हैं। वर्ष 2013 में बच्चों के खिलाफ अपराध की 58,224 वारदातें हुईं जो 2016 में बढ़कर 1 लाख 6 हजार 958 हो गईं। वर्ष 2012 में बच्चियों के साथ दुष्कर्म की 8,541 वारदातें हुईं जो 2016 में बढ़कर 19,765 हो गईं। वर्ष 2012 में देह शोषण की मंशा से नाबालिग बच्चियों को बहला-फुसलाकर ले जाने की 809 घटनाएं हुईं जो 2016 में बढ़कर 2,465 हो गईं। इस अवधि में बच्चों के अपहरण की घटनाएं 18,266 से बढ़कर 54,723 हो गईं।
वर्ष 2016 में यौन अपराध से बच्चों के संरक्षण संबंधी कानून पोस्को के तहत 48,060 मामले जांच के लिए दर्ज किए गए जिनमें से सिर्फ 30,851 मामले सुनवाई के लिए अदालत भेजे गए यानी 36 प्रतिशत मामले जांच के लिए लंबित थे। वर्ष 2014-16 के दौरान पोस्को के तहत 30 प्रतिशत दोषसिद्ध हुए हालांकि 2015 में इसमें 6 प्रतिशत की वृद्धि हुई। पोस्को के तहत नया मामला दर्ज नहीं हुआ तो 2016 तक के लंबित मामलों की सुनवाई मौजूदा गति से जारी रही निपटारा होने में दो दशक लग जाएंगे। 2016 में बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के मात्र 10 प्रतिशत मामलों की सुनवाई पूरी हो सकी।एनसीआरबी के एक अन्य आंकड़े के अनुसार वर्ष 2016 में बच्चियों और महिलाओं के साथ दुष्कर्म के कुल 36 हजार 657 मामले दर्ज किए गए जिनमें से 34 हजार 650 यानी 94 प्रतिशत आरोपी पीडि़ताओं के परिचित थे।
2014 में एक अध्ययन में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए जिसमें पता चला कि देश भर में 52 फीसदी लड़कियों के साथ घर से स्कूल जाते या फिर वापस आते हुए छेडख़ानी होती है जबकि स्कूल या कालेज जाते हुए 32 फीसदी लड़कियों का पीछा किया जाता है।
जमीनी सच्चाई यही है कि हम जितने आधुनिक होने की ताल ठोंकते हैं, हमारे समाज का उतना ही पतन हो रहा है। समाज के बदलते इस मनोविज्ञान को समझना होगा। जब तक समाज में नैतिक विकास नहीं होगा, फांसी जैसे कड़े कानून बना कर हम इन घटनाओं को नहीं रोक सकते हैं। उस स्थिति में और भी नहीं जब दुनिया में फांसी को काला कानून मानकर इसे खत्म करने की अपील मानवाधिकारवादी संस्थाएं कर रही हैं लेकिन हम विकासवाद की सोच पालने के बजाय व्यभिचारवाद को बढ़ावा दे रहे हैं लेकिन इस त्रसदी की पीड़ा पीडि़त से अधिक कोई नहीं समझ सकता।
- प्रभुनाथ शुक्ल

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