विश्लेषण: चुनाव की आहट ने कम करवा दिये पेट्रोल-डीजल के दाम

विश्लेषण: चुनाव की आहट ने कम करवा दिये पेट्रोल-डीजल के दाम

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की घोषणा से पूर्व केंद्र सरकार ने पेट्रोल डीजल की कीमतों को घटाने की घोषणा की। केंद्र सरकार की यह घोषणा चुनावी मजबूरी के तहत हुई है, यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है। केंद्र सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज घटाने के साथ ही पेट्रोलियम कंपनियों पर दबाव डालकर कीमतें कम करवाई हैं। उसके बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अपनी पार्टी द्वारा शासित राज्यों को निर्देश दिए और इस तरह जो केंद्र सरकार कुछ दिन पहले तक खुद को असहाय बता रही थी, उसके हरकत में आते ही पेट्रोल-डीजल के दाम तकरीबन ढाई रुपये प्रति लिटर कम हो गए।

भाजपा शासित राज्यों द्वारा स्थानीय करों में राहत दिए जाने से उनके यहां दाम 5 रुपये प्रति लिटर तक गिर गये। इस आकस्मिक निर्णय से आम उपभोक्ता निश्चित रूप से खुश हुआ लेकिन उसी के साथ हर किसी के मन में यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ कि जब सरकार को यह करना था तब जनता पर इतने दिन तक भारी आर्थिक बोझ डालने की क्या जरूरत थी?

मप्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान विधानसभा के चुनाव अगले महीने होने हैं। चुनावी तारीखों की घोषणा हो चुकी है। वहां से आ रहे सियासी संकेत भाजपा के लिए चिंता का कारण बनने लगे थे। हाल ही में भोपाल में आयोजित महाकुम्भ में दावे के विपरीत कम लोगों की उपस्थिति से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी असंतुष्ट होकर लौटे। इन परिस्थितियों में केंद्र सरकार, पेट्रोलियम कंपनियों और भाजपा शासित राज्यों ने मिलकर पेट्रोल, डीजल सस्ता करने की जो मेहरबानी की, वह मजबूरी ही कही जाएगी। इसके पीछे उद्देश्य तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव ही मुख्य रूप से दिखाई दे रहे हैं वरना अरुण जेटली हफ्ते भर पहले तक तो पूरी तरह बेरहम बने रहे।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बड़े ही संवेदनशील माने जाते हैं किंतु जिस तरह का काइयांपन केंद्र में श्री जेटली दिखाते रहे ठीक, वैसा ही रवैय्या मप्र के वित्तमंत्री श्री मलैया का भी रहा। अचानक केंद्र सरकार और भाजपा जनता की हमदर्द बन गईं तो इसके पीछे कोई सदाशयता नहीं वरन जनता के गुस्से से थोड़ा बहुत बचने का प्रयास है। यदि तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव सिर पर नहीं होते और उनमें भाजपा की स्थिति नाजुक नहीं होती तब यह उपकार इस तरह न किया जाता।

इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि भारत में कच्चे तेल का आयात विदेशी मुद्रा का अधिकतम भाग खा जाता है। अपनी जरूरत का 80 फीसदी से ज्यादा आयात करने वाला भारत कच्चे तेल के सबसे बड़े खरीदारों में एक है। पेट्रोल-डीजल का विकल्प खोजने में समुचित प्रयासों के अभाव ने इस समस्या को और विकराल बना दिया। जब बहुत देर और नुकसान हो चुका, तब जाकर इस दिशा में कोशिशें शुरू हुईं लेकिन वे भी नौ दिन चले अढ़ाई कोस वाली उक्ति का प्रतीक बन गई हैं। बैटरी चलित वाहनों को लेकर भी उतनी सक्रियता नजर नहीं आ रही। कुल मिलाकर कच्चे तेल के मामले में भारत की हालत अभी भी वैसी ही है जैसी पहले से चली आ रही है।

मान भी लें कि सरकार की अपनी मजबूरियां हैं लेकिन दूसरी तरफ यह भी उतना ही बड़ा सच है कि हमारे देश में पेट्रोल-डीजल को केंद्र और राज्य दोनों सरकारों ने दुधारू गाय बना रखा है। नोटबन्दी और जीएसटी से सरकारी खजाने में काफी धन जमा होने लगा है। यदि मोदी सरकार वाकई अच्छे दिन लाने के वायदे को मूर्तरूप देना चाहती है तब पेट्रोल-डीजल को भी बिना विलंब जीएसटी के दायरे में ले आना चाहिए वरना ये स्थिति सदैव बनी रहेगी। कर वसूलना शासन का अधिकार और दायित्व दोनों है लेकिन जनता का खून चूसने का हक कदापि नहीं ।

कच्चे तेल की कीमतों में इस फिसलन का फायदा उठाते हुए केंद्र सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी में बड़ा इजाफा किया। जहां प्रति लिटर पेट्रोल पर 21.50 रुपये एक्साइज ड्यूटी वसूली गई वहीं प्रति लिटर डीजल पर सरकार ने 17.30 रुपये बतौर ड्यूटी वसूली. इसके चलते केन्द्र सरकार की पेट्रोल-डीजल की बिक्री से कमाई दो गुनी हो गई। जहां वित्त वर्ष 2014 में केंद्र सरकार को पेट्रोल-डीजल पर टैक्स से कमाई जीडीपी का महज 0.7 फीसदी था, वहीं वित्त वर्ष 2017 में दोगुना होकर 1.6 फीसदी हो गई। नतीजा यह कि केंद्र सरकार के इस फैसले से आम आदमी के लिए पेट्रोल डीजल की कीमतें कम नहीं हो सकीं।

चर्चा यह है कि मोदी सरकार अभी दो महीने और बढ़ती तेल की कीमतों से आम जनता को राहत देने के मूड में नहीं है यानी अभी तेल के दामों में वृद्धि लगातार जारी रहेगी। हां, चुनाव आते-आते यानी फरवरी से दामों में गिरावट शुरू हो सकती है जिससे मोदी सरकार जनता की सहानुभूति बटोर सके और वोट पा सके यानी तब तक आम जनता तेल के खेल में बुरी तरह से पिस चुकी होगी। फरवरी के बाद सरकार जो तेल की कीमती में कमी भी ला सकती है वह जाकर 70-75 रूपए प्रति लिटर पर जाकर ठहरेगी यानी तेल के दाम में कमी तो आयी नहीं, ऊपर से सरकार की झोली और भारी हो गयी और जनता की जेब खाली हो गयी।

उदाहरण के तौर पर सरकार पहले किसी वस्तु की कीमत 60 से बढ़ाकर 100 पर ले जाती है, फिर जनता को बेवकूफ बनाने के लिए 100 की चीज को 80 पर ला देती है। कहने की जनता की नजर में 20 रूपए कम हुई लेकिन हकीकत यह है कि 60 वाली चीज को 80 पर कर दिया यानी जनता की बाहें मरोड़कर जेब खाली कर दी गयी। मोदी सरकार भी बड़ी चालाकी से जनता को मूर्ख बनाने के लिए यही चाल चलेगी। आश्चर्य नहीं है कि जैसा कि पहले भी होता रहा है। जनता एक बार फिर मूर्ख बनने के लिए तैयार रहेगी। इसके अलावा उसके पास कोई और चारा भी नहीं है?

क्या पता इसके बदले किन्हीं और वस्तुओं पर अधिभार बढ़ाकर इस हाथ दे, उस हाथ ले वाली स्थिति बना दी जाए। बावजूद इसके जनता को जो राहत मिली, वह न मामा से काना मामा भला वाली उक्ति को चरितार्थ करती है। बेहतर होता केंद्र सरकार यह दरियादिली हर हफ्ते दिखाती रहती तो उसे इतनी गालियां शायद नहीं पड़ी होतीं। देर आए दुरुस्त आए की तर्ज पर पेट्रोल-डीजल के दामों में लगभग 5 रुपये प्रति लिटर की कमी स्वागतयोग्य है लेकिन इसके बाद भी जनता के मन में केंद्र और भाजपा के प्रति गुस्सा पूरी तरह ठंडा नहीं पड़ा क्योंकि कुछ महीनों से रोजाना हुई मूल्य वृद्धि ने केंद्र और भाजपा के प्रति जो रोष उत्पन्न कर दिया था वह इतने मात्र से मिटना मुश्किल है और मूल्यवृद्धि का सिलसिला फिर शुरू हो गया है।

-शकील सिद्दीकी

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