राष्ट्ररंग: एस सी - एस टी एक्ट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राजनीति के शिकार हुए

राष्ट्ररंग: एस सी - एस टी एक्ट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राजनीति के शिकार हुए

एस सी - एस टी एक्ट पर वर्षों की मेहनत के बाद उच्चतम न्यायालय ने एक प्राकृतिक न्याय सिद्धान्त के अंतर्गत 2० मार्च 2018 को अपना फैसला सुनाया कि दलित की किसी भी शिकायत पर सक्षम अधिकारी की जांच के उपरांत दी गई रिपोर्ट पर ही आरोपी की गिरफ्तारी होगी। उच्चतम न्यायालय के इस व्यावहारिक फैसले से विपक्षी दलों ने मोदी सरकार को इस रुप में प्रचारित कर दिया कि उनकी सरकार दलित विरोधी है तथा उन्होंने (मोदी ने) एस सी - एस टी एक्ट को कमजोर कर दिया है तथा अब दलितों के उत्पीडऩ पर पुलिस कोई कार्रवाही ही नहीं कर सकती।

प्रचारित यह भी किया गया कि भाजपा अगड़ों की पार्टी है जिससे भाजपा को लगा कि आगामी चुनावों में उसका हश्र बिहार जैसा न हो जाये जिसमें मात्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक भागवत जी के एक वाक्य से भाजपा को दलित विरोधी करार दे दिया गया था और भाजपा को बिहार में अपेक्षित सफलता हाथ नहीं लगी थी और उसका लाभ लालू प्रसाद की पार्टी को मिल गया। इसी बात से भयभीत होकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को आनन फानन में उच्चतम न्यायालय के इस फैसले को बदलते हुए एस सी - एस टी एक्ट की पुरानी व्यवस्था को बहाल कर लोकसभा व राज्यसभा से बिल पारित कराने की विपक्षी राजनीति का शिकार होना पड़ा। आखिर उन्हें भी सत्ता खोने का भय सता सकता है।

विपक्ष लगातार यह प्रचार कर रहा था कि भाजपा दलित विरोधी है जबकि दलित प्रेम को दिखाते हुए भाजपा ने दलित को राष्ट्रपति बनवाने का श्रेय प्राप्त किया हुआ था। भारत में जिस प्रकार दहेज अधिनियम, परिवार हिंसा अधिनियम का दुरुपयोग होता है, उसी तरह से एस सी - एस टी एक्ट का भी दुरुपयोग होता है। बहुत से लड़के व उनके पिता माता व बहनों व रिश्तेदारों को दहेज की बलि चढ़ाते हुए निरपराध होते हुए भी सालों की जेल की हवा खानी पडती है और परिवार तहस नहस हो जाता है।

उच्चतम न्यायालय ने मात्र यह आदेश ही दिया था कि एस सी - एस टी एक्ट के तहत आरोपितों की गिरफ्तारी सक्षम पुलिस अधिकारी के द्वारा जांच के बाद ही हो सकेगी परन्तु विपक्ष ने उच्चतम न्यायालय के इस आदेश को लेकर देश में कृत्रिम रुप से ऐसा वातावरण तैयार कर दिया कि यह सब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया हैैं। विपक्ष ने दलितों को आंदोलन करने के लिए उकसा भी दिया और दलित समाज ने 20 मार्च 2108 से 2 अप्रैल 2018 के बीच मात्र 10 दिन में 2 अप्रैल 2018 को सम्पूर्ण भारत में एक व्यापक हिंसक आंदोलन कर दिया जिसमें पर्दे के पीछे विपक्षी राजनीतिक दलों का सहयोग था। कमजोर समझे जाने वाले दलित वर्ग ने 2 अप्रैल 2018 को अपनी मजबूती दिखाते हुए सवर्णों व अन्य समुदायों में एक भय का वातावरण पैदा कर दिया कि हमको छेड़ो नहीं वरना हम किसी को छोड़ेंगे नहीं तथा दलित राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों ने इस आंदोलन के दौरान हुई हिंसा व निर्दोष लोगों की जान व माल की हानि के लिए राष्ट्र से कोई क्षमा याचना भी नहीं की तथा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इस बात के लिए मजबूर कर दिया कि वे एस सी - एस टी एक्ट की पुरानी व्यवस्था को ही बहाल करें।

अब कहा चली गई हमारे राजनीतिक दलों के द्वारा उच्चतम न्यायालय की सम्मान की यह भावना। राजनीतिक दलों में उच्चतम न्यायालय के सम्माान की यह भावना मात्र दिखावटी ही है। उनके लिए जातिगत राजनीति करते हुए अपने हित ही प्रथम स्थान पर हैं। राष्ट्रहित उनके इस उदेदश्य के सामने कहीं टिकते ही नहीं जबकि 2 अप्रैल 2018 तक भाजपा यह कहती रही थी कि वह उच्च्तम न्यायालय के इस फैसले से सहमत नहीं है और वह इस फैसले के विरुद्ध अपील दायर करेगी जिसमें पन्द्रह बीस दिन तो लगते ही हैं परन्तु विपक्षी राजनीतिक दबाव में संसद ने एस सी - एस टी एक्ट के पुराने स्वरुप को बहाल कर दिया जिसमें देश में सवर्णों के मन में 2 अप्रैल 2018 को दलितों के द्वारा की गई हिंसा का भय और गहरा गया और वे भी आंदोलनरत् हो गये। अब इस सबसे आगामी काल में सवर्ण, पिछड़े व दलित में अर्थात भारतीय समाज में वैमनस्य गहरा जायेगा और एक राजनीतिक अस्थिरता तथा अस्पृश्यता का वातावरण तैयार होगा जिसकी सम्पूर्ण जिम्मेदारी गैर भाजपा राजनीतिक दलों की जातिवादी राजनीति को ही दी जा सकती हैै।

कांग्रेस के शासन काल में वर्ष 1995 से एनसीआरबी के द्वारा उन अपराधों की अलग सूची रखी जाती है जो समाज के कमजोर तबकों के विरुद्ध होते है जिसमें बुजुर्ग, बच्चे, स्त्रियों तथा अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लोग आते है। अत: इस सूची में बुजुर्ग, बच्चे, स्त्रियों के साथ साथ अनुसूचित जाति के विरुद्ध अपराध भी शामिल होते है जबकि राजनीतिक दल इस सूची को ही मात्र अनुसूचित जाति का ही मानकर प्रचारित करते रहते है। अत: जो अपराधी व पीडि़त अनुसूचित जाति के ही है तथा दूसरे अपराधी व पीडित बिना एक दूसरे की जाति जाने झगडा, हत्या फसाद करते हैं जिनमें जाति कोई कारण नहीं होती है। अत: सभी घटनाएं अत्याचार से ही जोड़ कर प्रचारित कर दी जाती है।

अब देश में परिस्थितियां यह हो गयी हैं कि किसी भी राजनीतिक दल में इतना साहस नहीं बचा है कि वह आरक्षण को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने की बात भी कर सके अथवा जिस दलित व्यक्ति को छ-सात स्तरीय आरक्षण व अन्य का लाभ मिल चुका है उसको व उसके बच्चों को आगे आरक्षण को लाभ नहीं मिले, इतना भर कह दे अथवा आरक्षण व्यवस्था व नीति की समीक्षा की ही बात कर सके अथवा आरक्षण व्यवस्था को न्यायसंगत ही बनाने की वकालत कर सके। आज आरक्षण प्राप्त किये हुए दलित ही गैर आरक्षण प्राप्त दलितों के दुश्मन बने हुए है और वे नहीं चाहते हैं कि शेष वे दलित लोग भी राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल हो सकें।

मुख्यधारा में पीछे छूटे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है परन्तु यह तभी हो सकता है जब जिन लोगों व जातियों को आरक्षण का लाभ मिल चुका है वे स्वयं उस लाभ को स्वेच्छा से ही छोडऩे को तैयार हो सकें। आरक्षण प्राप्त जिन लोगों की आर्थिक स्थिति मजबूत हो चुकी है, उन्हें आरक्षण के दायरे से बाहर किया ही जाना चाहिए। यदि आरक्षण, दलितों पर अत्याचार को राजनीतिक चश्मे से ही देखा जाते रहा तो हमारी इस व्यवस्था से विश्व के अनेक देश ही लाभ उठाते रहेंगेें। भारत को इससे लाभ नहीं होने वाला। प्रतिभा सम्पन्न युवा वर्ग विदेशों को पलायन करता रहेगा और विदेशों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करता रहेगा। सवर्णों की यह मजबूरी है कि वे भाजपा के अलावा किसे वोट दें? यह भाजपा अच्छी तरह से समझती है इसलिए सवर्ण नाराज होकर और कहां जा सकते है?

एस सी - एस टी एक्ट में मात्र राजनीतिक कारणों से ही मोदी ने दबाव में आकर पुराने एस सी - एस टी एक्ट को बहाल करवाया। मोदी का यह निर्णय भी कांग्रेस के शाहबानो प्रकरण की ही तरह ऐतिहासिक रुप से याद किया जाता रहेगा तथा समाज में अगड़े, पिछड़े व दलित में वैमनस्यता कम होने के स्थान पर बढ़ती जायेगी। देश के सभी राजनीतिक दल इस वैमनस्यता का राजनीतिक लाभ ही प्राप्त करने की निरन्तर कोशिश करते रहते है। देश में आर्थिक विकास इसी कारण से ही अवसान की ओर जा रहा है।

- डा. सूर्य प्रकाश अग्रवाल

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