Read latest updates about "सोशल चौपाल" - Page 3

  • राजनीति: ममता हुई विपक्ष पर भारी, क्या अब है दिल्ली की तैयारी

    देश की मौजूदा राजनीतिक हलचलें भले ही एक पुलिस अधिकारी एवं देश की जाँच एजेंसी के बीच की खिंची हुई दीवार के रूप में दिखाई दे रही हों परन्तु इसके पीछे 2019 की चुनावी बिसात भी साफ दिखाई दे रही है। जहाँ दिल्ली का सत्ता पक्ष अपनी चाल चलने का प्रयास कर रहा है, वहीं बंगाल की सरकार भी अपनी सियासी सीमा रेखा...

  • मुद्दा: विवादित क्यों बनाए जा रहे हैं राष्ट्रीय सर्वोच्च सम्मान

    यूँ तो जब से मोदी सरकार आयी है, वह विरोधपक्ष को हजम नहीं हो रही है। मोदी और मोदी सरकार के हर निर्णय को विवादित बना कर चौराहे की हंडिया बनाने की असफल राजनीति पर प्रारम्भ से ही चल रहा विपक्ष विगत गणतन्त्र दिवस की पूर्व संध्या पर घोषित राष्ट्रीय सम्मानों को भी चौराहे पर लाकर खड़ा करने का असफल प्रयास...

  • राजनीति: प्रधानमंत्री पद के सवाल से विपक्ष आखिर भाग क्यों रहा है?

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनैतिक मजबूती से विपक्ष का एक-एक नेता वाकिफ है। जिस प्रकार से 2014 में तमाम बाधाओं और छवि को तोड़ते हुए भारतीय जनता पार्टी के नरेंद्र मोदी केंद्र की सत्ता पर काबिज हुए थे, उसने भारत के राजनीतिक इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया था। पीएम के पीछे-पीछे गुजरात से उनके...

  • मुद्दा: ईवीएम पर आरोप लगाना राजनीतिक दिवालियापन

    भारत में आए दिन चुनाव होते रहते हैं लेकिन पिछले कुछ सालों से कोई न कोई राजनीतिक दल ईवीएम पर सवाल उठाने में लगा रहता है। इसमें भी देखने वाली बात यह है कि जो सत्ताधारी दल केंद्र की सत्ता में विराजमान होता है, उसे ईवीएम से कोई दिक्कत नहीं होती लेकिन ज्योंही वह केंद्रीय सत्ता से बाहर होता है तो उसकी...

  • विश्लेषण: तोते की आजादी के मायने

    अभी हाल में ही पूर्व चीफ जस्टिस आर.एम.लोढा ने कहा कि जब तक तोते को आजाद नहीं रखा जाएगा, तब तक वह खुले आसमान में उड़ नहीं पाएगा। तोते से आशय उनका सीबीआई से था जिसके बारे में उन्होंने कहा, देश की प्राथमिक जांच एजेन्सी सीबीआई को स्वतंत्र रखना होगा। आगे उन्होंने यह भी कहा कि सत्ताधारी पार्टियां लगातार...

  • कुछ तो गड़बड़ है मी लार्ड

    किसी संस्था की साख उसके अपने अस्तित्व से अधिक महत्त्वपूर्ण होती है। अगर उसकी साख ही चली जाए तो फिर उसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है। यूं तो बहुत पहले से ही सर्वोच्च न्यायालय की साख पर इक्का दुक्का अंगुलियाँ उठती रही हैं किन्तु विगत कुछ वर्षों से देश में प्रजातंत्र के इस सबसे सशक्त स्तम्भ की...

  • राजनीति: जीत के साथ हार पर भी मनन करे कांग्रेस

    कांग्रेस पार्टी हिन्दी भाषी बेल्ट के राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे तीन महत्त्वपूर्ण प्रदेशों में अपनी सरकार बना कर खुश हो रही है। कांग्रेस खुश भी क्यों न हो, उसे मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में तो 15 वर्षों के लम्बे इन्तजार के बाद सत्ता जो प्राप्त हुई है मगर कांग्रेस को खुशी के साथ दो राज्यों...

  • मुद्दा: सचमुच हमें डेटा औपनिवेशीकरण के खिलाफ आंदोलन खड़ा करना चाहिए

    विगत दिनों गांधीनगर में रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक मुकेश अंबानी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से डेटा के औपनिवेशीकरण के खिलाफ कदम उठाने का आग्रह किया। सचमुच मुकेश अंबानी दूरदृष्टा हैं। उन्हें समझ है कि आने वाले समय में दुनिया सूचना तकनीक और सूचना के तेल से चलने वाली है। वैसे भी...

  • राजनीति: क्या महागठबंधन तय करेगा देश की दिशा?

    आज कल देश के सभी छोटे बड़े टेलीविजन चैनलों पर हो हल्ला होता हुआ दिखायी दे रहा है जो चुनावी मौसम के अनुसार आम बात है क्योंकि देश का वातावरण चुनावी मौसम में परिवर्तित हो रहा है। देश की लगभग सभी छोटी बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ अपनी चुनावी जमीन तैयार करने में लगी हुई हैं। सभी छोटी बड़ी पार्टियाँ अपने...

  • राजनीति: उ.प्र. गठबंधन-कांग्रेस के सपनों को पलीता

    केंद्र में सरकार बनाने में सबसे महती भूमिका निभाने वाले उ.प्र. में अंतत: सपा बसपा में गठबंधन हो ही गया। यूं तो यह गठबंधन कई मायनों में महत्त्वपूर्ण है किन्तु इसका सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर विरोधी दलों का महा गठबंधन बना कर भाजपा को राष्ट्रीय राजनीति से उखाड़ फेंकने का जो सपना...

  • राजनीति: सुर्खियां पाने वाले राहुल को साथी नहीं मिल रहे

    राहुल गांधी जो भी बोलते हैं, जहां भी बोलते हैं, उसे इलेक्ट्रानिक एवं प्रिंट मीडिया में सुर्खियां खूब मिलती हैं किंतु सुर्खियां पाने एवं बटोरने के बाद भी उन्हें साथी नहीं मिल रहे हैं। उनको साथ देने वाले या उनकी बातों को आगे बढ़ाने वाले नेता नहीं मिल रहे हैं। यही राहुल गांधी के साथ विवशता है, विडंबना...

  • राजनीति: सवर्ण आरक्षण की राजनीति

    जहर में डूबे कुछ लोग पूछ रहे हैं कि अगर सामान्य वर्ग के लोगों को दस परसेंट आरक्षण देना ही था तो पहले ही क्यों नहीं दिया ? यह चलते-चलते देने का क्या मतलब ? यह सवाल वैसे ही है जैसे किसी की शादी में बैंड बजने लगे तो आप पूछें कि भैया , शादी तो बहुत पहले ही तय हो गई थी , बैंड आज क्यों बजा रहे हो , पहले...

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