Read latest updates about "सोशल चौपाल" - Page 3

  • आर्थिक चर्चा: गन्ना ही बोएंगे चाहे जलाना ही क्यों न पड़े?

    अर्थशास्त्र का सामान्य नियम है कि जब किसी वस्तु की पूर्ति मांग की तुलना में बढ़ जाती है तो बाजार में वह वस्तु न केवल सस्ती हो जाती है अपितु उसका उपयोग न होने के कारण उस उत्पाद को जलाना पड़ता है अथवा समुन्द्र में डुबो देना पड़ता है। कुछ देशों में अधिक उत्पादित हुए गेहूं को भी समुन्द्र में डुबो दिया...

  • राजनीति: परिणाम साफ कर देंगे 2019 की तस्वीर

    चुनाव आयोग द्वारा मुकर्रर ग्यारह दिसंबर की तारीख 2019 के आम चुनाव की तस्वीर साफ करेगी। इस दिन पांचों राज्यों के विधानसभा चुनाव के रिजल्ट घोषित होंगे। आगामी लोकसभा चुनाव के चंद महीने पहले होने वाले इन सियासी अखाड़े को सेमीफाइनल के तौर देखा जा रहा है। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा की...

  • राजनीति: देख तुम्हारी उछल-कूद....

    म०प्र० के चुनावी दौरे पर आये राहुल गांधी गत दिनों चित्रकूट धाम भी पहुंचे । वहां उन्होंने एक श्रद्धालु हिन्दू जैसे कामतानाथ के दर्शन किये और मंदिर के पुजारियों तक से भी भेंट की। इसके चलते कांग्रेसियों ने उन्हें बतौर रामभक्त प्रचारित किया। इसके पहले राहुल कैलाश मानसरोवर यात्र पर गये थे, तब कांग्रेस...

  • पास पड़ोस: संयुक्त राष्ट्र में बेनकाब हुआ पाक का नापाक चेहरा

    संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) में भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने पाकिस्तान पर जम कर हमला बोला। उन्होंने अपने भाषण में ओसामा बिन लादेन से लेकर हाफिज सईद तक के पाकिस्तान के साथ संबंधों का जिक्र किया। भारत ने एक बार फिर विश्व बिरादरी के सामने पाकिस्तान को आतंकवाद के मुद्दे पर बेनकाब किया है।...

  • मुद्दा: जनता के धन को नेताओं पर उड़ा रही है सरकार

    हाल ही में मध्य प्रदेश में नीमच के रहने वाले एक आरटीआई कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौड़ ने सूचना के अधिकार के तहत लोकसभा व राज्यसभा सचिवालय से अलग-अलग जानकारी प्राप्त की है। पिछले चार वर्षों में लोकसभा और राज्यसभा सांसदों के वेतन और भत्तों पर सरकारी खजाने के 19.97 अरब रुपये की भारी-भरकम रकम खर्च की गई।...

  • बहस: पुलिस को सभ्य नागरिक बनने का प्रशिक्षण मिले

    खबर है कि उत्तर प्रदेश पुलिस अपने सिपाहियों को शिष्टाचार की ट्रेनिंग देगी, खास कर लखनऊ में। विवेक तिवारी की हत्या और उस के बाद हत्यारे सिपाही के पक्ष में गोलबंद हो रही पुलिस की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने की गरज से यह सब हो रहा है कि पुलिस बगावती हो कर आंदोलन पर न आमादा हो जाए। फिर भी यह कोई नई कवायद...

  • बहस :सामाजिक और संवैधानिक नैतिकता में छिड़ा द्वंद्व

    रूढ़ हो चुकी सामाजिक धारणाओं व नैतिकता के खिलाफ जाकर समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर निकालने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला कई स्तरों पर झकझोरने वाला है। पहला तो यह कि देश बहुसंख्यक धारणाओं से नहीं, संविधान से संचालित होगा। दूसरा यह कि नैतिकता के आधार पर किसी के मौलिक अधिकारों (निजता के...

  • कानून की तलवार, स्त्रियों की रखवार

    घर की जिस चारदीवारी को स्त्री की सुरक्षा की सबसे बड़ी गारंटी माना जाता है, वस्तुत: वही कई बार स्त्रियों के लिए उनके हिंसक शारीरिक-मानसिक उत्पीडऩ का सबसे बड़ा और स्थायी स्रोत बन जाती है। सार्वजनिक अपमान की ठोस घटनाओं और कटु-कर्कशी सच्चाइयों से भरे परिवारों के उत्पीडऩ से, बिना अपनी अस्मिता छोड़े,...

  • राजनीति: तत्काल तीन तलाक पर कांग्रेस व विपक्षियों की दोगली राजनीति

    केन्द्र में भाजपा नेतृत्व वाली सरकार ने जिस प्रकार तत्काल तीन तलाक बिल को लोकसभा में पारित करवाया तथा वहां कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने अपना समर्थन व्यक्त किया परन्तु जब बिल राज्यसभा में ले जाया जाने लगा तो कांग्रेस व विपक्षी दलों ने अपना समर्थन वापस ने लिया और तत्काल तीन तलाक का यह बिल...

  • विश्लेषण: संघ दृष्टि में 'भविष्य का भारत' की प्रासंगिकता

    भारत सदैव से ही दुनिया के लिए उत्सुकता का विषय रहा है। विश्व इतिहास में भी दर्ज है कि ज्ञान और कला की हमारी समृद्ध विरासत को निकट से देखने, अनुभव करने और लेखनीबद्ध करने के लिए दुनियाभर के विद्वान यात्रियों ने भारत की यात्राएं की हैं। आज भी विश्व के लिए भारत के अतीत और भविष्य का महत्व है तो स्वयं...

  • मुद्दा: शौचालय निर्माण व स्वच्छता मिशन का आर्थिक विकास में योगदान

    देश में स्वास्थ्य का अधिकार जनता का प्राथमिक अधिकार समझा जाता है परन्तु भारत में स्वास्थ्य की तरफ पर्याप्त ध्यान न देने से तथा स्वास्थ्य सेवा के अभाव के कारण देश में प्रतिदिन ही हजारों लोग अपनी जान अस्पतालों में चिकित्सा के दौरान गंवा देते है। देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के द्वारा इस...

  • चेतावनी: सरकारी तंत्र की लापरवाही से हुए हादसों का जिम्मेदार कौन?

    हादसा अगर दैविक हो तो कुछ हद तक कह सकते हैं कि ईश्वरीय प्रकोप से बचना मुश्किल होता है और दुर्भाग्यवश ऐसे हादसे होते हैं लेकिन अगर ऐसे ही हादसे लापरवाही से हों तो बस एक प्रश्न हृदय में घुमडऩे लगता है कि हादसों में हुए इन हत्याओं का जिम्मेदार आखिर कौन है? हत्या मैं इसलिए कह रहा हूँ कि जब मालूम हो कि...

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