विश्लेषण: शांति धर्म है, लेकिन देशद्रोह से निपटना प्रथम धर्म

विश्लेषण: शांति धर्म है, लेकिन देशद्रोह से निपटना प्रथम धर्म

पिछले दिनों जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री ने रमजान के पवित्र महीने में वहां सक्रिय आतंकवादियों के खिलाफ एकतरफा संघर्षविराम की मांग की थी। उनके अनुसार ऐसा करने से शांतिपूर्ण माहौल बनाने में मदद मिलेगी। अत: केन्द्र ने केंद्रीय सुरक्षा बल द्वारा रमजान माह में आतंकियों के खिलाफ अभियान स्थगित रखने की घोषणा की है, लेकिन यह भी कहा गया कि आतंकवादियों ने हमला किया तो सुरक्षाबलों को जवाब देने का अधिकार होगा।

इस फैसले का जम्मू- कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती तथा पूर्व मुख्यमंत्री नेशनल कांफ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने स्वागत किया है। इसे सकारात्मक भी माना जा सकता है कि उमर अब्दुल्ला यह भी कहने को विवश हुए कि यदि आतंकी सकारात्मक रुख नहीं अपनाते तो पता चलेगा कि वे लोगों के दुश्मन हैं। आश्चर्य है कि महबूबा और उमर के तर्क के उलट कश्मीर में सक्रिय लश्कर ने किसी युद्धविराम को मानने से इंकार कर दिया है। यह उसी का परिणाम है कि सरकार के इस फैसले को लागू किये कुछ ही घंटों के बाद कश्मीर के शोपियां जिले में आतंकवादियों ने सेना के गश्ती दल पर बम फेंका।
दुखद आश्चर्य यह है कि स्वयं को कश्मीर का असली नेता बताने वाले किसी भी स्वयम्भू ने आतंकवादियों के इस कृत्य की निंदा करने की आवश्यकता भी महसूस नहीं की है। इससे स्पष्ट है कि देशद्रोही आतंकवादियों पर किसी दल अथवा नेता का कोई नियंत्रण अथवा प्रभाव कतई नहीं है।
यह बात भी सभी को जाननी और समझनी चाहिए कि पत्थरबाजों को इस विश्वास के साथ माफी दी गई थी कि इससे कश्मीर का माहौल सकारात्मकता पाकर बदलेगा लेकिन अनुभव बता रहे हैं कि पत्थरबाजों को माफी के फैसले का कोई सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आया। उसी के बाद पहली बार कोई पर्यटक उनका निशाना बनकर अपनी जान गवांने को विवश हुआ।
यह तथ्य उत्तर की मांग करता है कि वर्ष 2000 में वाजपेयी सरकार के समय में भी रमजान के महीने में सुरक्षा बलों को इसी तरह आतंकियों के खिलाफ अभियान चलाने से रोका गया था लेकिन तब भी उससे कुछ हासिल नहीं हुआ था। आखिर इस बीच स्थिति में ऐसा क्या बदलाव हुआ कि इस बार बदले हुए परिणाम की आशा की जा सके? कुछ विशेषज्ञों के मतानुसार केवल वहां की मुख्यमंत्री ही नहीं बल्कि कुछ अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के दबावों के कारण ऐसे फैसले लेने पड़ते हैं। ऐसे दबावों से निपटने के लिए दबाव डालने वालों को जनदबाव का हवाला देते हुए दोटूक समझाने की आवश्यकता है कि 'केवल कश्मीर ही क्यों, पूरी दुनिया में कहीं भी मानवता के शत्रु आतंकवादियों के खिलाफ एकतरफा सीजफायर के निर्णय को अविवेकी ही कहा जायेगा। यदि वे हिंसा का रास्ता छोडऩा चाहते हैं तो उनका स्वागत है वरना किसी भी स्वाभिमानी और सामर्थ्यवान राष्ट्र के पास राष्ट्र विरोधी हिंसा का जवाब उससे बड़ी हिंसा के अतिरिक्त कुछ और विकल्प हो ही नहीं सकता।
जहां तक भारतीय सुरक्षाबलों का प्रश्न है, यह बात सभी जानते हैं कि उन्होंने कभी पहली गोली नहीं चलाई लेकिन जब दूसरी ओर से उनकी क्षमता को चुनौती दी जाती है तो पलट कर जोरदार जवाब देना ही उसका कर्तव्य है। ऐसे आदर्श आचरण को युद्ध विराम के अतिरिक्त कोई दूसरा नाम दिया ही नहीं जा सकता। इतिहास साक्षी है कि देशद्रोहियों और विदेशी हमलावरों के साथ जरूरत से ज्यादा उदारता बरतकर हमने सदा बहुत नुकसान उठाया है। किसे याद न होगा कि पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को सत्रह बार माफ किया लेकिन मौका पाते ही गौरी ने कोई चूक नहीं की और हम परतंत्रता को विवश हुए।
यह भी कहां जा सकता है कि 'विदेशी लुटेरे गौरी और कश्मीर के भटके हुए नौजवानों की तुलना नहीं की जा सकती। कश्मीर हमारा है, अत: कश्मीर के बच्चे भी हमारे हैं। निश्चित रूप से कश्मीर हमारा और केवल हमारा है लेकिन हमारे कर्णधारों द्वारा सही समय पर सही 'आपरेशन करने की बजाय जरूरत से ज्यादा उदारता दिखाने के कारण वहां विभाजक मानसिकता को बल मिला। ऐसे तत्वों में वे लोग भी शामिल हैं जो लगातार देश के अन्य हिस्सों के मुकाबले 'कम से कम जिम्मेवारी और 'अधिक से अधिक अधिकारों का आनंद ले रहे हैं। बार-बार पैंतरा बदलने वाले ऐसे तत्व हर तरह से विश्वसनीयता खो चुके हैं।
एकतरफा युद्धविराम के साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि हम पाकिस्तान परस्त अलगाववादी तत्वों सहित सारी दुनिया को स्पष्ट संदेश दें कि जो इस देश के नियमों, कानूनों,, मान्यताओं में विश्वास रखता है, उसकी सुरक्षा और संरक्षण राष्ट्र का दायित्व है लेकिन आत्मरक्षा और राष्ट्ररक्षा के लिए अपनी पूरी शक्ति लगाकर विभाजक मानसिकता को नष्ट करना हमारी प्रतिबद्धता है। राष्ट्र की अस्मिता की रक्षा के लिए हमारे लिए नवरात्र से रमजान तक हर दिन समान हैं। अगर किसी का विश्वास केवल खून बहाने में है तो वह हमसे भी फूलों की आशा न करें। निश्चित रूप से शान्ति हमारी प्राथमिकता है। शान्ति सद्भावना हमारा सहज स्वभाव है लेकिन देशद्रोह से कड़ाई से निपटना हमारा प्रथम धर्म है।
हमें सजग रहते हुए यह ध्यान रखना होगा कि कश्मीर में सक्रिय आतंकी और उपद्रवी तत्व इस पहल को हमारी कमजोरी न मानें। ऐसा भी संभव है कि इसका लाभ उठाते हुए वे अपनी एकजुटता और शक्ति बढ़ाने का प्रयास भी करें। पाकिस्तान से उनकी सम्पर्क लाइन सदा के लिए खत्म करनी होगी। यह संदेश स्पष्ट रूप से जाना चाहिए कि 'राष्ट्र की इस उदारता और सद्इच्छा को कमजोरी समझने अथवा उसका अनादर करने वाले जान ले कि इसके आगे बंद गली है, जहां केवल और केवल जहन्नुम है। राष्ट्र की एकता कायम रखने के लिए हम किसी भी हद तक जा सकते हैं।
-डा. विनोद बब्बर

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