मोदी जी बचें नहीं तो फिर क्या करें..

मोदी जी बचें नहीं तो फिर क्या करें..

इन दिनों नरेन्द्र भाई मोदी की लोकप्रियता में जैसे-जैसे कमी आ रही है वैसे-वैसे अपने और पराए दोनों उन पर हमलावर होते जा रहे हैं। हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने यह कह कर मोदी के विरोध में अपना बयान जारी किया कि हमें कांग्रेस मुक्त भारत नहीं चाहिए। वहीं मोदी लगभग अपनी हर राजनीतिक सभा में इस बात को प्रमुखता से उठाते रहते हैं कि हमें कांग्रेस मुक्त भारत बनाना है।
मोदी को आंखें दिखाने का काम केवल भागवत ही नहीं कर रहे हैं बल्कि आरएसएस के आनुषंगिक संगठनों ने भी केन्द्र सरकार के कामकाज में दखल देकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की परेशानियां बढ़ा दी हैं। हालांकि आमजन यह समझ नहीं पा रहा है कि मोहन भागवत का बयान देना और आरएसएस के सहयोगी संगठनों का मुखर होना क्या मोदी की नीतियों का विरोध है या हाल के दिनों में मोदी के प्रति आमजन में जो नाराजगी आई है उससे ध्यान हटाने का काम है। बहरहाल, मामला जो भी हो लेकिन मोदी यह जान गए हैं कि 2019 करीब है और ऐसे में अपने या पराए किसी को भी कोई मौका दिया तो आगामी राह आसान नहीं होगी। कहने का मतलब साफ है कि अब वे हर कदम फंूक-फूंक कर उठाने लगे है। इसकी एक ताजा मिसाल मोदी के आगामी झारखंड दौरे को लेकर सामने आ रही है।

सुना है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 25 मई को धनबाद जाने वाले हैं और उनकी यह यात्र करीब-करीब फाइनल है। वे अपनी इस यात्र के दौरान आईएसएम के दीक्षांत समारोह में शरीक होने के साथ ही सिंदरी कारखाना, पतरातू पावर प्लांट व एम्स का भी शिलान्यास करेंगे। बता दें कि उनकी इसी यात्र में गोड्डा में प्रस्तावित अडाणी पावर प्लांट की आधारशिला रखने का कार्यक्र म भी था लेकिन यह रद्द कर दिया है। पीएमओ ने इस पर सहमति नहीं दी है। सूत्रों के मुताबिक पीएमओ ने फिलहाल अडाणी पावर प्लांट का शिलान्यास यह कह कर टाल दिया कि सरकारी परियोजनाओं के साथ निजी कंपनियों का शिलान्यास उचित नहीं है। दरअसल, माजरा कुछ अलग है। पीएमओ द्वारा जो दलील दी जा रही है कि सरकारी परियोजनाओं के साथ निजी कंपनियों का शिलान्यास उचित नहीं है, यह पूरा सच नहीं है।
असल में सच तो यह है कि गौतम अडानी को लेकर प्रधानमंत्री मोदी पर कई तरह के आरोप-प्रत्यारोप लगते रहे हैं। अतीत भी इस बात का साक्षी है कि मोदी ने भी कई मौकों पर खुल कर गृह प्रदेश का होने के नाते अडानी को लाभ पहुंचाया है। बहरहाल, मोदी और अडानी के संबंध में गड़े मुर्दे उखाडऩे के पहले हम यह जान ले कि आखिर पीएमओ आफिस की ऐसी कौन सी मजबूरी आन पड़ी कि उसे अडानी के पावर प्लांट के शिलान्यास के लिए मना करना पड़ा। यह तो सब भली भांति जानते हैं कि अडानी को मोदी की सरपरस्ती में विकास की उड़ान भरने का मौका मिला है। नरेन्द्र भाई की व्यक्तिगत मंशा नहीं होती तो शायद अडानी इतनी ऊचांइयों को छू नहीं सकते थे। अडानी के इस गोड्डा प्लांट को लेकर भी मोदी पर आउट आफ वे जाकर मदद करने के आरोप लगे हैं।
बता दें कि यह प्रोजेक्ट वर्ष 2015 में प्रस्तावित था। 17 फरवरी 2016 को झारखंड सरकार के साथ एमओयू हुआ लेकिन मई 2016 में ही नया प्रपोजल यह कह कर दिया गया कि कोयला इम्पोर्ट होगा। अप्रैल 2017 में आए एनवायरनमेंटल इम्पैक्ट एसेसमेंट के मुताबिक इस प्रोजेक्ट के लिए घरेलू कोयला मौजूद नहीं है, इसलिए बिजली अगर बांग्लादेश भेजनी है तो कोयला इंम्पोर्ट करना होगा। विवाद का फसाद यही से शुरू हो गया हालांकि योजना गोड्डा प्लांट के लिए अडाणी के जितपुर कोल माइंस से कोयला देने की थी।
इस प्रोजेक्ट को लेकर इत्मीनान तो तब होता कि यह विवाद यहीं ठहर जाता लेकिन ऐसा नहीं हुआ और मुसीबत बढ़ गई। दुनिया में ऊर्जा क्षेत्र से संबंधित प्रोजेक्ट्स के आर्थिक-सामाजिक मापदंडों का अध्ययन करने वाली इंस्टीट्यूट फार एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस (आईईईएफए) ने अनेक ऐसे खुलासे किए हैं कि मोदी इसके शिलान्यास से मना नहीं करते तो शायद सीधे-सीधे पीएम मोदी के व्हाइट कालर पर भी दाग लग सकते थे।
इस रिपोर्ट में कई कमियां बताई गई हैं। इसमें अनेक ऐसे खुलासे भी सामने आए जो इस बात को इंगित करते है कि अडानी को मोदी की सरपरस्ती नहीं होती तो इस परियोजना में इतना झोल नहीं होता। सबसे पहले तो यह बात सामने आई कि अडाणी पावर बेहद आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है। प्लांट शायद बने ही ना। गर बन भी गया तो बांग्लादेश के लिए न केवल महंगी बिजली पैदा करेगा बल्कि खतरनाक भी साबित होगा। बता दें कि अडाणी के इस प्लांट से बांग्लादेश को 8.71 रु. प्रति टका प्रति किलोवाट आवर के हिसाब बिजली मिलेगी जबकि बांग्लादेश में ही 5 कंपनियां ऐसी हैं जो 3.24 से 7.78 टका, प्रति किलोवाट आवर की दर से बिजली दे रही हैं।
इसके साथ ही रिपोर्ट में इस बात की शंका भी जाहिर की गई कि यह प्रोजेक्ट सिर्फ और सिर्फ अडाणी को ही फायदा दिलाएगा, बांग्लादेश के लोगों को नहीं। बताते चले कि गोड्डा प्लांट से बनने वाली 1600 मेगावाट बिजली बांग्लादेश भेजी जानी है। रिपोर्ट में इस बात को लेकर भी आगाह किया कि प्लांट 2022 से पहले उत्पादन शुरू नहीं कर पाएगा। जब अडाणी का यह पावर प्रोजेक्ट कर्ज में है तो समय पर इसके शुरू होने में भी अंदेशा है। सनद रहे कि मार्च 2017 में झारखंड की चीफ सेक्रटरी ने कहा था कि जून में अडाणी का यह प्रोजेक्ट शुरू हो जाएगा, 18 महीनों में यह पूरा भी हो जाएगा लेकिन अडाणी पावर कंपनी खुद यह मान रही है कि मई 2022 से पहले यह प्रोजेक्ट पूरा नहीं होगा। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि अडाणी पावर इस समय कर्ज के चलते परेशान है।
इसलिए आडिटर्स को शक है कि कंपनी नया प्लांट बना पाएगी भी या नहीं। इसके साथ ही आईईईएफए की रिपोर्ट में पर्यावरणीय मुद्दों पर भी सवाल उठाए गए हैं। इसके मुताबिक भारत में 25 वर्षों के लिए कोई भी बिजली वितरण कंपनी पीपीए नहीं कर रही है। पच्चीस वर्षों के लिए कोयले पर चलने वाले प्लांट से पूरा इलाका बुरी तरह से प्रदूषित हो जाएगा जबकि अभी देश में प्रदूषणरहित सस्ती ऊर्जा की मुहिम चल रही है।
इस रिपोर्ट में इस बात की भी शंका जाहिर की गई कि अडानी इस प्लांट से केवल और केवल अपना भला करना चाहते हैं। इस प्लांट के सहारे ही वे आस्ट्रेलिया में मौजूद अपनी बदहाल कोयला कंपनी कार्मिकेल को फिर से खड़ा करना चाहते हैं। वे झारखंड के इस प्लांट में कोयला भी आस्ट्रेलिया स्थित अपनी बदहाल कंपनी से ही मंगाना चाहते हैं। कोयला समुद्र के रास्ते पहले ओडिशा के धामरा पोर्ट पर लाएंगे, फिर धामरा से गोड्डा लाया जाएगा। धामरा- गोड्डा 700 किमी दूर है। फिर ट्रेन से कोयला प्लांट पर पहुंचाया जाएगा, जबकि अडाणी के पास जितपुर कोल माइंस है जो गोड्डा प्लांट से मात्र 16 किमी दूर है। समुद्री रास्ते से कोयला मंगाकर फिर उसे ट्रेन से प्लांट तक पहुंचाना कितना अक्लमंदी का काम होगा। बहरहाल यह सस्ता तो नहीं होगा। खैर। इन सब उलझनों, झंझावाटों और आशंकाओं के बाद भी नरेन्द्र भाई मोदी अगर अडानी के इस पावर प्लांट को लोकार्पित करेंगे तो उंगलियां उठना तो स्वाभाविक है। मोदी उठने वाली इन्हीं उंगलियों के चलते अडानी के इस पावर प्लांट से दूरी बनाए रखे हुए हैं। वैसे भी अडाणी को लेकर अब तक मोदी पर अनेक आरोप-प्रत्यारोप लगते रहे हैं।
- संजय रोकड़े

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