मुद्दा: बलात्कार की विकृत मानसिकता पर कठोर प्रहार हो

मुद्दा: बलात्कार की विकृत मानसिकता पर कठोर प्रहार हो

भारत में जिस प्रकार गत दिनों में पूरे देश में छोटी छोटी बालिकाओं के साथ बलात्कार की घटनाएं मीडिया की सुर्खियों में छायी रही है, उससे भारत की विदेशों में प्रतिष्ठा कम हुई है तथा भारत को जहां अंग्रेजों ने साप व सपेरों का देश कह कर बदनाम किया, अब भारत को अंग्रेज मानसिकता के देशी व विदेशी लोग बलात्कारियों का देश कहने लगे हैं।
भारत में बहुसंख्य समुदाय बच्चियों को देवी का स्थान देकर वर्ष में दो बार नवरात्रियों में व अपने सामान्य रीति रिवाजों में भी पूरे वर्ष महिलाओं व युवतियों को पूजता रहता है व पूजा उनके बिना सम्पूर्ण ही नहीं मानी जाती है, में बलात्कार जैसी घिनौनी हरकत को कतई कोई स्थान नहीं दिया जा सकता है। अगर बलात्कार की घटना में दो अलग अलग समुदाय शामिल हुए तो मीडिया उसको बहुत उछालता है। सरकार भी अगर विशेष दल की हुई तो भी मीडिया प्रोपेगंडा में पीछे नहीं रहता है। भारत की मीडिया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के तहत व विपक्षी दल सत्ता प्राप्ति के लालच में तनिक भी यह नहीं सोचते कि इस प्रकार की घटना का भारत की प्रतिष्ठा व भारत के सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक ताने बाने पर क्या प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। क्या अमेरिका, चीन व यूरोपीय देशों आदि में बलात्कार की घटनाएं नहीं होती है परन्तु वहां मीडिया उनको प्रमुखता से उठाता है। बलात्कार एक नृशस: घटना होती है तथा 12 वर्ष से छोटी बच्चियों के साथ तो यह अपराध बहुत ही विकृत हो जाता है। तभी केन्द्रीय महिला व बाल विकास मंत्री श्रीमती मेनका गांधी के प्रयास तथा सार्वजनिक मांग पर केन्द्र सरकार ने राष्ट्रपति से यह अध्यादेश जारी करवाया कि 12 वर्ष से कम की बच्चियों के बलात्कार के दोषियों को फांसी की सजा दी जानी चाहिए।
उधर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिस प्रकार विदेशों में घूम घूम कर अथक प्रयास करके भारत की प्रतिष्ठा को चमकाने की कोशिश करते रहते है परन्तु उनसे राजनीतिक विद्वेष रखने वाले राजनेता व राजनीतिक दल भारत की प्रतिष्ठा को ही ताक पर रख कर उसकी बदनामी करने में कुछ भी कौताही नहीं करते हैं। देश में केवल कठुआ व उन्नाव में ही निर्दोष नाबालिग बच्चियों की बलात्कार के उपरान्त उनकी हत्या नहीं हुई देश में अन्य भागों में भूत काल में भी इस प्रकार की जघन्य घटनाएं हुई हैं व नित्य हो भी रही हैं। इस प्रकार की घटनाओं से पूरे देश में व्यापक गुस्सा व्याप्त होता है तथा यह समझा भी जाता है कि यह भारत की संस्कृति का हिस्सा कतई नहीं है। यह समाज में विकृत होती मानसिक स्थिति का द्योतक है।
बलात्कार में कड़ी सजा का प्रावधान इस प्रकार की घटनाओं में प्रतिरोधक का काम करेगा क्योंकि नाबालिगों के खिलाफ अपराधों के खिलाफ कानून को 2015 में सख्त बनाये जाने का सकारात्मक परिणाम देखने को मिला है। कठुआ कांड को लेकर विदेशों में भारत की किरकिरी हुई। वहीं दिल्ली सहित पूरे देश में अनेक नगरों में लोगों ने प्रदर्शन कर कड़े कानून की मांग भी की। इससे यह तो सबित होता है कि आज आम भारतीय नागरिक इस प्रकार की घटनाओं से व्यथित है व निराश है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो इन घटनाओं को निदंनीय व शर्मसार करने वाली घटना बताया। दिल्ली में महिला आयोग की अध्यक्षा स्वाति मालीवाल ने भूख हड़ताल कर कड़े कानून की मांग की। देश में वरिष्ठ नागरिक, युवा वर्ग व बच्चे सभी प्रदर्शन कर निंदा कर रहे हैं। इस समय देश के बुद्धिजीवी, कलाकार, खिलाड़ी, राजनेता, पत्रकार, फिल्मकार, इत्यादि सभी श्रेणी के लोग इन घृणित अपराधों पर चिन्तित है। खिलाड़ी सानिया मिर्जा ने तो यहां तक कहा कि हम अगर आठ वर्ष की बच्ची के लिए खड़े नहीं हो सकते तो हमें और किसी भी चीज के लिए खड़े होने का कोई हक नहीं है, इंसानियत के लिए भी नहीं। देश उनसे सहमत है।
देश में इस प्रकार की विकृत मानसिकता क्यों बढ़ती जा रही है? सामाजिक मीडिया के विभिन्न स्रोत जैसे व्हाटस ऐप, फेसबुक, टिवीट्र, तथा यू टयूब आदि आजकल जिस प्रकार अश्लील सामग्री समाज में परोस रहे हैं तथा बहुत कम कीमत पर हमारा युवा व नाबालिग वर्ग इसको बार बार मोबाइल पर देख व सुन रहा है उससे उनकी रूचि सेक्स के प्रति बढ़ती जा रही है। सोशल मीडिया पर सेक्स के प्रचार व प्रसार पर प्रभावपूर्ण रोक लगायी जानी चाहिए। शिक्षा में नैतिक व आचार विचार की व महापुरुषों के द्वारा किये गये कृत्यों व उनके द्वारा दी गई शिक्षा की व्यापक स्तर पर शिक्षा की दी जानी चाहिए। सामान्य रुप से फिल्म, विज्ञापन, सोशल मीडिया पर हिंसा पर भी प्रतिबंध होना चाहिए। बच्चियों व छोटे बच्चों को अश्लील हरकतों व कृत्यों से बचाना हमारा प्राथमिकताओं में शामिल होना चाहिए। जिस प्रकार हम यातायात के नियमों को बताने के लिए स्कूलों व अन्य सार्वजनिक स्थानों का सहारा लेते है उसी प्रकार बच्चों को भी अच्छे व बुरे स्पर्श को बताना चाहिए।
- डा. सूर्य प्रकाश अग्रवाल

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