विश्लेषण: पानी की समस्या को सरकार और समाज दोनों मिलकर हल करें

विश्लेषण: पानी की समस्या को सरकार और समाज दोनों मिलकर हल करें

जल यानी बुनियादी मानवाधिकार। कहा भी जाता है कि - जल है तो कल है या बिन पानी सब सून। इन सबके बावजूद भारत में शुद्ध जल आज भी आम जनता के लिए दूर की ही कौड़ी है। हमारे देश में पानी की भारी कमी होने के बाद भी भविष्य उज्ज्वल नहीं दिखाई दे रहा है। यूनेस्को की जो हालिया रिपोर्ट आई है वह देश में पानी की समस्या को कम बताने की बजाय बढंने का ही अंदेशा जाहिर कर रही है। मतलब पानी को लेकर अभी जो परेशानी है वह भविष्य में और भी चिंताजनक होने वाली है। रिपोर्ट के मुताबिक 2050 तक भारत में भारी जल संकट आने वाला है। इसमें ऐसी शंका जाहिर की गई है कि तीन दशक में देश के जल संसाधनों में करीब 40 फीसदी तक की कमी आने की संभावना है। देश की बढ़ती आबादी को ध्यान में रखें तो प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता बड़ी तेजी से घट रही है। यह एक कड़ी चेतावनी है, जिसे गंभीरता से लेने के अलावा हमारे सामने और कोई चारा नहीं है। भारत में पानी की समस्या को लेकर उत्तरी इलाके में तो स्थिति पहले से ही खराब है लेकिन अब इसकी चपेट में दूसरे इलाके भी आ रहे हैं।
पानी की समस्या ने इतना विकराल रूप कैसे ले लिया है इस पर भी विचार करना जरूरी है। दरअसल आज लोगों को पानी नहीं मिलने की मुख्य वजह पानी की कमी नहीं है बल्कि उसके प्रबंधन की कमी है। पानी को लेकर अभी भी हमारी कोई स्पष्ट नीति है। आज भी हमारी नीति बड़े-बड़े बांध बनाना है जबकि भारत में बांधों से फायदा कम, नुकसान ज्यादा है। इस बात को यूएन भी स्पष्ट कर चुका है। भारत में बड़ी तादाद में बन रहे बांधों के चलते लोगों का विस्थापन हो रहा है। वर्ल्ड कमीशन आन डैम्स ने अपनी स्टडी में कहा है कि भारत में बड़े पैमाने पर चल रहे वाटर डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के चलते विस्थापन, मिट्टी का कटाव, पानी का जमाव जैसी समस्याएं तेजी से सामने आ रही है। काबिलेगौर हो कि दुनियाभर में बगैर साफ पानी के गुजारा करने वाले 84.4 करोड़ लोगों में से 16.3 करोड़ अकेले भारत में मौजूद हैं। मतलब साफ है कि भारत का अपने लोगों तक साफ पानी पहुंचाने का सीधा असर वैश्विक लक्ष्य की सफलता पर पड़ेगा। आज देश में जरूरत इस बात की है कि हम जल को लेकर जागरूकता फैलाएं। इसके बिना धरती पर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है।
आज हमारे देश के शहर बेंगलूरू में तेजी से पानी समस्या उभर रही है। पानी से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्था वाटरएड की रिपोर्ट बताती है कि भारत का बेंगलुरू दुनिया का दूसरा ऐसा शहर बन सकता है जहां पानी बहुत जल्दी खत्म हो सकता है। बता दें कि दो दशक में बेंगलुरु का वाटर टेबल (जमीन का जलस्तर) 10-12 मीटर से बढ़कर 76-91 मीटर तक नीचे चला गया है, वहीं, बीते 30 सालों में पानी निकालने के लिए खुदे हुए कुंओं की संख्या भी तेजी से कम हुई है। इसके इतर भी बेंगलुरु में पानी की कमी की दूसरी वजहें भी रही है।
सबसे पहली वजह तो हम जनसंख्या को मान सकते है। 2012 में शहर की जनसंख्या 90 लाख थी। 2018 में ये आंकड़ा 1 करोड़ 10 लाख पहुंच गया है। जिस तेजी से शहर में जनसंख्या बढ़ी है उस तेजी से पानी की उपलब्धता नहीं हो पाई है। इस कारण पानी के स्रोतों पर दबाव बढ़ा। सनद रहे कि 2031 तक बेंगलुरू शहर की जनसंख्या अनुमानित 2 करोड़ तक पहुंच जाएगी। अभी 2018 में यहां प्रति व्यक्ति- प्रतिदिन 100 लिटर पानी की उपलब्धता है जबकि कर्नाटक सरकार के मुताबिक, 2031 तक प्रति व्यक्ति एक दिन में सिर्फ 88 लीटर पानी ही इस्तेमाल कर पाएगा। यह स्थिति तेजी से बढ़ती जनसंख्या के कारण निर्मित हो रही है।
जनसंख्या के बढऩे से पिछले कुछ सालों में बेंगलुरु के आसपास के करीब 100 गांव भी खत्म हो गए है। बेंगलुरु में बीते कुछ सालों में बिना किसी प्लानिंग के शहरीकरण हुआ है। इस कारण गांवों में अतिक्रमण की समस्या भी सामने आई। गांवों के विलय और अतिक्रमण के कारण 79 फीसदी तालाब खत्म हो चुके हैं। वहीं मानव निर्मित इन्फ्रास्ट्रक्चर 1973 के 8 फीसदी के आंकड़े से बढ़कर 77 प्रतिशत हो गया। इन्फ्रास्टक्चर बढऩे से पेड़-पौधों में भी भारी कमी आई है। पेड़-पौधों की कमी से बारिश के पैटर्न में बदलाव हुआ है।
यहां पानी की कमी की एक बड़ी वजह उसका रख- रखाव भी है। यहां पानी को इक_ा करने का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है। फैक्ट्रियों के कचरे से तालाबों का पानी भी खराब हो रहा है। तालाबों का पानी खराब होने से भी पानी की कमी होने लगी है। बता दें कि बेंगलुरू में 1970 में करीब 300 तालाब हुआ करते थे उनमें से अब सिर्फ 180 के करीब तालाब ही बचे हैं। तालाबों पर तेजी से अतिक्रमण होता जा रहा है। इनमें भी सिर्फ 85 फीसदी पानी ही साफ और सिंचाई के लायक बचा है। अभी यहां पानी की आपूर्ति बोरवेल के जरिए होती है। जितनी मांग बढ़ेगी, उतना ग्राउंड वाटर लेवल में कमी आएगी। दिक्कत तो यह है कि इतनी परेशानी होने के बावजूद बेंगलुरुवासी पीने लायक पानी में से आधा बर्बाद कर देते हैं।
बहरहाल स्थिति जो भी लेकिन वर्तमान में भी देश के 16 करोड़ लोगों को पेयजल नसीब नही हो रहा है। जबकि करीब 7.5 करोड़ हिंदुस्तानी शुद्ध पेयजल से वंचित हैं। हर साल देश के 1.4 लाख बच्चे गंदे पानी से होने वाली बीमारियों से मर जाते हैं। इस संकट की बड़ी वजह भूमिगत जल के लगातार दोहन के रूप में सामने आई है। भूमिगत जल दोहन में भारत का दुनियां में अव्वल स्थान है। हम पानी की 80 फीसदी से ज्यादा जरूरत भूजल से पूरी करते हैं लेकिन इसे दोबारा भरने की कभी नहीं सोचते।
संकट का अहम पहलू तो यह है कि भूमिगत जल लगातार प्रदूषित भी होता जा रहा है। औद्योगिक इलाकों में घुलनशील कचरा जमीन में डाल दिया जाता है। हाल में गांव-गांव में जिस तरह के शौचालय बन रहे हैं, उनसे गड्ढों में मल जमा होता है जिसमें मौजूद बैक्टीरिया भूजल में पहुंच रहे हैं। बता दे कि भारत में ताल-तलैयों के जरिए जल संचय की पुरानी परंपरा थी। बारिश का पानी बचाने के कई तौर- तरीके लोगों ने विकसित किए थे लेकिन सब भुलाते जा रहे हैं। वास्तव में जल संकट लाईलाज नहीं है लेकिन हमने इसे बना दिया है।
अब सबके सामने सौ टके का एक ही सवाल है कि पानी की समस्या कैसे हल होगी। बता दे कि पानी की सहज, सुलभ उपलब्धता व बहुलता के लिए सबसे पहले हमें वर्षा जल को संरक्षित करना होगा। इसके साथ ही हमें फिर से घने जंगल बनाने होंगे। नदियों और दूसरे जल स्रोतों के आस-पास कटाव रोकने के लिए पौधे तो लगाएं लेकिन उनकी सुरक्षा भी करें ताकि वे पेड़ बन सकें। संयुक्त राष्ट्र ने खुद कहा है कि अगर इंसानों के लिए साफ पानी को बचाना है तो पहले हमें अपने इकोसिस्टम को सुधारना होगा। इसके साथ ही एक सच यह भी है कि सूखा उन देशों में ज्यादा रहा जहां जल स्रोतों का संरक्षण नहीं किया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि करोड़ों लोग जल अभाव या फिर इसकी वजह से पैदा हुई परेशानियों की वजह से जान गंवाते चले गए।
पानी की समस्या से निजात पाने के लिए युद्ध स्तरीय प्रयास के बिना कुछ संभव नहीं हो सकता है। हाल में पैराग्वे जैसे छोटे, गरीब देश ने सफलता पूर्वक इसका इलाज कर लिया है। दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन शहर ने इस संकट से निपटने के रास्ते खोज लिए हैं। हमारे लिए भी यह असंभव नहीं है बशर्ते सरकार और समाज दोनों मिलकर इसके लिए प्रयास करें।
-संजय रोकड़े

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