विश्लेषण: सीलिंग में उलझी दिल्ली

विश्लेषण: सीलिंग में उलझी दिल्ली

पिछले चार माह से अदालती निर्देशों पर दिल्ली में सीलिंग का जो अभियान चल रहा है। उसकी जद में अभी तक चार हजार से ज्यादा सम्पत्तियां आ चुकी हैं और आए दिन देश की सर्वोच्च अदालत का इस मामले में जो कड़ा रूख देखने को मिल रहा है, उससे न केवल केन्द्र सरकार की जमकर फजीहत हो रही है बल्कि दिल्ली के कारोबारियों की सांसें भी अटकी हैं क्योंकि यदि सीलिंग का अभियान इसी प्रकार चलता रहा तो आने वाले दिनों में अभी ऐसी ही हजारों और सम्पत्तियां सीलिंग की जद में आने वाली हैं और इससे न केवल इन कारोबारियों बल्कि इन दुकानों तथा व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर कार्य कर अपना व अपने परिवार का पेट भरने वाले हजारों लोगों के समक्ष रोजी-रोटी का संकट पैदा होने का भी खतरा मंडरा रहा है। यही कारण है कि व्यापारी दिल्ली में अब तक 4 बार बड़ी हड़ताल कर चुके हैं।
दिल्ली में नियमों का उल्लंघन कर व्यावसायिक क्षेत्रों में किए गए अवैध निर्माण तथा रिहायशी क्षेत्रों में चल रही दुकानों या प्रतिष्ठानों को सील किया जा रहा है। 1962 में राजधानी दिल्ली के लिए बनाए गए मास्टर प्लान पर सही तरीके से अमल न हो पाने के कारण दिल्ली में जिसको जहां जगह मिली, वहीं बसता चला गया और इस तरह डीडीए, एमसीडी और सरकारी निकम्मेपन के चलते दिल्ली में इतने वर्षों में अवैध निर्माणों का ऐसा अंबार लग गया जिसकी वजह से आज देश की राजधानी की सूरत बदहाल हो चुकी है।
1981 में एक और मास्टर प्लान लाया गया जिस पर मुहर ही 9 सालों बाद 1990 में लग पाई लेकिन उसका भी दिल्ली की तस्वीर सुधारने में कोई उपयोग नहीं किया गया। 2006 में अदालती निर्देश पर सीलिंग की कवायद शुरू होने के पश्चात् एक और मास्टर प्लान 'विशेष प्रावधान कानून 2006' लाया गया और अवैध निर्माणों को वैध बनाने की पहल की गई किन्तु उसके बाद भी दिल्ली में हजारों अवैध निर्माण होते रहे किन्तु न सरकारों ने इस दिशा में कोई कार्रवाई की और न ही डीडीए तथा एमसीडी ने ऐसे अवैध निर्माणों के खिलाफ शिकंजा कसा, नतीजा सबके सामने है।
सुप्रीम कोर्ट ने इसी सिलसिले में केन्द्र व दिल्ली सरकार और स्थानीय निकायों को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा भी है कि 2006 से ही इस मामले में प्राधिकारियों की ओर से निरंतर चूक का सिलसिला जारी है और इसी निष्क्रियता के चलते न केवल नागरिकों और विशेषकर बच्चों के फेफड़े खराब हो रहे हैं, अवैध निर्माणों की वजह से दिल्ली की जनता प्रदूषण, पार्किंग और हरित क्षेत्रों की समस्या से जूझ रही है। जस्टिस मदन बी लोकूर और दीपक गुप्ता की पीठ का दो टूक शब्दों में कहना है कि समाज में हर व्यक्ति का कुछ न कुछ सम्मान है और दिल्ली की जनता मवेशी नहीं है।
क्यों रहने लायक नहीं है दिल्ली?
दिल्ली में बढ़ती भीड़-भाड़ तथा गली-गली में खुली दुकानों व अन्य व्यावसायिक गतिविधियों के चलते दिल्ली की प्रमुख सड़कों की बात तो दूर, गली-मोहल्लों तक में पार्किंग, ट्रैफिक जाम और अन्य नागरिक सुविधाओं की समस्या दिनोंदिन बढ़ रही है। दिल्ली की हवा में घुलते जहर और इसके खतरनाक दुष्परिणामों से हम कुछ समय से लगातार रूबरू हो ही रहे हैं। इन समस्याओं के चलते ही कुछ समय से अदालतों और एनजीटी की कड़ी प्रतिक्रिया तथा कठोर फैसले देखने को मिल रहे हैं और यह टिप्पणियां भी सुनने को मिल रही हैं कि दिल्ली अब रहने के लायक नहीं रही।
केन्द्रीय आवास और शहरी विकास राज्यमंत्री हरदीप सिंह पुरी भी सीलिंग की कार्रवाई को दिल्ली के बेहतर भविष्य की पहल बताते हुए स्वीकार करने लगे हैं कि दिल्ली को विश्वस्तरीय शहर बनाने के लिए कड़े फैसले लेने ही पड़ेंगे। उन्होंने यह स्वीकारने का साहस दिखाया है कि लोगों ने अपनी सहूलियत के मुताबिक मास्टर प्लान के नियमों का उल्लंघन किया तथा पिछली सरकारों ने नियम तोडऩे वालों को दंड से माफी दी, इसी कारण दिल्ली को रहने लायक शहर बनाने व राजनीतिक संरक्षण में की गई गलतियों को सुधारने के लिए सुप्रीम कोर्ट को सीलिंग जैसा सख्त कदम उठाना पड़ा लेकिन यहां सबसे अहम सवाल यह है कि समूची दिल्ली में बरसों से बड़े पैमाने पर इन नियमों का अतिक्रमण होते रहने के बावजूद इन नियमों का पालन कराने के लिए जिम्मेदार लोग कहां सोये थे? रिहायशी इलाकों में दुकानें या अन्य व्यावयासिक प्रतिष्ठान कोई दो-चार दिन में तो बने नहीं बल्कि इनमें से बहुत से 30-40 साल पुराने हैं।
एक ओर जहां अवैध निर्माण या अवैध व्यावसायिक गतिविधियों के चलते दिल्ली इन दिनों सीलिंग के महासंकट से जूझ रही है, वहीं इसके बावजूद आज भी दिल्ली के विभिन्न इलाकों में अवैध निर्माण का सिलसिला बदस्तूर जारी है। कई जगहों पर तो उच्च क्षमता वाली बिजली की लाइनों के ठीक नीचे अवैध निर्माण और अतिक्रमण हो रहे हैं और इसी कारण गत दिनों हाईकोर्ट द्वारा नाराजगी जाहिर करते हुए दिल्ली सरकार और डीडीए को अवैध रूप से निर्मित मकानों को शुल्क के भुगतान के बाद भी नियमित करने पर रोक लगाने का सुझाव देने पर विवश होना पड़ा। आज भी अदालतों के कड़े रूख के बावजूद दिल्ली में जिस प्रकार राजनीतिक संरक्षण में अनधिकृत निर्माण चल रहे हैं, जहां न सुरक्षा मानकों का ध्यान रखा जाता है और न ही बुनियादी नागरिक सुविधाओं का, उसके मद्देनजर कहना गलत न होगा कि सीलिंग की मौजूदा समस्या राजनीतिक तंत्र की निष्क्रियता की ही देन है।
असमंजस की स्थिति
दिल्ली की बदहाल तस्वीर को देखते हुए अदालत की चिंताएं अपनी जगह सही हैं और दिल्ली के व्यापारियों का दर्द अपनी जगह लेकिन इस समय वास्तविक स्थिति यह है कि सीलिंग को लेकर जो परिस्थितियां पैदा हो रही हैं, न सरकार को और न ही डीडीए या एमसीडी को कुछ समझ आ रहा है कि सीलिंग की इस गंभीर समस्या को अब किस प्रकार सुलझाया जाए क्योंकि दिल्ली के मास्टर प्लान 2021 में बदलाव की सरकार की कोशिशों को अदालत पहले ही खारिज कर चुकी है। अदालत ने कहा भी है कि यह तो अवैध को वैध बनाने का तरीका हुआ तथा सरकार से यह भी जानना चाहा कि आप 2020 तक के अनधिकृत निर्माण को संरक्षण देंगे तो क्या ये अवैध गतिविधियां 2020 तक जारी रहेंगी। क्या सरकार ने किसी समाधान के बारे में सोचा है या वह कारोबारियों को, शहर को बंधक बनाने की छूट देना चाहती है।
अदालत की चिंता इस बात को लेकर भी है कि दिल्ली में न केवल जगह-जगह सड़कों पर गाडिय़ां खड़ी की जा रही हैं बल्कि पैदलपथ और सड़कों पर भी अतिक्रमण हो चुका है। हालांकि केन्द्र के अतिरिक्त सालिसीटर जनरल एएनएस नाडकर्णी ने अदालत में कहा था कि दिल्ली में लाखों प्रवासी हैं जिस कारण मांग और आपूर्ति के बीच अंतर है और यहां करीब 1400 अनधिकृत कालोनियां हैं जिनमें 6 लाख परिवार रहते हैं लेकिन अदालत ने इसे शासन का गंभीर मामला बताते हुए साफ शब्दों में कहा है कि दिल्ली की जनता खामियाजा भुगत रही है और सरकारें अपना काम नहीं कर रही हैं। सीलिंग को लेकर उत्पन्न हुई स्थिति की गंभीरता और अदालत की नाराजगी को इसी से समझा जा सकता है कि जब सरकार की ओर से अदालत को इस मामले की निगरानी करने को कहा गया तो अदालत द्वारा सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा गया कि आप कुछ नहीं कर रहे हैं, इसीलिए हमें अनेक चीजों की निगरानी करनी पड़ रही है और जब अदालत कुछ कहती है तो उसे न्यायिक सक्रियता कहा जाता है। अदालत का यहां तक कहना है कि भारत सरकार अपनी आंखें मूंद सकती है लेकिन हम ऐसा नहीं कर सकते।
कारोबारियों का संकट
खून-पसीने की लाखों रुपये की जमा-पूंजी लगाकर बरसों की मेहनत के बाद कोई छोटी-मोटी दुकान या व्यवसाय शुरू कर अपने परिवार का पेट पालते-पालते जब एक ही झटके में सीलिंग जैसी कार्रवाई से वह कारोबार उजड़ जाता है तो उससे बड़ा सदमा उस व्यक्ति के लिए और कुछ नहीं हो सकता। ऐसे में अगर कुछ तबकों द्वारा दिल्ली में सीलिंग के चलते हजारों दुकानें बंद होने के कारण बेरोजगारी बढऩे और कानून व्यवस्था खराब होने की आशंका जताई जा रही है तो इस चिंतनीय स्थिति के समाधान के उपाय भी समय रहते खोजने ही होंगे।
सरकारी तंत्र को कुछ ऐसी पहल करनी चाहिए ताकि सीलिंग के कारण सड़कों पर आए दुकानदारों को रोजगार के अन्य साधन सहजता से उपलब्ध हो सकें ताकि वे अपने परिवार की आजीविका चला सकें। हालांकि सीलिंग को बंद कराने के लिए चैंबर आफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री द्वारा प्रधानमंत्री को पांच लाख पत्र भेजे जा रहे हैं लेकिन सरकारी स्तर पर सीलिंग को लेकर बनी असमंजस की स्थिति ने दिल्ली के हालात बहुत खराब कर दिए हैं और ऐसे में अभी यह कहना बड़ा मुश्किल है कि दिल्ली सीलिंग का दंश कब तक भुगतेगी?
- योगेश कुमार गोयल

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