राष्ट्ररंग: सियासी जंग के लिए बिछती बारूदी सुरंगें

राष्ट्ररंग: सियासी जंग के लिए बिछती बारूदी सुरंगें

लोकसभा चुनावों को अभी एक वर्ष बाकी है लेकिन माहौल अभी से इतना गर्म हो गया है कि न संसद ठीक से चल रही है, न सियासत। कुछ तत्वों को अपनी राजनीति चमकाने के लिए समाज को बांटने से भी गुरेज नहीं इसलिए कभी किसी फिल्म के नाम पर तो कभी न्यायालय के किसी आदेश के लिए सरकार को दोषी ठहराते हुए बंद, हंगामा, हिंसा, तोडफ़ोड़ होती है तो कभी बंद के विरोध में बंद। यह कोई आश्चर्य नहीं कि हर प्रदर्शन, हिंसा में कुछ गिनेचुने चेहरे ही दिखाई पड़ते हैं। स्पष्ट है कि कुछ ऐसी शक्तियां सक्रिय हैं जिन्हेें देश के समक्ष चुनौतियों, समस्याओं, मुद्दों से कुछ लेना-देना नहीं हैं। वे पूरी तरह से प्रयासरत है कि हर तरफ कानून व्यवस्था की असफलता और अराजकता दिखाई दे। राजनीति हमेशा होती है, होती रहेगी लेकिन यह पहली बार है कि राजनीति को इतना जहरीला बनाया जा रहा है कि देश का चाहे कितना भी अहित हो जाये, समाज में कितनी भी कटुता फैल जाये पर मोदी नहीं रहना चाहिए। इसी लक्ष्य को केन्द्रित करते हुए एक के बाद एक बंद, हड़ताल, प्रदर्शन, उपवास, अनशन, अटपटे भाषणों की बाढ़ लाई जा रही है। दुर्भाग्य की बात यह कि कोई भी दूध का धुला नहीं। भाषा संयम तो जैसे राजनीति से बाहर हो गया है लेकिन यह प्रश्न भी सम्पूर्ण राष्ट्र से उत्तर की अपेक्षा कर रहा है कि क्या राजनीति से शालीनता और विचारधारा का हमेशा के लिए तलाक हो चुका है?
यदि परिस्थितियों की विवेचना करें तो संसद के बजट सत्र के दौरान ही अचानक बहुत कुछ तेजी से बदला। लोगों के मन में यह सवाल उमड़ रहा है कि आखिर बहुमत के बावजूद भाजपा लोकसभा क्यों नहीं चला सकी। कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी राजनीति के अंतर्गत वह भी ऐसा चाहती थी। विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस देकर भी उसे प्रस्तुत करने का साहस क्यों नहीं कर सका। क्या अविश्वास प्रस्ताव की निश्चित हार के अतिरिक्त भी किसी हानि का भय था। चार साल साथ बिताने के बाद आंध्र में चंद्रबाबू नायडू का तेलुगू देशम वोट बैंक की चिंता में दूरी दिखाने को विवश है तो लगातार अपने घटते कद से परेशान सत्ता में साथ रहते हुए भी शिव सेना हमलावर बनी हुई है। उत्तरप्रदेश में सरकार में शामिल एक छोटे दल के नेता ने भी आंखें दिखाने के लिए यही समय चुना। कर्नाटक विधानसभा चुनावों में बढ़त लेने के लिए कांग्रेस द्वारा बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यकता का स्वाद चखाने का प्रयास इसी कड़ी का हिस्सा है।
गुजरात चुनाव में कड़ा मुकाबला, राजस्थान, मध्यप्रदेश के बाद उत्तर प्रदेश के उपचुनाव में भाजपा को झटके लगने के शोर के कारण पूर्वोत्तर में पहली बार जोरदार सफलता दब कर रह गई है। विपक्ष का उत्साह बढ़ रहा है तो सत्तारूढ़ दल का परम्परागत वोटर विभिन्न कारणों से खिन्न है। महंगी दालों, सब्जियों के नाम पर राजनीति करने वाले दालों, सब्जियों के सस्ती होने पर चर्चा करने की बजाय अन्तर्राष्ट्रीय बाजार मूल्यों से जुड़े पेट्रोल डीजल के दामों पर ताने कसते हुए औंधे मुंह गिरे इन्टरनेट डाटा में भी गड़बड़ देख रहे हैं। उन्हें लगने लगा है कि अपने परंपरागत गढ़ों में कमजोर हो रही मोदी टीम की अपराजेय होने की अवधारणा बदली जा सकती है हालांकि इसी बीच हुए कुछ सर्वेक्षणों का मत है कि यदि आज भी चुनाव हो जाएं तो थोड़े फेरबदल के साथ भाजपा नेतृत्व वाला एनडीए ही सरकार बनायेगा।
बेशक ऐसे सर्वेक्षणों को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता परंतु कुछ कारणों से सरकार से रुष्ट वर्ग भी इस बात से सहमत है कि विदूषक की छवि वाले किसी अगंभीर व्यक्ति अथवा नेतृत्व के लिए आपस में लड़ते गठबंधन को सत्ता सौंपना देशहित में नहीं होगा। अंतत: यह विकल्पहीनता भाजपा को फिर से बढ़त दिलाने में सफल होगी। यदि बंगाल में हिन्दुओं के साथ अच्छा व्यवहार न होने की स्थिति पर विपक्ष ने निंदा करने से कोताही बरती अथवा ममता बनर्जी ने ध्यान न दिया तो विपक्ष की विश्वसनीयता का पतन तय है। कर्नाटक परिणाम दक्षिण की राजनीति का संकेत देंगे जहां पुराने नेता परिदृश्य से हट रहे हैं तो अगली पीढ़ी जोश में है लेकिन इस बात से शायद ही कोई असहमत होगा कि राजस्थान की स्थिति भाजपा के प्रतिकूल है लेकिन इसके भी कई कारण बताये जा रहे हैं। कुछ के अनुसार हर बार बदलाव राजस्थान की परम्परा है तो कुछ प्रदेश नेतृत्व की हठधर्मिता को जिम्मेवार ठहराते हैं। यदि वास्तव में ऐसा है तो भाजपा नेतृत्व को न केवल राजस्थान बल्कि शेष राज्यों में भी अपने समर्पित कार्यकर्ताओं की संभाल करनी चाहिए क्योंकि उसके कुछ कार्यकर्ता अक्सर यह शिकायत करते पाये जाते हैं कि कांग्रेस अपने कार्यकर्ताओं के उचित अनुचित हितों का बहुत ध्यान रखती है परंतु भाजपा कार्यकर्ताओं के उचित कामों को तो टाल दिया जाता है जबकि राहुल एकाधिक बार कह चुके हैं कि हर विभाग में भाजपाई बैठे हैं पर भाजपाई कार्यकर्ताओं के मतानुसार, 'आज भी वामी, कांग्रेसी अपना काम निकालने में सफल हैं पर उनकी बात नहीं सुनी जाती।' सत्य सत्ता के करीबी लोग ही बता सकते हैं परंतु कोई भी संगठन अपने कार्यकर्ताओं की अनदेखी नहीं करता। यदि करता है तो समय आने पर कार्यकर्ता भी दिल से काम करने की बजाय स्वयं को औपचारिकता निभाने तक सीमित कर लेते हैं। एक बार 'गुडफील' कर चुके दल को अपनी अच्छी योजनाओं का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंचाने के लिए तत्काल इस ओर ध्यान देना चाहिए। केन्द्र को देश का माहौल खराब करने में लगे तत्वों के साथ सख्ती से पेश आना चाहिए। चुनावी हार जीत होती रहती है लेकिन सियासी जंग जीतने के लिए सामाजिक विद्वेष रूपी बारूदी सुरंग बिछाने वालों को हर हालत में रोका जाना चाहिए। यदि मोदी जी ऐसा करने में सफल रहते हैं तो वे फिर से चुने जाने के सर्वथा योग्य हैं और दुर्भाग्य से यदि वे ऐसा नहीं कर सके तो देश को फिर एक बार त्रिशंकु की स्थिति में फंसने से बचाया नहीं जा सकता।
- डा. विनोद बब्बर

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