विश्लेषण: सुप्रीमकोर्ट के फैसले से नाराजगी कैसी?

विश्लेषण: सुप्रीमकोर्ट के फैसले से नाराजगी कैसी?

देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा एससी-एसटी उत्पीडऩ रोकथाम कानून के दुरुपयोग को रोकने के बाबत की गई व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन में उग्र व हिंसक वारदातें सामने आई। इसी बीच केंद्र सरकार ने अदालत की व्यवस्था के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल की है। सुप्रीम कोर्ट ने भी तत्काल कोई निर्णय लेने के बजाय उचित वक्त पर कदम उठाने की बात की है।
निस्संदेह दलित समाज अपने सुरक्षा कवच के कमजोर होने से आहत है। सदियों की सामाजिक विसंगतियों व अन्याय से मुक्ति दिलाने को यह कानून अस्तित्व में आया। मकसद था कि वंचित समाज को न्याय मिल सके और वे दबंगों के उत्पीडऩ से आत्मस्वाभिमान की रक्षा कर सकें मगर गाहे-बगाहे कानून का अन्य विवादों में बदले की भावना से इस्तेमाल हुआ लेकिन जिस तरह अपनी बात मनवाने के लिये देशभर में तथाकथित दलित संगठनों ने हिंसा का तांडव किया, वो सोचने को मजबूर करता है।
हिंसा के पीछे की राजनीति और संरक्षण की परतें साफ हो रही हैं। भारत बंद की राजनीति ने देश में नयी बहस को छेड़ दिया है। सड़कों पर उतरे अधिकतर आंदोलनकारियों को इस बात का इल्म ही नहीं था कि वे आंदोलन क्यों कर रहे हैं। आंदोलन की पीछे छिपी ताकतों ने दलित समाज को भ्रमित किया कि सरकार ने आरक्षण खत्म कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा बीते दिनों अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कानून के अंतर्गत बिना जांच किये किसी पर मुकदमा और गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। इसके अलावा एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज होनेवाले मामलों में अग्रिम जमानत को भी मंजूरी दे दी थी। अदालत के इसी फैसले से नाराज दलित संगठन कोर्ट से फैसले को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। इसका उद्देश्य उक्त कानून का दुरुपयोग रोकना है। यही हाल तकरीबन दहेज विरोधी कानून के साथ भी था जिसमें वधू पक्ष द्वारा की गई रिपोर्ट के बाद पुलिस वर के पूरे परिवार को ही पकड़ लेती थी। उस के बारे में भी पर्याप्त जांच के बिना गिरफ्तारी किये जाने पर रोक लगा दी गई। दलित संगठनों द्वारा भारत बंद का जो आयोजन किया गया, उसके औचित्य और आवश्यकता को लेकर बहस चल पड़ी है।
पूर्व में दलित उत्पीडऩ की शिकायत पर तत्काल प्रकरण दर्ज करते हुए मुकदमा कायम करने की जो व्यवस्था थी, उसका बेजा उपयोग होने की खबरें अक्सर आया करती थीं। अदालत ने यह व्यवस्था देते वक्त एनसीआरबी के 2015 के आंकड़ों का जिक्र किया है जिसमें उत्पीडऩ के 16 फीसदी मामलों में पुलिस ने जांच के बाद क्लोजर रिपोर्ट लगाई और अदालत में 75 फीसदी मामलों को या तो खत्म कर दिया गया या उसमें अभियुक्त बरी हो गये या फिर उन्हें वापस ले लिया गया। अदालत का मानना था कि ऐसे मामलों में सात दिन तक जांच हो जाये, डीएसपी स्तर के अधिकारी की जांच में यदि जरूरी न हो तो गिरफ्तारी न की जाये। सरकारी कर्मचारी के मामले में नियोक्ता और आम आदमी के मामले में एसपी की अनुमति जरूरी हो। साथ ही यदि न्यायिक समीक्षा के बाद लगता है कि शिकायत में बदनीयती की भावना है तो वहां अग्रिम जमानत पर संपूर्ण रोक नहीं है।
दलितों के घर जला देना, उनकी स्त्रियों के साथ सामूहिक बलात्कार और हत्या के मामले लगातार सामने आते रहते हैं, इसलिए इन नृशंस अपराधों के प्रति एससी-एसटी एक्ट को सख्ती से लागू किया जाना बहुत जरूरी है और इसकी आवश्यकता से कोई भी संवेदनशील व्यक्ति इनकार नहीं कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट की अनिवार्यता को स्वीकार करते हुए सिर्फ छोटे मामलों में एफआईआर दर्ज करने से पूर्व जांच की एक प्रक्रिया निर्धारित की है। इस प्रक्रिया का किसी भी प्रकार की हिंसा, हत्या या बलात्कार के मामलों से कोई लेना-देना नहीं है। इन नृशंस अपराधों के लिए फौजदारी कानून के जो प्रावधान हैं और जिन्हें एससी-एसटी एक्ट के जरिए और अधिक मजबूती प्रदान की गई है, उन्हें बिलकुल भी छेड़ा नहीं गया है लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि एससी-एसटी एक्ट का निजी फायदे या शत्रुता का बदला लेने के लिए दुरुपयोग भी सामान्यत: हो रहा है। आंकड़े बताते हैं कि गुजरात देश के उन राज्यों में है जहां दलितों पर अत्याचार की घटनाएं सबसे ज्यादा होती हैं। वर्ष 2016 के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक गुजरात में दलितों पर अत्याचार की घटनाएं 32.5 फीसद दर्ज र्हुइं जो कि राष्ट्रीय औसत 20.4 फीसद से बहुत ज्यादा था। यही हाल उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान और आंध्र प्रदेश का भी है। दूसरी तरफ दलितों पर अत्याचार के मामलों में दोषसिद्धि की दर काफी कम है।
दलित समुदाय का असली शोषण तो उसके नाम से नेतागिरी कर रहे सफेदपोश करते हैं फिर चाहे वे राजनीतिक नेता हों या कर्मचारी संगठनों के कर्ताधर्ता। बंद से सरकार पर भले दबाव बना दिया जावे किन्तु सर्वोच्च न्यायालय पर इसका कोई प्रभाव शायद ही पड़े जिसने कानून के अव्यवहारिक प्रावधान को बदलने का फैसला दिया। उसे सीधे-सीधे दलित विरोधी बता देना न्यायपालिका के प्रति भी एक तरह का अविश्वास है। सबसे बड़ी बात यह है कि दलितों के सम्मान से खिलवाड़ जितना बड़ा अपराध है उतना ही दलित उत्पीडऩ के झूठे आरोप में किसी को अकारण प्रताडि़त करना भी। उस दृष्टि से जिस तरह का सुधार न्यायपालिका ने दहेज विरोधी कानून में किया, करीब-करीब वैसा ही अनु. जाति-जनजाति कानून में किया गया, तब उसे सकारात्मक भाव से लिया जाना चाहिए।
दलित संगठनों का मानना है कि इस फैसले के बाद उनके खिलाफ अत्याचार के मामले और बढ़ जाएंगे। देश में इस वक्त दलितों के भारत बंद और इस बंद के दौरान हिंसा तथा 10 लोगों की मौत को लेकर हंगामा मचा है लेकिन सच यह है कि धीरे-धीरे देश में दलितों का आंदोलन पहले से ज्यादा मुखर होता जा रहा है। एक सच यह भी है कि अब दलितों का यह आंदोलन सियासी ज्यादा बन गया है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी समेत तमाम विपक्षी पार्टियों ने अपने-अपने तरीके से भारत बंद के दौरान हुई हिंसा की इस आंच पर सियासी रोटियां सेंकनी शुरू कर दी हैं। दलित संगठनों के बंद में शासकीय कर्मचारी भी सामूहिक अवकाश लेकर शामिल हुए। इस तरह उनके साथ ही वोटों के सौदागरों ने भी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को अन्यायपूर्ण साबित करने के लिए घेराबंदी कर डाली। आगे क्या होगा यह कह पाना कठिन है किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने सन्दर्भित कानून के प्रावधानों को लागू करने में होने वाली जल्दबाजी को रोकने का काम किया तो उसमें गलत क्या है? केंद्र सरकार भी वोट बैंक के दबाव में व्यर्थ के अपराधबोध से ग्रसित हो गई। दलितों के सम्मान और सुरक्षा की जरूरत से कोई इनकार नहीं करेगा। एससी-एसटी एक्ट सम्बन्धी कानून से भी किसी को ऐतराज नहीं है। सामाजिक न्याय का अर्थ यह नहीं है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट के न्यायसंगत फैसले को बदलने का राजनीतिक दबाव बनाया जाए। यदि शाहबानो मामले में मुस्लिम तुष्टिकरण हुआ था तो एससी-एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई प्रक्रिया पर पुनर्विचार करने का जो राजनीतिक दबाव बनाया जा रहा है वह भी तुष्टिकरण की श्रेणी में ही आता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून के किसी भी प्रावधान में कोई बदलाव नहीं किया है। सिर्फ एक प्रक्रिया तय की है ताकि इसके दुरुपयोग पर रोक लगाई जा सके। दलितों पर अत्याचार किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए किन्तु दलित उत्पीडऩ के नाम पर बेकसूर लोगों को प्रताडि़त किये जाने की छूट भी नहीं दी जा सकती।
- राजेश माहेश्वरी

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