राजनीति: त्रिकोणीय मुकाबले में उलझा कर्नाटक

राजनीति: त्रिकोणीय मुकाबले में उलझा कर्नाटक

कर्नाटक में जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव के लिए मतदान की घड़ी नजदीक आती जा रही है वैसे - वैसे यहां का चुनावी मुकाबला त्रिकोणीय और जटिल होता जा रहा है। यहां विधानसभा की कुल 224 सीटों के लिए एक साथ 12 मई को मतदान होगा जिसके वोटों की गिनती 18 मई को होगी।
इन दिनों सबकी नजर एवं चर्चा में कर्नाटक का चुनाव है। पहली बार यहां का चुनाव जाति- समुदाय एवं वर्ग - धर्म में बंट गया है जिन्हें चुनाव लडऩे वाली पार्टियां उनकी अनुमानित संख्या बल के आधार पर तौल रही हैं जिसमें कांग्रेस, भाजपा एवं जदसे सबको अपनी जीत का भरोसा है किंतु ऐसा कदापि संभव नहीं है।
राज्य में वर्तमान समय 4.26 करोड़ मतदाता हैं। इनके लिए 56 हजार मतदान केंद्र बनाए गए हैं। इनमें से 450 से अधिक पोलिंग स्टेशन पूरी तरह महिलाओं के द्वारा संचालित किए जाएंगे। यहां की विधानसभा की लगभग एक चौथाई सीट अजा-जजा वर्ग के लिए आरक्षित है। प्रत्येक उम्मीदवार चुनाव प्रचार में अपने विधानसभा क्षेत्र में 28 लाख रूपया खर्च कर सकता है। चुनाव की घोषणा के साथ यहाँ आचार संहिता लागू हो गई है और चुनावी प्रक्रिया जारी हो गई है जो अब अपने पूरे उफान पर है। दागी - बागी सभी मैदान में हैं। रूठने - मनाने का दौर चल रहा है। दलबदल करने वालों एवं अवसरवादियों को मनमाफिक मौका मिल गया है।
कर्नाटक का यह चुनाव भाजपा कांग्रेस एवं जदसे तीनों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो गया है जबकि चुनाव सबके लिए चुनौतीपूर्ण है और सभी अस्तित्व एवं खंदक की लड़ाई लड़ रहे हैं। भाजपा के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, सभी केंद्रीय मंत्री एवं भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री प्रचार कर रहे हैं जिनके साथ येदियुरप्पा भी रहते हैं। इन सबकी लगातार सभाएं एवं रैलियां हो रही हैं। कांग्रेस के लिए सोनिया, राहुल, मुख्यमंत्री सिद्धारमैय्या एवं कांग्रेस के अन्य राष्ट्रीय नेता प्रचार कर रहे हैं। जदसे को इस बार बसपा का समर्थन मिला है। जदसे की तरफ से एच डी देवेगौड़ा और उनके पुत्र एच डी कुमार स्वामी प्रचार कर रहे हैं। चुनाव प्रचार में वादों की बारिश हो रही है। ख्वाब दिखाए जा रहे हैं। ख्याली पुलाव पकाये जा रहे हैं और आरोप - प्रत्यारोप का दौर चल रहा है।
चुनाव में असली मुद्दे एवं मूलभूत समस्या की हवा हो गई है। राज्य जाति समुदाय एवं वर्ग धर्म में बंट गया है। कर्नाटक में दलित 19 प्रतिशत, लिंगायत 17 प्रतिशत, मुसलमान 16 प्रतिशत, वोक्कालिगा 11 प्रतिशत, ओबीसी 16 प्रतिशत, कुरुवा 7 प्रतिशत, अजजा और 5 प्रतिशत और ब्राह्मण 3 प्रतिशत हैं।
वोक्कालिगा को जदसे अपना वोट बैंक मानता है और बसपा के दलित इस बार उसके साथ हैं, इसलिए लगता है इस बार उसका पलड़ा भारी हो गया है और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के पुत्र एचडी कुमारस्वामी जदसे की ओर से मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं। कांग्रेस के सिद्धारमैय्या कुरुवा समुदाय से हैं।
लिंगायत अगड़ी जाति मानी जाती है। भाजपा नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा इसी समुदाय से हैं। इनका प्रभाव लगभग 100 सीटों पर है जबकि कांग्रेस ने इन्हें अलग धर्म एवं अल्पसंख्यक का दर्जा देने का वादा कर बांटने का प्रयास किया है।
अब देखना यह है कि कौन सी जाति, समुदाय, वर्ग, धर्म किसकी ओर जाता है। कांग्रेस के सिद्धारमैय्या हिंदुओं को बांटने में एवं मुसलमानों के वोट पाने में कामयाब होते हैं या भाजपा के हिंदुओं को एक कर, एकजुट कर उनके वोट पाने में कामयाब होती हैं।

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