राष्ट्ररंग: ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम अनिवार्य रूप से लागू हो

राष्ट्ररंग: ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम अनिवार्य रूप से लागू हो

हाल ही में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों को लागू नहीं किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि भारत एक दिन कूड़े के ढेर में दब जाएगा। यह तल्ख टिप्पणी कूड़े के बम पर बैठे शहरों और तेजी से इसकी जकडऩ में आते कस्बों-गांवों में ठोस कचरा प्रबंधन की पोल खोलने के लिए काफी है।
देश में कहीं भी जाइए, विकास के तमाम पैमानों के बीच कूड़ा-करकट आपको मुंह चिढ़ाता दिख जाएगा। दरअसल हमने सफाई की संस्कृति को तज कर कचरे की संस्कृति अपना ली है। तभी तो हर दिन हम भारतीय एक लाख टन से ज्यादा कूड़ा पैदा कर देते हैं। जिस देश में कचरे के निपटान की व्यवस्था सुस्तहाल हो, उसमें अगर कचरा ज्यादा पैदा किया जाए तो क्या हाल होगा? ऐसे में देश में गहराती कचरे की समस्या की पड़ताल आज हम सबके लिए बड़ा मुद्दा है।
अमीर और विकसित देशों में उपभोक्तावाद और डिस्पोजेबल उत्पादों की अत्यधिक खपत के चलते प्रति व्यक्ति कूड़े का अनुपात ज्यादा है लेकिन अपने कुशल प्रबंधन, संसाधन और संस्कृति के बूते वे देश व पर्यावरण को साफ रखने में सक्षम हैं। स्वीडन तो पड़ोसी मुल्कों का कूड़ा भी खरीद लेता है। साफ-सफाई के मसले पर भारत को दोतरफा लड़ाई लडऩी पड़ रही है।
एक तो यहां गंदगी के निपटान वाले संसाधन नहीं हैं, लिहाजा लोग गंदगी फैलाने को विवश हैं। जो थोड़े संसाधन हैं, हम उनके इस्तेमाल से परहेज करते हैं। सामने कूड़ेदान दिख रहा है लेकिन कूड़ा ऐसे ही फेंक देंगे।
अप्रैल 2016 में 16 साल बाद म्युनिसिपल सॉलिड वेस्ट(मैनेजमेंट एंड हैंडलिंग) रूल्स, 2000 की जगह इस कानून को लागू किया गया। नए नियमों के तहत कचरा प्रबंधन के दायरे को नगर निगमों से आगे भी बढ़ाया गया। ये नियम अब शहरी समूहों, जनगणना वाले कस्बों, अधिसूचित औद्योगिक टाउनशिप, भारतीय रेल के नियंत्रण वाले क्षेत्रों, हवाई अड्डों, एयर बेस, बंदरगाह, रक्षा प्रतिष्ठानों, विशेष आर्थिक क्षेत्र, केंद्र एवं राज्य सरकारों के संगठनों, तीर्थ स्थलों और धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्त्व के स्थानों पर भी लागू किए गए।
इस कानून की खास बातें ये थी कि कोई भी खुद द्वारा उत्पन्न ठोस कचरे को अपने परिसर के बाहर सड़कों, खुले सार्वजनिक स्थलों पर, या नाली में, या जलीय क्षेत्रों में नहीं फेंकेगा, या तो जलाएगा अथवा दबाएगा। ठोस कचरा उत्पन्न करने वालों को 'उपयोगकर्ता शुल्क' अदा करना होगा जो कचरा एकत्र करने वालों को मिलेगा। निर्माण और तोड़-फोड़ से उत्पन्न ठोस कचरे को निर्माण एवं विध्वंस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 के अनुसार संग्रहीत करने के बाद अलग से निपटाना होगा।
दुर्भाग्य की बात है कि इस कानून का कहीं भी पालन नहीं हो रहा है। देश में कूड़े-कचरे की समस्या नई नहीं है। शासन और आम जनता की गैर जिम्मेदाराना हरकत की वजह से आज यह बहुत बड़ी समस्या बन गई है। कचरे की समस्या ने देश को गंभीर स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है। देश को इस स्थिति को आपात स्थिति की तरह देखना चाहिए। हमें इटली से सीखना चाहिए जहां जीरो वेस्ट निकलता है। जब हम आपात स्थिति में हैं तो हमें शांत रहते हुए सोचना चाहिए कि हम क्या कर सकते हैं।
पूर्वी दिल्ली नगर निगम के तहत गाजीपुर लैंडफिल साइट पर 2500 टन कूड़ा रोज डाला जाता है। यहां पर 10 मेगावॉट का बिजली संयंत्र लगा है जिसमें 1200 टन कूड़े का निस्तारण किया जाता है। उत्तरी दिल्ली नगर निगम में भलस्वा लैंडफिल साइट पर 1500 टन कूड़ा प्रतिदिन डाला जाता है। नरेला बवाना लैंडफिल साइट पर 2500 टन कूड़ा डाला जाता है। यहां 2000 मीट्रिक टन कूड़े से रोजाना 24 मेगावॉट बिजली बनाई जाती है। वहीं 500 मीट्रिक टन कूड़े से खाद बनाकर कूड़े का निस्तारण किया जाता है।
दक्षिणी दिल्ली नगर निगम में ओखला और तेहखंड में दो लैंडफिल साइट हैं। इनमें 3600 टन कूड़ा रोजाना डाला जाता है। इसमें से 1800 टन कूड़े से ओखला लैंडफिल साइट पर 15 मेगावॉट बिजली बनाई जाती है। दिल्ली मेें ठोस कचरा प्रबंधन नियम 2016 को लागू करने के लिए झुग्गी-झोपडिय़ों समेत अनाधिकृत कालोनियों में गीला और सूखा कूड़ा अलग- अलग किए जाने को लेकर लोगों को जागरूक किया जा रहा है। गु्रप हाउसिंग सोसायटी को अपने कूड़े का स्वयं निस्तारण के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
कचरे की समस्या के निपटारे के लिए अहम कदमों की दरकार है। गीले कचरे को कालोनी के अंदर ही कंपोस्ट करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। खर्च नगरपालिका आसानी से वहन कर सकती है। नगरपालिकाओं की कंपोस्टिंग की सभी जरूरतें पहले कालोनियों के कंपोस्ट से पूरी की जानी चाहिए। नगरपालिकाओं को यह खाद कम से कम 5 वर्ष तक कालोनियों से तय कीमत और तय मात्रा में खरीदनी चाहिए।
हर वार्ड स्तर पर कचरे की रिसाइकिलिंग करने के लिए मटेरियल रिकवरी सेंटर बनाने चाहिए जहां कचरे को स्वस्थ रूप से अलग किया जा सके और रिसाइकिल होने भेजा जा सके। इस प्रक्रिया में जो कचरा रिसाइकिल न हो सके, सिर्फ वह लैंडफिल में डंप हो। प्लास्टिक बैग और एक बार इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक का इस्तेमाल बंद हो, अन्न की बरबादी रोकी जाए।
घर के दरवाजे से कचरा उठाने वाले को अपनी खुद की माइक्रो इंटरप्राइज कंपोस्ट बनाने और मटेरियल रिकवरी फैसिलिटी बनाने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। जो घर के दरवाजे से कचरा नहीं उठा रहे, उन्हें भी कचरे को अलग करने के लिए जगह दी जानी चाहिए। सभी कचरा बीनने वालों को सामाजिक बीमा और स्वास्थ्य सुविधाएं दी जानी चाहिए।
इनकी वजह से नगरपालिकाएं रोजाना मजदूरी के छह करोड़ रूपए बचा लेती हैं। ये लोग 3.6 गुना अधिक ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन रोकते हैं।
- नरेंद्र देवांगन

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