राष्ट्ररंग: जनता फटेहाल, तेल कंपनियां मालामाल

राष्ट्ररंग: जनता फटेहाल, तेल कंपनियां मालामाल

पहले से ही महंगाई की मार झेल रहे आम आदमी को अब तेल की बढ़ी कीमत ने रुलाना शुरू कर दिया है। सरकार को भले ही इस बात का अहसास न हो मगर देश के कई भागों में पेट्रोल 85 एवं डीजल 68 रुपये को पार कर गया है। सरकार ने चालाकी के साथ मूल्य निर्धारण को खरीद मूल्य के साथ जोड़ दिया है। इससे जनता फटेहाल है, वहीं सरकार एवं तेल कंपनियां मालामाल हो रही हैं। जब दाम कम हो रहे थे तो डीजल में 13 रुपये एवं पेट्रोल में 14 रुपये के करीब उत्पाद शुल्क लगाकर मूल्य को कम होने नहीं दिया। जीएसटी में तभी इसे लाया जायेगा जब 120 फीसदी कर का एक और स्लैब बना दिया जाएगा। सरकार ने पेट्रोल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि कर अपना खजाना तो भर लिया है पर आमजन की कमर तोड़ डाली है।
देखा जाए तो मोदी सरकार के दौरान उक्त वस्तुओं की कीमतें उच्चतम स्तर को छू गईं हैं। बेशक इसके पीछे अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियां जिम्मेदार होती हैं किंतु भारत सरकार ने कीमतें कम होने का लाभ चूंकि भारतीय उपभोक्ता को नहीं दिया, इसलिये वह वैश्विक मंडी की तेजी से कीमतें बढऩे के औचित्य को साबित करने का नैतिक अधिकार भी खो चुकी है। तेल कंपनियों के पिछले घाटे की भरपाई के नाम पर अंधाधुन्ध करारोपण के जरिये जनता का तेल निकालने की जो धूर्तता बीते चार वर्ष में की जाती रही, उसकी वजह से प्रधानमन्त्री की छवि पर भी विपरीत असर पड़ा है। आयातित कच्चे तेल की कीमतें बढऩे के बाद भी यदि केंद्र और राज्य सरकारें अपने करों को युक्तियुक्त रखें, तब भी पेट्रोल-डीजल के दाम कम से कम 25 रु. प्रति लिटर तो कम हो ही सकते हैं। भाजपा शासित गोवा में ऐसा किया भी जा चुका है।
विकास सम्बन्धी कार्यों के लिए पेट्रोल-डीजल पर की जा रही मुनाफाखोरी का औचित्य साबित करने की जो कोशिश सरकार की तरफ से कभी-कभार होती है वह लोगों के गले नहीं उतरती क्योंकि जिस आसानी से विजय माल्या और नीरव मोदी अरबों रु. का घोटाला करने के बाद फुर्र हो गए, उसकी वजह से आम जनता के मन में यह धारणा गहराई तक बैठ गई है कि मोदी सरकार अमीरों पर मेहरबानी करती है वहीं जनसामान्य के लिए परेशानी पैदा करना उनकी नीतिगत आदत बन चुकी है। सालभर में गुपचुप तरीके से बढ़े पेट्रोल-डीजल के दाम ने सीधे आम लोगों को प्रभावित किया है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार के हिसाब से पेट्रोल और डीजल के दाम तय होने के कारण एक तरह से सरकार का पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत से नियंत्रण खत्म हो गया है। सालभर से पेट्रोल-डीजल की कीमतों का ग्राफ लगातार ऊपर की ओर चढ़ता गया, जिसने सीधे आम जनजीवन को प्रभावित कर दिया है। पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत में वृद्धि के कारण प्रत्येक व्यक्ति के खर्च में बढ़ोत्तरी हो गई है।
आम आवश्यकताओं के साथ रसोई के लगभग सभी सामान की कीमतों में वृद्धि हुई है और आम लोगों की एक थाली की कीमत पचास रुपए तक बढ़ गई है। इसकी वजह पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों
के कारण ट्रांसपोर्टिंग शुल्क बढ़ाया जाना है।
जानकारी के मुताबिक पेट्रोल-डीजल के दाम बढऩे के कारण परिवहन शुल्क दस फीसदी तक बढ़ गया है और इसकी वृद्धि के कारण आम आवश्यकताओं के सभी सामान की कीमत बढ़ गई है। आम आदमी को सबसे अधिक जरूरत भोजन की होती है और पेट्रोल-डीजल के दाम ने उसे भी प्रभावित कर दिया है। ट्रांसपोर्टिंग चार्ज बढऩे के कारण चावल, दाल से लेकर सब्जियों के दाम पर भी इसका असर दिखाई देने लगा है।
पेट्रोल-डीजल के दामों में बीते एक साल में औसतन रोजाना दस से बीस पैसे तक की वृद्धि हो रही है और इस ओर लोगों का ध्यान भी नहीं जा रहा। चुपके-चुपके सालभर में पेट्रोल लगभग सात और डीजल पांच रुपए तक बढ़ गया है। कीमतों में बढ़ोत्तरी की राशि इतनी मामूली होती है कि वाहन चालक को इसकी भनक तक नहीं लगती। अधिकतर एक निर्धारित राशि का ही पेट्रोल डलवाते हैं।
साफ है कि भारत में उपभोक्ताओं को इसका लाभ अपने आप मिलना चाहिए था जो नहीं मिल रहा है। इसका एक बड़ा कारण स्वयं केन्द्र की नीतियां हैं। वास्तव में नवंबर 2016 से लेकर जनवरी 2017 के बीच सरकार ने नौ बार पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क बढ़ाया। पेट्रोल पर 11 रुपए प्रति लिटर तथा डीजल पर 13.47 रुपए प्रति लिटर की वृद्धि की गई। 2016-17 में इनसे केवल उत्पाद शुल्क आय 2 लाख 42 हजार करोड़ रुपया हो गया। सरकार के आंकड़े ही कहते हैं कि पिछले तीन वर्ष में पेट्रोलियम उत्पादों से राजस्व वसूली में 28 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
वर्ष 2014-15 में कुल राजस्व वसूली 3 लाख 32 हजार 620 करोड़ रुपए था। 2016-17 में यह बढ़कर 5 लाख 24 हजार 304 करोड़ रुपया हो गया। वर्तमान वित्त वर्ष की पहली तिमाही में ही कुल वसूली 1 लाख 24 हजार 508 करोड़ रुपया है हालांकि धर्मेन्द्र प्रधान का यह कहना सही है कि जो शुल्क लिया जाता है वह राज्यों के विकास पर खर्च होता है। करीब 42 प्रतिशत उत्पाद शुल्क राज्यों को आधारभूत ढांचा और अन्य कल्याणकारी कार्यक्रमों के लिए दिया जाता है किंतु इस तर्क से आप पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाते नहीं रख सकते। लोगों को राहत चाहिए।
ऐसा सुधार देश को नहीं चाहिए जिससे लोगों की जेब पर अनावश्यक बोझ बढ़ता रहे। कुछ सच्चाई यहां और भी है। वस्तुत: इस वर्ष 13 जुलाई के बाद से पेट्रोल के दाम में एक बार भी कमी नहीं की गई। क्यों? पेट्रोल के दाम 13 जुलाई 2017 को दिल्ली में 63.91 रुपए थे। इसका मतलब हुआ कि पेट्रोल के दाम दो महीने में सात रुपए के करीब बढ़ गए हैं। ऐसा होने का कोई स्वाभाविक कारण नहीं है। इसी तरह डीजल के मूल्य में 29 अगस्त के बाद से कमी नहीं की गई है। दिल्ली में डीजल की कीमत 58.72 रुपए है। 31 अगस्त 2014 को इसका मूल्य 58.97 रुपए प्रति लिटर था तो उसके बाद से यह फिर उच्चतम स्तर पर आ गया है। जाहिर है, इस स्थिति को बनाए नहीं रखा जा सकता है।
तो सवाल है कि यह स्थिति दूर कैसे होगी? इसका पहला जवाब तो केन्द्र सरकार ही दे सकती है किंतु पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने इस संबंध में कुछ भी साफ कहने से इंकार किया है। हालांकि उन्होंने सार्वजनिक तेल कंपनियों के अधिकारियों से बैठकें कीं लेकिन लगता है कोई रास्ता नहीं निकल सका। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। मूल्य वृद्धि का सबसे बड़ा कारण तेलों पर लगने वाला शुल्क माना जा रहा है।
समझ में नहीं आता कि ये लूट खसोट कब तक चलेगी? बीच में यह भरोसा जागा था कि पेट्रोल-डीजल को भी जीएसटी के तहत लाया जाएगा जिससे उनके दाम घटकर क्रमश: 50 और 40 रु. प्रति लिटर हो जाएंगे किन्तु वह उम्मीद भी मृगमरीचिका लगने लगी है। ऐसा लगता है मोदी सरकार को आम जनता की तकलीफों और गुस्से का एहसास करवाने में भाजपा संगठन या तो उदासीन है या फिर सत्ता के नशे ने उसकी जुबान पर ताले डाल दिये हैं। पेट्रोल, डीजल और अन्य पेट्रोलियम पदार्थों के दाम अचानक उछलने से आम जनता हलकान है।
- संतोष कुमार भार्गव

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