समस्या: पेंशन के लिए भटक रहे हैं बुजुर्ग

समस्या: पेंशन के लिए भटक रहे हैं बुजुर्ग

पेंशन यानी जीवन भर की भागदौड़ के बाद सांसों को कायम रखने के लिए मिलने वाली रकम। सरकारें लोककल्याणकारी राज्य का दावा करती हैं लेकिन आज भी पेंशन के लिए भटकना कई बुजुर्गों के लिए नियति बन गई है। कभी सरकारें खाली खजाने के नाम पर पेंशन फंड बंद कर देती हैं तो कभी कई-कई महीनों तक पेंशन नहीं मिलती है। योजनाओं के जुबानी जमा खर्च के बीच पेंशन पस्त हो जाती है। असंगठित क्षेत्रों में तो पेंशन का अता- पता ही नहीं होता। ज्येष्ठ भारत के लिए श्रेष्ठ भारत का दावा कितना कारगर है? क्या हम बीते हुए कल को बेहतर आज दे पा रहे हैं? क्या बुजुर्गों की लाठी बरकरार है? आज महीने की आखिरी तारीख है। पुराने छोटे फोन पर मैसेज की आस थी। अचानक मैसेज की बीप सुनाई दी। पेंशन जमा हो गई। तनख्वाह तो नगद मिलती थी। पेंशन सीधे बैंक खाते में जाती है। तसल्ली मिली। 40 साल सरकारी नौकरी में दिन-रात एक किए हैं। उसकी एवज में पेंशन की पाई-पाई बुढ़ापे की लाठी है। बैंक की लाइन में लगकर पैसे निकाल लिए। न्यूनतम बैलेंस छोड़कर पूरी पेंशन। बैंक से घर लौटते समय कई ख्याल आ रहे थे। घर का राशन, दूध वाले का बिल, दवा वाले का बकाया। हिसाब लगा रखा है। लौटते समय सब कुछ चुका दिया। अब दो हजार ही बचे थे। नाती-पोतों को ज्यादा तो नहीं, कभी आइसक्रीम-चॉकलेट दिला देता हूं लेकिन बस....महीने के शुरूआती हफ्ते में। बाद में पैसे ही नहीं बचते हैं। याद आता है जब तनख्वाह मिला करती थी। नाती-पोतों के मां-बाप को उसी तनख्वाह से पाला-पोसा था। खैर...पेंशन है कोई तनख्वाह नहीं। इतना भी कर पाने की तसल्ली है। 10.4 करोड़ हैं भारत में 60 वर्ष से अधिक आयु के लोग। 60 वर्ष से अधिक के आयु के हर 5 व्यक्तियों में से 2 व्यक्ति कार्यरत हैं। प्रत्येक 5 में 3 पुरूष कार्यरत हैं। प्रत्येक 5 में 1 महिला कार्यरत है। 20 प्रतिशत बुजुर्ग पुरूष और करीब 50 फीसदी बुजुर्ग महिलाएं अपने बच्चों के साथ रहती हैं। 71 प्रतिशत बुजुर्ग आबादी रहती है देश के ग्रामीण क्षेत्रों में। 8 प्रतिशत प्राइवेट सेक्टर से रिटायर होने वाले कर्मचारियों के पास है प्राइवेट पेंशन कवर। 4.1 प्रतिशत जीडीपी का खर्च होगा वर्ष 2030 तक सोशल सिक्योरिटी के मद में। व्यापक सहमति है कि सभी जरूरतमंद वृद्ध व्यक्तियों को पेंशन उपलब्ध होनी चाहिए पर अभी भारत में बड़ी संख्या में बुजुर्ग पेंशन से वंचित हैं। जिन्हें पेंशन मिलती भी है तो प्राय: उसकी राशि बहुत कम होती है। इतनी कम पेंशन पाने में भी वृद्ध नागरिकों को बहुत परेशानियां उठानी पड़ती हैं। देश में संगठित क्षेत्र के निश्चित वेतन और पेंशन प्राप्त करने वाले नागरिकों की संख्या अपेक्षाकृत बहुत कम है। अधिकांश व्यक्ति असंगठित क्षेत्र में रोजगार प्राप्त करते हैं जिनके लिए किसी रोजगारदाता की ओर से दी जाने वाली पेंशन उपलब्ध नहीं है। देश में पेंशनभोगी लोगों को कई तरह की समस्याओं से रोज-रोज दो-चार होना पड़ रहा है। उम्र के इस ढलान पर कई जगह गुहार लगाने पर भी सरकार की ओर से ठोस कार्रवाई नहीं की जाती है। देश में वृद्धों, विधवा और विकलांग लोगों के लिए चल रही पेंशन योजना में कई गड़बडिय़ां हैं। पेंशन का समय पर न मिलना, वृद्धावस्था में अंगुलियों के निशान का मिलान नहीं मिलने से पेंशन नहीं मिल पा रही है। कई राज्यों में शिक्षा सहित अन्य विभागों में समय पर वेतन नहीं मिलने की समस्या बढ़ती जा रही है। बहुत बार छह- छह महीने तक वेतन नहीं मिल पाता। कर्मचारियों को घर खर्च चलाने में परेशानी होती है। असंगठित क्षेत्र को देश की अर्थव्यवस्था का इंजन कहा जाता है। पर इसमें कार्यरत लोगों को सामाजिक सुरक्षा का कोई लाभ नियमित नहीं मिलता। स्थायी रोजगार का अभाव रहता है। संविदा पर भर्ती किए गए कर्मचारियों को कम मानदेय पर काम करना पड़ता है और वह भी समय पर नहीं मिलता। वर्षों तक काम करने के बाद भी कभी भी नौकरी गंवाने का खतरा मंडराता रहता है। श्रमिकों को बेरोजगारी व ठेका प्रथा में काम करना पड़ता है। कारखानों में जोखिम की स्थिति में कार्य तो खेतिहर मजदूरों को खेती का काम नहीं होने से साल के ज्यादातर समय बेरोजगारी का सामना करना पड़ता है। राज्य सरकारों विश्वविद्यालय जैसी संस्थाओं को स्वायत्तशासी बताकर पेंशन की ग्रांट बीच में ही रोक देती हैं। विश्वविद्यालय के पास संसाधनों की कमी के कारण कर्मचारियों को समय पर भुगतान नहीं होने से परेशानी होती है। संस्थान कर्मचारियों के वेतन से पेंशन और प्रोविडेंट फंड(पीएफ) की राशि काटते हैं लेकिन कई संस्थान उस राशि को जमा नहीं कराकर खुद ही डकार जाते हैं। ऐसी स्थिति में कर्मचारी पेंशन से वंचित हो जाता है। पेंशन प्राप्त करने वाले लोगों को बार-बार खुद के जिंदा होने का प्रमाण पत्र जमा कराना पड़ता है। पेंशनभोगी लोगों को जीवन प्रमाण पत्र दाखिले का यह कार्य अनावश्यक होने के साथ अपमानजनक भी लगता है।
पेंशनभोगी लोगों के लिए तकनीक का बढ़ता उपयोग भी समस्याएं पैदा कर रहा है। पेंशन में आधार के लिए निशान न मिलना, नेटवर्क नहीं आना और ठगी का शिकार होना की समस्यास बढ़ती जा रही है। रोजगार के कई क्षेत्रों में महिला और पुरूष कर्मचारियों का वेतन समान नहीं होता है। समान कार्य के बावजूद भी वेतन अलग-अलग होता है। वेतन भिन्न होने से महिला-पुरूष की पेंशन में भी अंतर होता है। देश में 60 वर्ष से अधिक आयु के 10.4 करोड़ से अधिक लोग हैं जिनमें से लगभग 9.5 करोड़ ऐसे हैं जिन्हें रोजगारदाता की ओर से पेंशन उपलब्ध नहीं है, अत: उनके लिए पेंशन की अलग योजना की जरूरत है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना भी लगभग 3.2 करोड़ लोगों तक ही पहुंचती है जबकि इसे 9 करोड़ से अधिक लोगों तक पहुंचना चाहिए। इसके अतिरिक्त केंद्र सरकार प्रतिमाह मात्र 200 रूपए की पेंशन देती है। राज्य सरकारें अपनी-अपनी आर्थिक स्थिति और अन्य मापदंडों के हिसाब से इसमें अपनी ओर से राशि जोड़ती हैं। स्थिति बदलने के लिए सरकार की ओर से गंभीर प्रयास की जरूरत है। पेंशन के लिए आधार अनिवार्य न बने। इससे काफी संख्या में बुजुर्ग पेंशन से वंचित हुए हैं। संविदा के नाम पर हो रहे शोषण को खत्म कर लोगों को स्थायी रोजगार दिया जाए। पेंशनभोगी को बार-बार किसी बैंक खातेदार से प्रमाणित कराने से छूट मिले। असंगठित क्षेत्र पेंशन के दायरे में लाया जाए जिससे बड़ी आबादी सम्मान से जी सके। पेंशन योजनाओं से जुड़े खाते को न्यूनतम बकाया चार्ज से मुक्त रखा जाए। पेंशन योजनाओं को सरल बनाया जाए जिससे अधिक लोगों को लाभ मिल सके।
-नरेंद्र देवांगन

Share it
Share it
Share it
Top