राजनीति: आतंकवाद की राजनीति से देश की अखण्डता को खतरा

राजनीति: आतंकवाद की राजनीति से देश की अखण्डता को खतरा

देश में गत दो-तीन दशकों से जिस प्रकार आतंकवाद पनप रहा है, उससे देश की अखण्डता को ही खतरा उत्पन्न हो रहा है तथा देश के कर्णधार राजनीतिज्ञ अपने-अपने राजनैतिक स्वार्थ सिद्धि के लिए ही प्रयासरत् हैं। आतंकवाद के उन्मूलन के लिए देश के लोकतांत्रिक मन्दिरों-लोकसभा, राज्यसभा तथा राज्यों की विधानसभाओं व विधानपरिषदों में कोई सार्थक बहस नहीं चल रही हैं तथा सर्वसम्मति से आतंकवाद के विरूद्ध कोई कार्ययोजना तैयार नहीं की जा रही है। सरकारों को संख्या के आधार पर गिराने तथा उठाने में ही हमारे जनप्रतिनिधि राजनेताओं का समय जाया हो रहा है। यदि आतंकवाद का उन्मूलन शीघ्र ही प्रभावपूर्ण तरीके से राष्ट्रवाद के दृष्टिकोण को अपना कर नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब देश विखण्डित होकर छोटे- छोटे राज्यों में बंटकर रह जायेगा तथा लड़ते-भिड़ते हमारे राजनेता हाथ मलते रह जायेंगे और आने वाली पीढिय़ां अपने पूर्वजों को गलियाँ देती ही रहेंगी।
भारत एक बहुधर्मी, बहुभाषी, बहु जातीय देश है जहां राजनेताओं का दृष्टिकोण भी जातिगत, धर्मगत, क्षेत्रगत, तथा भाषागत रहने से एक राष्ट्र, एक जन का सपना विखण्डित हो गया है तथा अलगाववाद का विष धीरे-धीरे देश रूपी शरीर में फैलता जा रहा है तथा वह दिन दूर नहीं जब भारत को विखण्डित करने के सपने देख रही अन्तर्राष्ट्रीय शक्तियाँ अपनी योजनाओं को साकार रूप में देख पायेंगी। देश का बुद्धिजीवी वर्ग भी राजनेताओं के साथ-साथ देश की चिन्ता नहीं कर रहा है तथा आम-जन के बीच से राष्ट्रभाव कहीें खो गया है। प्रत्येक व्यक्ति स्वार्थ हित में ही सोच रहा है। वह प्रतिदिन यही देख रहा है कि वह कैसे शीघ्र से शीघ्र अपना घर भर कर अपनी सात पीढिय़ों के भरण-पोषण का प्रबन्ध कर लें। उसमें देश के प्रति समर्पण तथा त्याग की भावना निरन्तर क्षीण होती जा रही है। आतंकवाद की जड़ में राष्ट्रीयत्व का ह्यास तथा स्वार्थपूर्ण राजनीतिज्ञों का कमजोर चिन्तन ही है जिससे आतंकवाद के विरूद्ध लड़ाई भी सम्पूर्ण मनोयोग से नहीं लडी़ जा रही है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् से ही देश में धार्मिक, जातिगत, भाषायी अनेको संगठनों ने जन्म लिया है तथा सभी अपना अलग-अलग अस्तित्व स्थापित करने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं जिससे भारतीय जनमानस मेें आपसी वैमनस्य जन्म ले रहा है। इस प्रकार का वैमनस्य ही अलगाववाद को हवा देता है तथा युवावर्ग दिग्भ्रमित होकर भारतीय सुरक्षा बलों के विरूद्ध शस्त्र उठाकर आतंकवाद को फैलाने के लिए निर्दोषों का खून बहाने लग जाता है तथा आतंकवाद प्रभावी रूप में सामने आ जाता है।
देश के विभिन्न राज्यों में अलगाववाद को हवा देने के लिए विभिन्न संगठन सक्रिय हैं। असम में बोडोलैण्ड, महाराष्ट्र के अतिवादी ग्रुप, पंजाब में पंजाबियत के नाम पर खालिस्तान, कश्मीर में कश्मीरियत, आन्ध्र-प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश में नक्सली तथा पी. डब्ल्यू. जी., केरल व बंगाल में अनेक संगठनों द्वारा क्षेत्रीय अलगाववाद को हवा दी जा रही है तथा भावनात्मक विद्वेष उत्पन्न किया जा रहा है। देश में किसी राजनेता को अब नायक का दर्जा प्राप्त नहीं है जिसके आदर्श को लोग अपनाकर देश का कल्याण कर सकें।
देश का फिल्म उद्योग हिंसक, गुण्डागर्दी, अश्लील फिल्में बनाकर देश के युवा वर्ग के मन में खून-खराबे, मार-काट को ठूंस-ठूंसकर भर रहा है युवा वर्ग के फिल्मी नायक, खलनायक साबित हो रहे हैं जिससे युवा वर्ग के मस्तिष्क में राष्ट्र निर्माण की बात तो नहीं आती, उल्टे जरा-जरा सी बातों पर राष्ट्र की करोड़ों रूपये की सम्पत्ति को हिंसक आंदोलनों में स्वाहा कर देता है तथा आतंकवाद पोषित हो जाता है।
आज समूचे विश्व में इस्लामी आतंकवाद एक गम्भीर चुनौती बन गया है तथा उससे विश्व शांति तथा सहिष्णुता को ही गम्भीर खतरा उत्पन्न हो गया है। अमेरिका में 11 सितम्बर 2001 को विश्व व्यापार केन्द्र तथा 13 सितम्बर 2001 को भारत के लोकतंत्र के मन्दिर-संसद पर जिस प्रकार इस्लामी आतंकवाद का हमला हुआ, उससे विश्व को आर्थिक, सामाजिक तथा राजनैतिक स्तर पर इस्लामी आतंकवाद की चुनौती मिल गयी है। अमेरिका, ओसामा बिन लादेन के प्रेत से निपटने की तैयारी करता है परन्तु अन्य देशों में प्रायोजित आतंकवाद को जन्म देता है तथा स्वार्थ सिद्धि के लिए ईराक के सद्दाम हुसैन पर हमले की योजना बनाता है। भारत में भी चाहे भिंडरावाला रहा हो, वीरप्पन हो या पाकिस्तानी आतंकवादी हां, सभी को किसी न किसी प्रकार भारतीय राजनीतिज्ञों का संरक्षण प्राप्त रहा है। आतंकवाद के साये में कश्मीर में सितम्बर-अक्टूबर 2002 में सम्पन्न हुए विधान सभा चुनावों को आलोकतांत्रिक कह कर खिल्ली उड़ायी जाती है। भारत आज दुनिया का अदभुत लोकतंत्रवादी राष्ट्र बन चुका है जहां निष्पक्ष चुनाव आयोग है, न्यायपालिका है तथा कार्यपालिका है जिसका विश्वास तत्कालीन व्यवस्थापिका से न होकर संविधान सम्मत कृत्य से होता है न कि पंडित, मौलवी, फादर अथवा पोप के द्वारा उपलब्ध करायी गयी धार्मिक वैमनस्यता में पगी किसी मानसिकता से।
अभी हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने पुरानी दिल्ली निवासी रईसुद्दीन के द्वारा दायर की गयी जनहित याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार किया गया है जिसमें यह आरोप लगाया गया है कि दिल्ली की प्रसिद्ध जामा मस्जिद में असामाजिक तत्वों ने शरण ली है तथा शाही इमाम बुखारी इस स्मारक का प्रयोग निजी सम्पत्ति की तरह से कर रहे हैं। इस याचिका में केन्द्र सरकार तथा दिल्ली के उपराज्यपाल से भी जवाब मांगा गया है। इस याचिका में कहा गया है कि इमाम बुखारी तथा उनके पिता ने अपने निजी प्रयोग के लिए मस्जिद के आस-पास के क्षेत्रों का इस्तेमाल किया है तथा यहां सभी तरह की गतिविधियां, बाजार और आतंकवादी गतिविधियां चल रही हैं तथा असामाजिक तत्वों ने शरण ले रखी है।
भारत में गत एक दशक से ही मदरसों की संख्या में वृद्धि हुई है। इन मदरसों में नौनिहालों को था मकतबी ज्ञान देकर उनका जीवन दिशाहीन बनाकर हाथ में बंदूक थमा दी जाती है अथवा किसी मदरसे में ही अध्यापक अथवा मौलवी बनाकर भेज दिया जाता है। इन मदरसों की पाठ्य पुस्तकें तथा शिक्षण विधियां अत्यन्त ही अमानवीय, अवैज्ञानिक हैं और यथार्थ से दूर हैं तथा अलगाववाद को पनपाने वाली हैं।
आज की राजनीति में तो अत्यन्त दुखद स्थिति यह उत्पन्न हो गयी है कि मैं पहले, पार्टी व देश बाद में। इस स्वार्थ वृत्ति के कारण मनुष्य और पशु के बीच अन्तर ही मिटता जा रहा है। इस भाव का भी हृास होता जा रहा है कि मैं और मेरी शक्ति, धन और सामथ्र्य देश की सेवा के लिए हैं।
आतंकवाद को समाप्त कर देश में अखण्डता की ज्योति को निरन्तर प्रज्वलित करने के लिए हमें स्वार्थमयी प्रवृत्ति के लोगों की आवश्यकता नहीं है बल्कि ऐसे नायक की आवश्यकता है जो स्वयं कठोर जीवन जी कर युवा वर्ग के हृदय पर राज कर सकें। इसलिए हमें राष्ट्रवाद को सर्वोपरि रखकर पश्चिमी सभ्यता की ओर उन्मुक्त होते कदमों को रोकना होगा तथा पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण से परहेज करना होगा। आतंकवाद के विरूद्ध कमर कसकर सर्वसम्मति से लड़ाई की घोषणा करनी होगी। आतंकवाद से लड़ाई में कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए।
- डा. सूर्य प्रकाश अग्रवाल

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