राजनीति: तेज होती गठबंधन की राजनीति

राजनीति: तेज होती गठबंधन की राजनीति

गुजरात विधानसभा चुनाव और उपचुनाव में भाजपा को कड़ी टक्कर देने के बाद भाजपा विरोधी दलों का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर है। अभी हाल ही में देश के सबसे बड़े राज्यं उत्तर प्रदेश की गोरखपुर और फूलपुर संसदीय सीटों पर सपा को मिली जीत के बाद विपक्ष को अपना भविष्य उज्ज्वल दिखाई दे रहा है। अगर कहा जाए कि यूपी उपचुनाव ने आगामी लोकसभा चुनावों के लिए एक नई भूमिका तैयार कर दी है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। बसपा और सपा का गठबंधन इशारा कर रहा है कि भाजपा के लिए यूपी में डगर बहुत कठिन होगी।
इन दिनों देश के अन्य कई भागों में भी भाजपा को भारी नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है। नाराज मतदाताओं का मानना है कि जिस मोदी लहर से यह पार्टी सत्ता में आई थी, वे दावे केवल भाषणबाजी तक सीमित होकर रह गये। तमाम महकमों में भ्रष्टाचार ज्यों का त्यों है, तरीके बदल गये हैं। कश्मीर में आतंकवाद बढ़ा है। सीमा पर जवान पहले से ज्यादा शहीद हो रहे हैं। नक्सलवाद खत्म नहीं हुआ। गरीबी और बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है। आमजन आज भी वहीं खड़ा है, जहां 2014 से पहले खड़ा था। कुल मिलाकर भाजपा का ग्राफ धीरे धीरे ही सही, नीचे की ओर उतरता दिख रहा है और यही बात विपक्ष को ऑक्सीजन देने का काम कर रही है।
देखा जाए तो ंराज्यसभा चुनाव इतने महत्त्वपूर्ण कभी साबित नहीं हुए जितने इस बार हुए। देश की आजादी के बाद पहली बार भाजपा राज्यसभा में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर पुख्ता हुई है और कांग्रेस की संख्या 50 सांसदों से भी कम हो गई है। राज्यसभा चुनाव से पहले भाजपा के 58 सांसद थे जो अब बढ़कर 70 हो गए हैं। भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए के सांसदों की संख्या भी 89 तक (पहले 77 थी) पहुंच गयी है। कांग्रेस का वर्चस्व संसद के उच्च सदन में समाप्त हो गया है। उसके सांसद 54 से घटकर 46 पर आ गये हैं। यूपीए सांसद भी 60 से कम होकर 52 तक लुढ़क आए हैं। अलबत्ता अन्य सांसदों की ताकत अब भी 102 हो गयी है जो विभिन्न विधायी और बहस तलब मुद्दों पर निर्णायक साबित होगी। राज्यसभा में 245 सांसद होते हैं जिनमें से 233 चुनकर आते हैं और 12 को राष्ट्रपति मनोनीत करते हैं। लिहाजा बहुमत का आंकड़ा 123 है।
भाजपा-एनडीए अब भी बहुमत से बहुत दूर हैं लेकिन फासले सिमट रहे हैं। अब राज्यसभा में जो समीकरण बन रहे हैं, उनके मद्देनजर 2019 तक भाजपा-एनडीए बहुमत के और भी करीब पहुंचेंगे। जिस तरह भूमि अधिग्रहण अध्यादेश (बाद में बिल) और तीन तलाक विधेयक पर मोदी सरकार को संसद के उच्च सदन में मुंह की खानी पड़ी थी। कमोबेश अब ऐसे मौके कम ही होंगे, लेकिन 'अन्य सांसद' भी वैचारिक तौर पर भाजपा-मोदी-विरोधी हैं, लिहाजा राज्यसभा में भी बहुमत का आंकड़ा छूने के मद्देनजर सत्तारूढ़ पक्ष को अन्य दलों के साथ बेहतर तालमेल बनाना होगा। राज्यसभा में भाजपा और कांग्रेस के बाद तृणमूल के सर्वाधिक सांसद हैं। अन्नाद्रमुक सांसदों की संख्या भी पर्याप्त है जो राजनीति के तहत भाजपा के करीब है। बहरहाल राज्यसभा के भीतरी समीकरणों से ज्यादा महत्त्वपूर्ण विपक्षी लामबंदी का मुद्दा है।
सबसे महत्त्वपूर्ण उप्र के राज्यसभा चुनाव रहे जिसमें अखिलेश यादव की सपा मायावती की बसपा के उम्मीदवार भीमराव अंबेडकर को जिता नहीं सकी। एक बार फिर साबित हो गया कि सपा के वोट बसपा की ओर शिफ्ट नहीं होते हैं। यह जातीय, संस्कारी, परंपरागत पूर्वाग्रह हैं जबकि बसपा ने अपने वोट बैंक के जरिए सपा को गोरखपुर और फूलपुर सरीखी महत्त्वपूर्ण लोकसभा सीटें जितवा कर साबित किया था कि बसपा के वोट सपा की ओर शिफ्ट हो सकते हैं। राज्यसभा चुनाव में भी जमकर क्रास वोटिंग की गई, फिर भी अखिलेश यादव अपने भरोसेमंद विधायकों की सूची मायावती को थमा सकते थे। अब इस चुनाव के बाद सपा-बसपा गठबंधन का भविष्य कुछ अनिश्चित हो सकता है। हालांकि उप्र की ही कैराना लोकसभा सीट पर उपचुनाव के लिए दोनों दल करार घोषित कर चुके हैं।
चुनाव विशेषज्ञों के आकलन सामने आए हैं कि यदि उप्र में ही सपा-बसपा में गठबंधन हो जाए तो भाजपा-एनडीए की कमोबेश 50 लोकसभा सीटें कम हो सकती हैं। 2014 में भाजपा-एनडीए ने उप्र की 80 में से 73 लोकसभा सीटें जीती थीं। इन आकलनों के मुताबिक, सपा-बसपा गठबंधन भाजपा-एनडीए को तगड़ा झटका देने में समर्थ है। अब सवाल यह है कि राज्यसभा चुनाव के बाद क्या यह गठबंधन होगा? यदि देश के सबसे बड़े राज्य में यह चुनावी गठबंधन नहीं होगा तो राष्ट्र स्तर पर विपक्ष का महागठबंधन कैसे आकार लेगा? बुनियादी सवाल यह भी है कि यदि उप्र में सपा-बसपा गठबंधन नहीं होता है, तो 2019 में मोदी और भाजपा को पराजित करने की सोची भी नहीं जा सकती।
सपा-बसपा की तो नई-नई दोस्ती है। दोनों की मजबूरी है। देखते हैं कि यह समझौता गठबंधन में तब्दील होता है या नहीं अथवा यारी कब तक, कहां तक खिंचती है? याद यह भी रखना चाहिए कि बिहार में राजद-जद यू का गठबंधन अंतत: कब तक चल पाया? जद-यू को लौट कर भाजपा के साथ ही आना पड़ा। विपक्षी गठबंधन के संदर्भ में 39 लोकसभा सीटों वाला तमिलनाडु राज्य भी महत्त्वपूर्ण है। यह ऐसा राज्य है जहां 1969 से कांग्रेस सत्ता के बाहर है। वहां द्रमुक और अन्नाद्रमुक ही फिलहाल दो राजनीतिक ताकतें हैं। 2014 में भी सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक ने 37 लोकसभा सीटें जीतीं और एक-एक सीट भाजपा और पीएमके को मिलीं। दोनों ही एनडीए के हिस्से हैं। अन्नाद्रमुक भी भाजपा-एनडीए के बेहद करीब है क्योंकि लोकसभा उपाध्यक्ष थंबीदुरई भी अन्नाद्रमुक नेता हैं। तमिलनाडु में मायावती, ममता, अखिलेश, चंद्रबाबू नायडू, चंद्रशेखर राव आदि किसी भी विपक्षी दिग्गज की पार्टी का नामोनिशान तक नहीं है। अलबत्ता 2019 में भाजपा और अन्नाद्रमुक में गठबंधन हुआ तो कल्पना करें कि किसकी, कितनी सीटें आएंगी।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मोदी विरोधी मुहिम को फिलवक्त लीड कर रही हैं। पिछले दिनों ममता ने दिल्ली में डेरा डालकर मोदी विरोध के लिए खेमेबंदी की। इस सारी मशक्कत में एक अहम प्रश्न यह है कि अभी चुनाव को लगभग एक साल का समय है। इससे पूर्व भी तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिशें देश में हुई हैं जो परवान नहीं चढ़ पायी हैं। ऐसे में 2019 से पूर्व क्या विपक्ष एकजुट होकर भाजपा को चुनौती देगा या फिर पूर्व की भांति एकजुटता की सारी कोशिशें धराशायी हो जाएंगी। वहीं विपक्ष को लीड कौन करेगा, इस पर भी मामला फंसना और तकरार होना लाजिमी है।
बहरहाल हिमाचल, पंजाब, राजस्थान, उत्तराखंड, मप्र, छत्तीसगढ़, झारखंड और कर्नाटक आदि राज्य ऐसे हैं जहां भाजपा और कांग्रेस ही मुख्य प्रतिद्वंद्वी हैं। किसी अन्य दल की मौजूदगी नाममात्र है। लिहाजा गौरतलब यह है कि 2019 चुनाव के मद्देनजर विपक्षी गठबंधन का चेहरा कैसा सामने आता है। मायावती जो भी हुंकार भरती रहें, वह उप्र तक ही सिमट कर रह सकती है, जबकि कांग्रेस को विपक्षी खेमे से बाहर नहीं रखा जा सकता। बहरहाल विपक्ष एकजुट होगा और चुनाव करीब आने लगेंगे तो फिर विश्लेषण किया जाएगा कि 'मोदी-मुक्त भारत' संभव है या नहीं। फिलवक्त विपक्ष एकजुट होने और दिखने की कोशिशों में व्यस्त है। अब विपक्ष की एकजुटता क्या रंग दिखाएगी, यह तो आने वाला वक्त ही बता पाएगा।
- तारकेश्वर मिश्र

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