खतरे में है मतदाताओं की प्रभुसत्ता

खतरे में है मतदाताओं की प्रभुसत्ता

जो आपकी पसंद है क्या वह सचमुच में आपकी है? डिजिटल युग में आपके विचार भी बदले जा सकते हैं। कैंब्रिज एनलिटिका घोटाला उजागर हुआ है। देश की सभी बड़ी पार्टियां मतदाताओं की थाह पाना चाहती हैं। कैसे वोट बटोरे जाएं। किसी तरह से सुराग मिल जाए कि मतदाता की पसंद क्या है? मतदाता कैसे भाषण चाहता है? मतदाता को कैसे पक्ष में किया जाए, ये सभी नुस्खे बताती हैं कैंब्रिज एनलिटिका सरीखी कंपनियां और जरिया बनती हैं सोशल साइट्स, अवचेतन पर हमला। ये सत्ता के लिए बड़ा संघर्ष है और सोशल साइट्स से चोरी हो रहा है डेटा। सावधान, मतदाताओं की प्रभुसत्ता खतरे में है।
राजनीतिक दलों को परामर्श देने वाली कंपनी कैंब्रिज एनलिटिका पर पांच करोड़ फेसबुक यूजर्स का डेटा चोरी का आरोप है। आरोप यह भी है कि कंपनी ने उस डेटा का इस्तेमाल 2०16 में हुए अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव को प्रभावित करने के लिए किया था। यह खुलासा जितना सनसनीखेज है, उतना ही चिंताजनक भी । इस मामले में केवल इतने से संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि फेसबुक के प्रमुख मार्क जुकरबर्ग ने माफी मांग ली क्योंकि जब तक इस तरह की चोरी को रोकने के ठोस उपाय नहीं किए जाते, तब तक डेटा चोरी का खतरा बना ही रहेगा।
यह खतरा इसलिए और बढ़ गया है, क्योंकि दुनियाभर में राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। इस क्रम में वे सोशल साइट्स पर सक्रिय लोगों के सोच-विचार को छल-छद्म से प्रभावित करने का भी काम करते हैं। ऐसे में क्या भारत में भी चुनाव प्रभावित किया जा सकता है? सोशल मीडिया को चुनावी अखाड़ा बना चुके राजनीतिक दल यहां भी एकदूसरे को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। तमाम मुद्दों पर ऑनलाइन चर्चा कर खुद को दूसरी पार्टी से बेहतर साबित करने के लिए वे निरंतर प्रयास कर रहे हैं। इसके साथ ही डेटा के इस्तेमाल का खेल पर्दे के पीछे खेला जा रहा है। एडीआर के अनुसार दलों को चुनाव के बाद सोशल मीडिया पर हुए खर्च का ब्योरा देना होता है पर कितने दल ऐसा करते हैं, यह स्पष्ट नहीं है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के चुनाव में रूस के हस्तक्षेप की जांच चल रही है और उसमें यह बात उभर रही है कि कैंब्रिज एनालिटिका ने फेसबुक के सदस्यों को प्रलोभन देकर उनका डेटा इक_ा किया और फिर उनकी राय बदलने के लिए फर्जी खबरों, विज्ञापनों और ब्लागों का सिलसिला शुरू कर दिया। इस बीच जुकरबर्ग को अगले वर्ष ब्राजील, अमेरिका और भारत में होने वाले आम चुनावों में अपनी साख मिटने और नाक कटने की चिंता सता रही है। वे इसे रोकने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। अंदेशा है कि चोरी किए गए फेसबुक डेटा का दुरूपयोग ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग होने को लेकर कराए गए जनमत संग्रह यानी ब्रेक्जिट के दौरान भी किया गया। फेसबुक से डेटा चोरी की आरोपी कैंब्रिज एनालिटिका सिर्फ अमरीका नहीं, दुनिया के 2०० देशों में इस तरह के डाटा के जरिए चुनावों को प्रभावित करने का काम कर चुकी है। कहना कठिन है कि ऐसा ही काम भारत में किया गया या नहीं किंतु कैंब्रिज एनालिटिका की सहयोगी कंपनी ने यह स्वीकार करके संदेह को बढ़ा दिया है कि उसने यहां के कई दलों को अपनी सेवाएं दी हैं। क्या यह जाना जा सकता है कि सेवाएं देने के नाम पर क्या किया गया। चुनाव में प्रभावी मसलों की जानकारी भर जुटाई गई या फिर सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों के राजनीतिक रूझान को प्रभावित भी किया गया?
कैंब्रिज एनालिटिका और भारत के बीच संबंधों की शुरूआत 2०1० के बिहार विधानसभा चुनावों के साथ हुई। उस वक्त कैंब्रिज एनालिटिका ने जनता दल के लिए मतदाताओं का गहन विश्लेषण किया। जद ने भाजपा के साथ मिलकर यह चुनाव लड़ा था और शानदार जीत हासिल की थी। हालांकि कैंब्रिज एनालिटिका कंपनी 2०13 में अस्तित्व में आई पर इसकी पैतृक कंपनी और जनता दल यूनाइटेड का नाता इससे कहीं पुराना है। जद(यू) नेता के.सी.त्यागी के बेटे अमरीश त्यागी की कंपनी पैतृक कंपनी के साथ काम कर चुकी है।
एक तरह से जहां-जहां मतदान लोकतांत्रिक प्रणाली वाले देशों में इस कंपनी ने चुनाव जीतने का ब्रह्मास्त्र उन पार्टियों को पकड़ा दिया जिनके पास काफी रकम और दूसरे संसाधन थे, वहीं इस खेल में छोटे दल या इस तिकड़म से अनजान बड़े दल लुट-पिट गए। नई सूचना प्रौद्योगिकी ने लोकतंत्र में जनमत के समक्ष बहला-फुसला और ठग लिए जाने की चुनौती प्रस्तुत की है। सूचना प्रौद्योगिकी के इस अभियान में लोकतांत्रिक चुनाव एक युद्ध की तरह हो गए हैं, जहां लोकतांत्रिक संस्थाओं का इस्तेमाल करते हुए बेहतर मानव समाज बनाने का लक्ष्य खो गया है और सत्ता पाने का लक्ष्य सर्वोपरि हो चला है। इसीलिए पार्टियां और सरकारें तभी कार्रवाई करती हैं जब उनका निहित स्वार्थ आहत होता है।
डेटा चोरी करके इस तरह के कार्य करने की एक बड़ी वजह दुनिया के अधिकांश देशों में डेटा चोरी रोकने में लचर कानून भी है। भारत में साल 2००० में बने 18 साल पुराने आईटी एक्ट में कोई संशोधन नहीं किया गया। डेटा चुराने की तकनीक कहां से कहां पहुंच गई मगर देश का आईटी कानून वहीं का वहीं है। सोशल मीडिया का उपयोग करने वालों में युवाओं की बड़ी आबादी है और राजनीतिक दलों की इनके वोट पर नजर है। वर्ष 2०11 की जनगणना के आधार पर हर वर्ष तकरीबन 2 करोड़ युवा 18 वर्ष की उम्र को पार कर रहे हैं। ऐसे में यह युवा मतदाता किसी भी राजनीतिक दल के लिए काफी अहम हैं। वर्ष 2०19 के लोकसभा चुनाव के दौरान तकरीबन 1० करोड़ ऐसे मतदाता होंगे जो पहली बार मतदान करेंगे। 4जी स्पीड इंटरनेट के साथ लोकसभा चुनाव काफी दिलचस्प होने वाला है। माना जा रहा है कि आगामी आम चुनाव सड़कों की बजाए मोबाइल पर अधिक लड़ा जाएगा। अब जब यह स्पष्ट हो चुका है कि सोशल मीडिया पर सुनियोजित प्रचार अभियान चलाकर लोगों के राजनीतिक मिजाज को बदलने की कोशिश की जाने लगी है, तब केवल आरोप-प्रत्यारोप से काम चलने वाला नहीं है। जरूरत इसकी है कि जैसे आधार कार्ड के तहत दी गई निजी जानकारी का उपयोग अनुमति के बगैर न करने देने को लेकर सक्रियता दिखाई जा रही है, वैसे ही इस मामले में भी दिखाई जाए। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सक्रिय लोगों का डेटा चोरी कर उसका राजनीतिक इस्तेमाल किया जाना निजता का खुला उल्लंघन भी है।
-नरेंद्र देवांगन

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