राष्ट्ररंग: राजनीति के गिरते स्तर को रोकने की जिम्मेवारी मतदाता की

राष्ट्ररंग: राजनीति के गिरते स्तर को रोकने की जिम्मेवारी मतदाता की

देश एक बार फिर अपने प्रतिनिधि चुनने के लिए तैयार हैं। नेता मतदाताओं को रिझाने से भ्रमित करने तक कुछ भी करने को तैयार है। 'कुछ भी' में अभिनय से झूठ तक, भाषायी गिरावट से स्वयं को नीचे गिराने तक भी शामिल हो तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में हमारे देश की राजनीति का स्तर लगातार गिरावट की ओर है। चप्पलें और जूते चल रही हैं तभी तो अपने ही दल के विधायक को सांसद महोदय जूतों से नवाजते नजर आए। आमतौर पर राजनीति में भाषायी गिरावट के लिए 'जुबान फिसलने' को दोषी ठहराया जाता है परंतु गंभीरता से देखने पर 'जुबान फिसलने' से ज्यादा दोष 'खुद को फिसलने से बचाने' का दिखाई देता है। एक राज्य के पढ़े लिखे मुख्यमंत्री का लगातार 'राज्य उसके बाप का है या इसके बाप का है क्या' जैसे शब्दों का उपयोग जुबान फिसलने का मामला नहीं हो सकता। इसे पराजय की आहट से उपजी बौखलाहट कहकर अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए।

केवल वही क्यों, देश की सबसे पुरानी पार्टी का अध्यक्ष लगातार 'चौकीदार चोर है' की धुन बजा रहा है तो 'चौकीदार' भी कहां कम है। उसे 'गाली को गहना' बनाने की कला में मास्टर डिग्री प्राप्त है। अनुभवी 'चौकीदार' ने प्रचार की दिशा को कुछ इस तरह से मोड़ा कि देश के कोने-कोने में उसके करोड़ों समर्थक 'मैं भी चौकीदार हूं' का समूहगान करते नजर आ रहे हैं।

माना कि देश की सबसे पुरानी पार्टी में नेतृत्व का पैमाना योग्यता नहीं, परिवारवाद है लेकिन यह विचारणीय है कि उसके अध्यक्ष को लगातार 'पप्पू' कहना कितना उचित है। उसके द्वारा की जा रही गलतियों को सोशल मीडिया पर इस तरह से बार- बार प्रचारित किया जा रहा है कि राष्ट्रीय राजनीति गली मोहल्ले के बच्चों के स्तर पर जा पहुंची है। ऐसे में जहां उस दल के प्रत्येक विवेकशील समर्थक को अपने दल पर योग्य नेतृत्व को सामने लाने के लिए दबाव बनाना चाहिए, वहीं विपक्ष को भी व्यक्तिगत अक्षमता को इस तरह प्रचारित नहीं करना चाहिए जो देश की प्रतिष्ठा को प्रभावित करे। दलीय राजनीति में आपसी मतभेद होना स्वाभाविक है लेकिन राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा करते हुए सेना तक की प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिन्ह लगाना राजनीति के स्तर को रसातल पर ले जाता है। कोई नेता जो सत्ता में हो अथवा उसका दल लंबे समय तक सत्ता में रह चुका हो तो उसके पास उपलब्धियों की विरासत होनी चाहिए जिन्हें वह मतदाताओं के सम्मुख रखकर एक बार फिर से जनादेश की मांग करे परंतु जब अपनी उपलब्धियों की कोई चर्चा करने से बचते हुए प्रतिद्वंद्वी की असफलताओं से भी अधिक उसपर कीचड़ फेंकने में अपनी ऊर्जा लगा रहा हो तो स्पष्ट है कि 'पन्द्रह लाख' के जुमले की तरह 'गरीबी हटाओ' भी उनके जुमले थे। शायद यह बात उन्हें अच्छी तरह से समझ में आती है कि अपनी या अपनों की असफलता को स्वीकार किए बिना किसी को यह अधिकार नहीं कि वह उसी प्रकार की असफलताओं के लिए दूसरों को कोसें। इसीलिए वे अपने प्रचार को भाषायी स्तर पर नीचे लाकर मनोवैज्ञानिक बढ़त बनाने पर अधिक जोर देते हैं। राजनीति में विरोध दर्शाना तथा अपने पक्ष को मजबूती से रखना एक सामान्य प्रतिक्रि या है लेकिन अपनी बात शालीनतापूर्वक से रखने की बजाय गाली गलौज का उपयोग नेताओं का दिवालियापन है। ऐसे घटिया तौर तरीके अपनाने वालों की खबर लेना जनता का प्रथम कर्तव्य है। यदि कोई दल जानबूझकर 'बदमिजाजÓ व्यक्ति को अपना उम्मीदवार बनाता है तो उस क्षेत्र की जनता का कर्तव्य है कि बेशक वह उम्मीदवार उसके प्रिय दल का प्रतिनिधि ही क्यों न हो, उसे देश की सबसे बड़ी पंचायत की चौखट तक पहुंचने से रोके क्योंकि ऐसे लोग लोकतंत्र के सच्चे सिपाही नहीं हो सकते।

निज स्वार्थ के लिए जो शाब्दिक मर्यादा का उल्लंघन कर सकते हैं, वे देश की प्रतिष्ठा को भी ठेंगा दिखा सकते हैं। उनसे जनहित की अपेक्षा स्वयं को धोखा देने के अतिरिक्त कुछ हो ही नहीं सकता। ऐसी हरकतों से विश्व की सबसे बड़ा लोकतंत्र कहे जाने वाली हमारी व्यवस्था बदनाम होती है। राजनीतिक दलों को यह बात हर्गिज नहीं भूलनी चाहिए कि राजनीति में मर्यादा का महत्त्व समाप्त नहीं हुआ है। कौन नहीं जानता कि मर्यादा का पालन करने वाले अटल जी को केवल अपनों से ही नहीं, गैरों से भी भरपूर सम्मान मिलता था। पिछले दिनों दिवंगत हुए मनोहर पर्रिकर का उदाहरण भी हमारे सामने है। उनकी सादगी और समर्पण के समक्ष सभी नतमस्तक हैं। आज की राजनीति में भी अनेक चेहरे ऐसे हैं जो कीचड़ में भी अपना दामन बचाने में सफल रहे हैं। हां, यह बात अलग है कि बहुतायत उन लोगों की है जो शालीनता, और मर्यादा की लक्ष्मणरेखा को तार- तार करने के लिए जाने जाते हैं। ऐसे लोगों को यह अहसास कराने की जिम्मेवारी हर विवेकशील जिम्मेवार मतदाता की है कि लोकतंत्र लोकलाज से चलता है। जिसे लोकलाज रूपी मर्यादा स्वीकार नहीं, मतदाता भी उसे दूर से ही प्रणाम करेंगे तो भविष्य में कोई भी नेता अथवा दल राष्ट्र की पतीकों और लोकतंत्र का अपमान करने की बात मन में ला ही नहीं सकता। मतदाताओं को ऐसे लोगों की भी खबर लेनी चाहिए जो किसी सिद्धांत के लिए नहीं अपितु सत्ता के लिए बेमेल गठबंधन करते हैं। कल तक भ्रष्टाचार के सबूतों का पुलंदा लेकर घूमने वाले का आज उन्हीं के समक्ष गठबंधन के लिए गिड़गिड़ाना लोकतंत्र का अपमान है या सम्मान? जो व्यक्ति लोकतंत्र को नहीं, स्वयं को मजबूत बनाने के लिए राजनीति करे, अपने वादे पूरे न कर पाने के लिए दूसरों को जिम्मेवार ठहराए, उसके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, यह प्रबुद्ध मतदाताओं को ही तय करना है। उसी पर निर्भर करेगा कि कल राजनीति का स्तर कैसा होगाा।

- विनोद बब्बर

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