विश्लेषण: मोदी जी जरा संभलना.......

विश्लेषण: मोदी जी जरा संभलना.......

राजनीति में समय कभी भी एक समान नहीं होता है। आज से चार बरस पहले मोदी की जो लहर दिखाई दे रही थी अब वह हवा वैसी नहीं रही है। 2019 आते -आते मोदी को किन-किन परेशानियों का सामना करना पड़ेगा, वह भी इससे अनभिज्ञ हैं। हाल के दिनों में मोदी सरकार को लेकर सहयोगी दलों में गठबंधन को लेकर जो स्थिति निर्मित हुई है, उसे आने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए शुभ नही माना जा सकता है। बेशक उन्होंने बतौर प्रधानमंत्री देश-दुनिया में अपनी छवि को निखारने का काम किया, खुद को बेसहारा और मजलूमों के लिए कल्याण योजनाओं की तजवीज करके गरीबों के मसीहा और नोटबंदी की अपनी मुहिम के जरिए भ्रष्टाचार विनाशक के तौर पर पेश किया लेकिन अब वह छवि भी काम आती नहीं दिख रही है।

पीएम नरेंद्र मोदी अपने कार्यकाल के आखिरी साल में दाखिल हो रहे हैं और चुनौतियां कम होने के बजाय बढ़ती जा रही हैं। हालांकि सत्तारूढ़ भाजपा के विजय रथ को आगे बढ़ाने की गरज से उन्होंने और उनके विश्वसनीय सहयोगी अमित शाह ने दुर्जेय चुनावी मशीन तैयार की है लेकिन दलबदल करवाने से लेकर जरूरत पडने पर मतदाओं के बीच ध्रुवीकरण समेत किसी भी कीमत पर जीतने के रवैय्ये की तीखी आलोचना हो रही है। हाल ही में हुआ गुजरात का चुनाव इसकी पहली मिसाल है।

दूसरी मिसाल वह है जिसमें संघ परिवार के हाशिए के तत्वों को लव जेहाद, गोमांस पर रोक सरीखे मुद्दों पर कानून को खुद अपने हाथ में लेने की खुली छूट दी गई है। तीसरी मिसाल यह है कि भाजपा हिन्दुस्तान के 29 सूबों में से जिन 19 सूबों में गद्दीनशीन है, उनमें से कुछ में उसने संदिग्ध तौर-तरीकों से सत्ता हासिल की है। उनकी इन्हीं हरकतों के चलते अभी चुनाव करवाए जाएं तो भाजपा अपने दम पर बहुमत हासिल करने से पीछे रह जाएगी और सत्ता में बने रहने के लिए उसे अपने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के भागीदारों पर निर्भर रहना पड़ेगा।

हाल में एक सर्वे आया था जो यह दर्शाता है कि हाल के दिनों में लोकसभा के चुनाव करवाए जाएं तो भाजपा को नुकसान हो सकता है। खबरें तो ये भी सामने आ रही हैं कि अकेले यूपी में ही करीब पचास लोकसभा सीटें भाजपा हार सकती है और कुल तीन राज्यों में 80 सीटों का झटका लग सकता है। इन सीटों की भरपाई करने के लिए ही अमित शाह ने पूर्वोत्तर की 25 लोकसभा सीटों में से 21 सीटें जीतने का लक्ष्य तय किया है। बहरहाल यूपी के गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में समाजवादी पार्टी की जीत ने 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए कई संभावनाओं को जन्म दे दिया है। सपा, बसपा के गठजोड़ से आए नतीजों से विपक्षी दल उत्साहित हैं। अब चर्चा इस बात पर हो रही है कि भाजपा को मात देने के लिए समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी मिलकर 2019 के आम चुनाव में मुस्तैदी से मैदान संभालेंगे।

ठीक इसी तरह से बिहार में राहें मुसीबतजदां ही दिखाई देती है। अगर बिहार में भी विपक्ष ने बड़ा गठजोड़ किया तो यहां भी बीजेपी को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। काबिलेगौर हो कि बिहार में एनडीए की सहयोगी रही जीतनराम मांझी की पार्टी हम अब एनडीए से अलग होकर महागठबंधन में शामिल हो चुकी है। 17 वें लोकसभा चुनाव के लिए अब समय एक साल का ही बचा है। ऐसे में सभी राजनीतिक दल खासकर विपक्षी दल मिशन 2019 के लिए सियासी समीकरणों पर खासा जोर देने लगे हैं।

इन्ही समीकरणों के चलते आंध्रप्रदेश में बीजेपी की सहयोगी रही टीडीपी ने पीएम मोदी को तीन तलाक देने में देर नहीं लगाई। ऊपर से लोकसभा में मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने में भी कोई चूक नहीं की। असल बात तो यह है कि अगर 2019 में विपक्ष विशाल गठजोड़ बनाने में कामयाब होता है तो पीएम मोदी के लिए न केवल जीत की राह मुश्किल हो सकती है बल्कि सत्ता से भी बेदखल होना पड़ सकता है।

बिहार में लोकसभा की 40 सीट हैं जिस पर एनडीए के खाते में फिलहाल 33 सीटें हैं। 29 सीटें ऐसी हैं जिस पर राजद और कांग्रेस के उम्मीदवार 2014 के चुनावों में नंबर दो स्थान पर थे। गुजरात जिसे मोदी के लिए अचूक गृह प्रदेश माना जाता है, वह भी भाजपा के हाथ से निकलते दिखाई दे रहा है। गुजरात में 2017 के विधानसभा चुनावों में बदले राजनीतिक समीकरणों से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है। यहां भी भाजपा को 17 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा है। इधर एकला चलो की नीति पर चलने वाली कांग्रेस को ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर, दलित नेता जिग्नेश मेवाणी और पाटीदार नेता हार्दिक पटेल के गठबंधन से खासा लाभ हुआ है।

अगर 2019 में कांग्रेस सपा, बसपा और एनसीपी को भी साथ लेकर एक गठबंधन के तहत चुनाव लड़ती है तो गठबंधन राज्य की करीब 13 लोकसभा सीटें जीत सकती है। फिलहाल सभी 26 सीटों पर बीजेपी के सांसद हैं। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक तीन बड़े राज्यों में ही एनडीए को 80 से ज्यादा सीटों का नुकसान हो सकता है। सिर्फ यूपी में ही सपा और बसपा की दोस्ती से बीजेपी को 50 सीटों का नुकसान का अनुमान है। कुछ समय पहले राजस्थान में भी कांग्रेस के दो सांसद उप चुनाव में जीत चुके हैं।

उधर भाजपा भी हाथ पर हाथ धरे नही ंबैठी है। वह भी नये-नये समीकरण बना रही है। हिन्दी पट्टी से मिलने वाली चुनौती का सामना पूर्वोत्तर से करना चाहती है। बीते दिनों गुवाहाटी में एक रैली को संबोधित करते हुए अमित शाह ने साफ कहा कि मैं 2019 चुनावों के लिए लक्ष्य तय करना चाहता हूं- हम (बीजेपी) पूर्वोत्तर की 25 में से 21 से ज्यादा सीटें जीतना चाहते हैं। पार्टी के सभी कार्यकर्ता इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए दिलो जान से काम में जुट जाए। इसके साथ ही शाह ने पार्टी कार्यकर्ताओं को भाजपा की शक्ति का आभास कराते हुए कहा कि मिजोरम को छोड़कर बाकी सारे पूर्वोत्तर राज्यों में नार्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस (एनईडीए) की सरकार है। हमें इसे और आगे लेकर जाना है। इससे पहले साल 2014 में पार्टी ने पूर्वोत्तर में आठ सीटें जीती थीं। अब यहां भाजपा को अधिक से अधिक सीटें जीत कर प्रधानमंत्री की ताकत को और बढ़ाने की जरूरत है।

चार साल के कार्यकाल में हिंदी पट्टी के लोगों के दिल से मोदी का प्रभाव तेजी से कम हुआ है। वे सबका साथ, सबका विकास के अपने नारे पर भी खरे नहीं उतरे हैं। इसके साथ ही आमजन की नाराजगी और चिंताएं यह भी हैं कि कृभ्रष्टाचार से मुकाबला करने, नौकरियां देने और कीमतों को काबू लाने में भी मोदी विफल रहे हैं। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जहां मोदी सरकार के कामकाज को ऊंचा आंका जाता रहा है, वहीं दो दूसरे बड़े मामलोंकृनौकरियां देने और कीमतों को काबू में लाने में साफ तौर पर नाकामी हासिल हुई है। ये सरकार की बड़ी नाकामियों में शामिल हो गई। मोदी के लिए चिंता की एक बात यह भी है कि बड़े स्तर पर लोग किसानों की खुदकशी और खेती के संकट से निबटने के उनके तरीकों को खराब मानने लगे है। पीएम के लिए चेतावनी साफ है। इन्हीं सब के चलते भाजपा और एनडीए दोनों की सीटों की संख्या में गिरावट की झलक दिखने लगी है। यह सत्तारूढ़ मगरूर मोदी और शाह के लिए आगे का रास्ता फिसलन भरा होने की ओर ही इशारा करता है। फिर भी मोदी एक सियासतदां हैं लेकिन यह भी न भूलें कि आगे जरा संभल कर चलना है। 2019 में विपक्षी गठबंधन बड़ी बाधा बन सकता है।

-संजय रोकड़े

[रॉयल बुलेटिन अब आपके मोबाइल पर भी उपलब्ध, ROYALBULLETIN पर क्लिक करें और डाउनलोड करे मोबाइल एप]

Share it
Top