विश्लेषण: आधी आबादी के साथ अन्याय

विश्लेषण: आधी आबादी के साथ अन्याय

दुनिया की जनसंख्या में आधी आबादी महिलाओं की है। दुनिया के प्रत्येक देश में इन की दशा व दिशा में भिन्नता है। परिस्थितियां व परिवेश सहित परंपरागत मान्यताओं से यह प्रभावित होती है। इन सब के बावजूद भारतीय समाज में नारी की दुर्दशा चिंतनीय है।

चिंतनीय इस अर्थ में क्योंकि हम जगत गुरु हैं। चिंता इस अर्थ में क्योंकि 'यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमंते तत्र देवता' के जनक हैं। हम नारी सत्ता आदि शक्ति के उपासक हैं। इन सब के बावजूद निर्लज्जता यह कि नारी समाज की इतनी दुर्दशा दुनिया के किसी देश में नहीं है। सीधे शब्दों में कहे तो नारी दुर्दशा के चलते न केवल हम दुनिया में कहीं मुँह दिखाने लायक ही नहीं रहे बल्कि दुनिया की नजरों में मुँह वाले भी नहीं रह गये। रॉयल बुलेटिन की नई एप प्ले स्टोर पर आ गयी है।royal bulletin news लिखे और नई app डाउनलोड करें

हमारी सरकारें नारी समानता की पैरवी करते नहीं थकती किंतु कोई भी सरकार सत्ता में रहकर ऐसा नहीं करती। क्या सत्ता में आते ही सब को लकवा मार जाता है? क्या इन की याददाश्त खो जाती है? जैसा कि फिल्मों में होता है, सिर पर एक बूंद पानी गिरा नहीं कि याददाश्त चली गई। यहां तो सत्ता की लंका सिर से टकराती है तो याददाश्त का चला जाना अस्वाभाविक भी नहीं। हमारी सरकारें पंचायत में नारी समाज को आधा हक देती हैं। छोटी सेवाओं में आधा हक देती हैं किंतु प्रशासनिक सेवा में आधा हक देने तैयार नहीं।व्यवस्थापिका में आधा हक देना इन्हें असंवैधानिक प्रतीत होता है। सरकारें जाति को आरक्षण तो दे सकती हैं किंतु समाज को नहीं! क्या आज भी हम नारी को घरों में कैद कर रखना चाहते हैं? क्या छोटे दायरों के पिंजरे में ही कैद कर रखना चाहते हैं? क्या हमें वोट और सत्ता के ऊपर कुछ भी नहीं दिखाई देता है? महिलाओं को अधिकार ही सशक्त बना सकता है। राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में महिला सशक्तिकरंण के लिए राजनीतिक, प्रशासनिक व सामाजिक क्षमता की आवश्यकता है। इनके अभाव में सशक्तिकरण की बात थोथा नारा ही सिद्ध हो रहा है। हमें ज्ञात है कि महिला आधी आबादी है। आधी आबादी को हटाकर हम विकास की कल्पना भी नहीं कर सकते। देश के विकास के लिए पुरुष शक्ति की आवश्यकता तो है किंतु नारी शक्ति की महती आवश्यकता है। पिंजरे में बंद पक्षी घुटता है और पर्दे में नारी। बराबरी का अधिकार न देना पिंजरे में रखने से ज्यादा कुछ नहीं। रॉयल बुलेटिन की नई एप प्ले स्टोर पर आ गयी है।royal bulletin news लिखे और नई app डाउनलोड करें

सरकार के तीनों अंगों पर आधी आबादी का अधिकार होना चाहिए। नहीं देने का क्या अर्थ है? क्या हमारी नारी इसके योग्य नहीं? कि हम नारी को पुरुषों से आगे चलते नहीं देखना चाहते? या यह कि चारदीवारी में ही रखना चाहते हैं? या यह कि नारी को आज भी दासत्व में देखना चाहते हैं? 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' का नारा महिलाओं को सशक्त बना रहा है। आज हमें -बेटी आओ हक ले जाओ-का नारा नहीं, प्रगति की आवश्यकता है। बेटी को पिता की संपत्ति में बराबर का हकदार बना देने से सशक्तिकरण हो रहा है या नहीं? विवेचना का विषय है किंतु सामाजिक ताना-बाना बिखर अवश्य रहा है। नारी को खैरात नहीं, अधिकार चाहिए। बहुधा देखा जाता है कि भारतीय समाज में विवाह के पश्चात बेटी अपने पिता कुल से बहिष्कृत हो जाती है। इससे बड़ा घोर अन्याय महिलाओं के साथ दूसरा हो ही नहीं सकता। विवाह मंगल संस्कार है तो यह अमंगलकारी अभिशाप क्यों? यदि मंगल है तो पति कुल के साथ उसे पिता कुल के भी सारे अधिकार मिलना चाहिए जबकि ऐसा नहीं होता। नारी की असली उपेक्षा यहाँ से प्रारंभ होती है। वर्तमान समाज में यह परंपरा सर्वमान्य रूप से प्रचलित है। इस तरह की अमंगलकारी जड़ों को समूल उखाड़े बिना आधी आबादी का भला कदापि नहीं हो सकता।

- अशोक महिश्वरे

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