आर्थिक चर्चा: गन्ना ही बोएंगे चाहे जलाना ही क्यों न पड़े?

आर्थिक चर्चा: गन्ना ही बोएंगे चाहे जलाना ही क्यों न पड़े?

अर्थशास्त्र का सामान्य नियम है कि जब किसी वस्तु की पूर्ति मांग की तुलना में बढ़ जाती है तो बाजार में वह वस्तु न केवल सस्ती हो जाती है अपितु उसका उपयोग न होने के कारण उस उत्पाद को जलाना पड़ता है अथवा समुन्द्र में डुबो देना पड़ता है। कुछ देशों में अधिक उत्पादित हुए गेहूं को भी समुन्द्र में डुबो दिया गया था परन्तु कालान्तर में वहां के किसानों ने एक योजनाबद्ध तरीके से खेती करने की सोची तथा वहां किसानों की हालत में सुधार हुआ परन्तु कृषि प्रधान देश भारत में गन्ना प्रमुख रुप से राजनीति का अंग बन चुका है। प्रतिवर्ष ही यह देखने को मिलता है कि चीनी मिलों की गन्ने की मांग की तुलना में कई गुना अधिक गन्ना बो दिया गया जाता है जिससे न केवल किसान की आर्थिक स्थिति खराब होती है बल्कि पूरे क्षेत्र में एक अराजकता का माहौल अलग से बन जाता है।

सरकार के दबाब में चीनी मिलों को अधिक समय तक चला कर खेतों में खड़े गन्ने को पेरने को बाध्य किया जाता है। चीनी का उत्पादन मांग की तुलना में अधिक होने पर चीनी मिलें घाटे में चली जाती हैं अर्थात अधिक गन्ना उगाना तथा अधिक चीनी का उत्पादन करना, दोनों ही राष्ट्र की क्षति है। यदि यह सब मांग व पूर्ति का सामंजस्य करते हुए एक योजनाबद्ध तरीके से होता तो किसान को गन्ने का पूरा मूल्य चीनी मिलें समय पर भुगतान कर पाती और किसान व चीनी मिल मालिक दोनों ही का आर्थिक स्वास्थ्य ठीक रह पाता।

2 अक्तूबर 2018 को दिल्ली के बॉर्डर यूपी गेट पर दिल्ली में घुसने के प्रयास में किसान क्रान्ति यात्रा में शामिल किसानों पर न केवल लाठी प्रहार हुआ बल्कि उन्हें बेइज्जत भी किया गया जो कि बहुत निन्दनीय है क्योंकि यह यात्र 23 सितम्बर 2018 से हरिद्वार से चली थी तथा दिल्ली में राजघाट-किसान घाट पर समाप्त होनी थी परन्तु सैंकड़ों ट्रैक्टरों का हुजूम देख कर दिल्ली सरकार भयभीत हो गई तथा किसानों को पुलिस ने दिल्ली में प्रवेश नहीं करने दिया गया परन्तु केन्द्र सरकार के गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने किसानों के एक प्रतिनिधि मंडल के साथ बात करके किसानों की 11 मांगों में से 7 मांगें मान ली थी तथा 4 मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का आश्वासन भी दिया था।

केन्द्र सरकार ने फसल बीमा योजना की शुरुआत की है जिसका लाभ किसानों को मिलना शुरु हो गया है। विपक्षी दल केन्द्र की भाजपा सरकार पर आरोप लगाते हैं कि उद्योग धंधों पर अधिक ध्यान दिया जाता है। यदि सरकार ऐसा न करे तो किसान के द्वारा उत्पादित कच्चे माल का प्रयोग किस प्रकार हो सकेगा? आर्थिक विकास के लिए किसान व उद्योगपति दोनों की ही आवश्यकता होती है। सरकार ने जहां किसानों के ऋणों की माफी की घोषणा की, वहीं गन्ना के मूल्य का भुगतान के लिए चीनी मिलों को 5,538 करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा भी की तथा 50 लाख टन चीनी निर्यात पर यातायात सब्सिडी तथा अतिरिक्त गन्ने पर 5.50 रुपये के स्थान पर 13.88 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से सहायता राशि की मंजूरी दी गई । जून 2018 में भी चीनी मिलों को 8,500 करोड़ रुपये के राहत पैकेज का एलान किया गया जिसमें से 4,440 करोड़ रुपये चीनी मिलों को एॅथनाल क्षमता के विकास हेतु सस्ते ऋण के रुप में दिया जाना था। 1,332 करोड़़ रुपये ब्याज सहायता और गन्ने के रस से बने एॅथनाल का खरीद मूल्य 47 रुपये से बढ़ा कर 59 रुपये प्रति लिटर किया गया। चीनी के आयात शुल्क को 40 प्रतिशत से बढ़ा कर 50 प्रतिशत किया गया। यह सब इसी कारण से किया गया कि चीनी मिलों की गन्ना मूल्य भुगतान क्षमता बढ़ सके।

ऐसी घोषणाएं पूर्व की सरकारें भी करती रही है। सितम्बर 2018 तक किसानों के गन्ने मूल्य के 13,567 करोड़ रुपये चीनी मिलों पर बकाया है। किसानों को भुगतान की समस्या प्रति वर्ष उत्पन्न होती है। अब यदि किसान गन्ना कम उगाता तो चीनी मिल मालिक उसके पास धन लेकर पहले से ही गन्ने की पूर्ति का अनुबंध करते क्योंकि बिना गन्ने के चीनी मिल नहीं चल सकती। गत वर्ष 3.2 करोड़ टन चीनी का रिकार्ड उत्पादन हुआ जिससे भंडारण की समस्या बन गई। सितम्बर 2018 तक भी देश में एक करोड टन चीनी का भंडार मौजूद है। 2018-19 में चीनी का उत्पादन 3.5 करोड़ टन अनुमानित है जबकि चीनी की वार्षिक घरेलू मांग लगभग 2.5 करोड़ टन है, इससे चीनी के मूल्य कम होते है तो उस समस्या को चीनी के अतिरिक्त निर्यात करके ही कुछ कम किया जाता है परन्तु अंतर्राष्ट्रीय बाजार में चीनी का मूल्य कम होता है। भारत में चीनी के अत्यधिक उत्पादन की स्थिति के दुष्प्रभावों पर काबू पाने के प्रयास में उत्पादन सहायता राशि में लगभग 8 रुपये प्रति क्विटंल की बढ़ोत्तरी और इस राशि को सीधा किसानों के बैंक खातों में हस्तांतरित करने की घोषित पहल बकाया चुकाने में सहयोग करती लेकिन इससे किसानों को बकाये के अतिरिक्त कुछ नहीं मिल पायेगा।

किसानों का प्रतिवर्ष की तरह इस वर्ष भी चीनी मिलों पर करोड़ों रुपया बकाया है जो उन्हें अवश्य ही मिलना ही चाहिए। सेंट्रल शुगरकेन ऑर्डर के अनुसार किसानों को खरीद के 14 दिनों के अंदर भुगतान करने का आदेश है और ऐसा नहीं करने पर 15 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का प्रावधान भी है पर यह ऑर्डर मात्र कागज पर ही है। 2017-18 में गन्ने का रकबा बढ़ गया मानसून भी अनुकूल है तो चीनी उत्पादन में 60 प्रतिशत वृद्धि हो गई जिसका चालू वर्ष में बढऩे का अनुमान है। अंतर्राष्ट्रीय कीमतों में लगभग 50 प्रतिशत की गिरावट से चीनी निर्यात को झटका लगा जिससे चीनी मिलों के द्वारा भुगतान का संकट और गहरा गया। किसान को डीजल व पैट्रोल भी बढ़ी हुई कीमतों पर मिला और खेत में काम करने वाले मजदूरों की मजदूरी भी बढ़ गई है। कुल मिला कर फसल की लागत अधिक हो गई है। उधर भारतीय किसान यूनियन व राष्ट्रीय लोकदल मिल कर किसी प्रकार जाट व मुस्लिम का समीकरण बना कर सरकार पर दबाव बना कर अपनी मांग पूरा करना चाहते हैं व राष्ट्रीय लोकदल गत चुनावों में अपनी खोयी बची कुछ राजनीतिक जमीन को पुन: प्राप्त करने की प्रत्येक सम्भव कोशिश कर रहा है क्योंकि उसका गठबंधन कांग्रेस से रहा है जो स्वयं सत्ता से कोसों दूर है।

अनियमित भुगतान के कारण किसानों की मूलभूत आवश्यकताएं भी प्रभावित होती है जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था मुख्य धारा से कट गई है। सरकार बार बार कहती है कि गन्ने का बढ़ता रकबा परेशानी का सबब बन रहा है लेकिन किसान है कि सबसे सुविधाजनक समझी जाने वाली गन्ने की खेती के पीछे पड़े हैं। उनसे कोई नहीं कह सकता कि फसल बोने के लिए योजना अपना कर गन्ने के अलावा कोई अन्य फसल बोयें। सरकार व किसानों के हितैषी किसान संगठन किसानों को आंदोलन के लिए तो प्रेरित करते है परन्तु यह नहीं कहते कि मांग के अनुरुप ही गन्ना बोएं तथा गन्ने के अलावा कोई अन्य फसल भी बोएं जिससे उनकी आय भी बढ़ सके।

कृषि उत्पादों में संतुलन (मांग व पूर्ति में) के साथ किसान को अपनी आदतें भी बदलनी चाहिए जिससे सम्पन्नता में विपन्नता के जंगल से किसान निकल सके वरना वह वोट की राजनीति का शिकार होता रहेगा और गन्ने की अच्छी फसल होने से आने वाली उसकी आर्थिक सम्पन्नता गन्ने को खेतों में ही जला कर व चीनी मिलों में उसका भुगतान रुकने पर उसको विपन्नता में ही धकेला जाता रहेगा।

- डा. सूर्य प्रकाश अग्रवाल

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