राजनीति: देख तुम्हारी उछल-कूद....

राजनीति: देख तुम्हारी उछल-कूद....

म०प्र० के चुनावी दौरे पर आये राहुल गांधी गत दिनों चित्रकूट धाम भी पहुंचे । वहां उन्होंने एक श्रद्धालु हिन्दू जैसे कामतानाथ के दर्शन किये और मंदिर के पुजारियों तक से भी भेंट की। इसके चलते कांग्रेसियों ने उन्हें बतौर रामभक्त प्रचारित किया। इसके पहले राहुल कैलाश मानसरोवर यात्र पर गये थे, तब कांग्रेस पार्टी ने उन्हें शिवभक्त प्रचारित किया था। यह बताना जरूरी है कि दिसम्बर 2017 के गुजरात विधानसभा के चुनाव से ही देश के लोगों ने राहुल गांधी का एक नया रूप देखा था जबकि चुनाव के पूर्व और चुनाव के दौरान ही वह मंदिरों में जाकर सुर्खियां बटोरते रहे। इसके पश्चात तो देश में जहां भी उनकी यात्राएं होती हैं, मंदिर दर्शन उनका अनिवार्य कार्यक्रम रहता है।

इसी तारतम्य में कांग्रेस पार्टी कभी राहुल गांधी को जनेऊधारी हिन्दू बताती हैं तो कभी पूरी कांग्रेस पार्टी को ही कह दिया जाता हैं कि इसका डीएनए ही ब्राह्मण है।

यह तो सर्वविदित तथ्य हैं कि कुछ साल पहले तक देश में हिन्दू शब्द सांप्रदायिकता का ही पर्याय था और इसे एक गाली के रूप में प्रचारित किया जाता था। कोई भी व्यक्ति या संगठन जो हिन्दू का प्रयोग करता था या हिन्दू पक्षधरता की बात करता था, उसे सिर्फ सांप्रदायिक ही प्रचारित नहीं किया जाता था बल्कि उसे प्रतिगामी, विकास विरोधी, संकीर्ण मनोवृत्ति वाला, मुस्लिम और एक हद तक ईसाई विरोधी और यहां तक कि फासिस्ट विचारधारा वाला व्यक्ति या संगठन प्रचारित किया जाता था। हिन्दुत्व के आग्रह के चलते ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सदैव तथाकथित धर्म निरपेक्षतावादियों के निशाने पर रहा। एक हद तक कुछ ऐसी स्थिति पूर्व में जनसंघ और अब भाजपा के साथ भी है।

विडम्बना यह कि एक तरफ तो राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी अपने को हिन्दू या हिन्दू पक्षधर दिखने के लिए प्रयासरत हैं पर दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति उनका दुराग्रह पूर्ववत दिखाई पड़ता हैं। बीच-बीच में दिग्विजय सिंह जैसे कांग्रेस पार्टी के नेता अपने को यह बताने की चेष्टा करते हैं कि वह ज्यादा प्रमाणिक हिन्दू हैं क्योंकि वह एकादशी का व्रत रखते हैं। वह तो यहां तक कह चुके हैं कि असली हिन्दू वही हैं जबकि संघ और भाजपा के लोग नकली हिन्दू हैं। सच्चाई यह है कि संघ जब हिन्दू शब्द का प्रयोग करता है, तब उसका आशय यह होता है कि हिन्दू हमारी राष्ट्रीयता और संस्कृति का पर्याय है। भारत का सर्वोच्च न्यायालय भी यह स्वीकार कर चुका है कि हिन्दू शब्द किसी संप्रदाय या पूजा-पद्धति से संबंधित न होकर हमारी राष्ट्रीयता और भौगोलिक सीमाओं का उद्बोधक है। जहां तक हिन्दू समाज में व्याप्त जाति-पांति का संबंध है, उसे संघ कतई स्वीकार नहीं करता और इसे कालवाह्य मानता है, इसलिए संघ में किसी की जाति नहीं पूछी जाती, न जाति को कोई महत्त्व दिया जाता है। वस्तुत: संघ सत्ता की राजनीति नहीं करता पर राष्ट्रीय हितों और राष्ट्रीय एकता और अखण्डता का प्रबल आग्रही है। उसका यह मानना है कि कोई किसी भी संप्रदाय का क्यों न हो, उसकी पूजा-पद्धति चाहे जो हो पर उसे भारत माता के प्रति निष्ठावान होना चाहिए जिसकी सबसे बड़ी कसौटी यह है कि हमें अपनें महापुरूषों के प्रति जैसे राम, कृष्ण, शंकराचार्य, शिवाजी, महाराणा प्रताप के प्रति आदरभाव होना चाहिये।

संघ की सोच में अलगाववाद, विभाजनकारी ताकतों और भारत तेरे टुकड़े-टुकड़े होंगे, ऐसी मानसिकता वालों के लिए कोई स्थान नहीं है। राहुल गांधी को चाहे जितना भी खालिस हिन्दू बताया जाए पर जब जेएनयू में 'भारत तेरे टुकड़े-टुकड़े होंगे' नारे लगते हैं तो राहुल गांधी पूरी तरह इसके साथ खड़े होते हैं। संघ का यह भी स्पष्ट मानना हैं कि इस देश में हिन्दू बहुमत में है, तभी यहां लोकतंत्र है इसलिए वह घुसपैठियों के विरूद्ध है जिससे जनसंख्या का अनुपात न बदला जा सके क्योंकि हकीकत यही है कि 'जहां हिन्दू घटा, वह हिस्सा देश से कटा' पर राहुल गांधी जिस कांग्रेस पार्टी के हैं, वह कितना भी अपने को हिन्दू प्रचारित करे, असलियत यह है कि अतीत में उनका और उनकी पार्टी का हिन्दू विरोधी कदमों से इतिहास भरा पड़ा है जैसे मुस्लिम तुष्टिकरण के चलते कॉमन सिविल कोड न लागू करना, देश में वोट की खातिर बंग्लादेशी घुसपैठियों को बढ़ावा और संरक्षण देना।

हद तो यह है कि तीन तलाक जैसी अमानवीय और प्रतिगामी प्रथा का अब तक कांग्रेस पार्टी प्रकारांतर से समर्थन कर रही है। तभी तो तीन तलाक के विरोधी बिल को वह राज्यसभा में पारित नहीं होने देती और मोदी सरकार जब इसको लेकर अध्यादेश लाती है तो उसका भी विरोध करती है। लोगों को पता है कि मुस्लिम वोट बैंक की दृष्टि से पूर्व में कांग्रेस पार्टी की सरकारें आतंकवाद से प्रभावी ढंग ये लडऩें के लिए टाडा और पोटा कानूनों को समाप्त कर चुकी हैं। हद तो यह है कि वर्ष 2008 में यही कांग्रेस पार्टी की सरकार (यूपीए) सर्वोच्च न्यायालय में शपथ-पत्र दे चुकी है कि राम समेत रामायण के सभी पात्र काल्पनिक हैं। वह राम सेतु का अस्तित्व नहीं स्वीकर करती, वह आज भले खुलकर राम जन्म भूमि में राम मंदिर निर्माण का विरोध न करती हो पर राम मंदिर आंदोलन की शुरूआत से अभी कुछ वर्षो पूर्व तक राम मंदिर के निर्माण का प्रयास उसकी दृष्टि में पूरी तरह सांप्रदायिक और मुस्लिम विरोधी कृत्य था।

इंतिहा तो यह है कि कुछ महीनों पूर्व राहुल गांधी स्वत: कांग्रेस पार्टी को मुस्लिम बुद्धिजीवियों के बीच मुस्लिमों की पार्टी बता चुके हैं बाद में नुकसान के भय से भले ही सबकी पार्टी बता दिया हो। वस्तुत: कांग्रेस पार्टी एवं राहुल गंाधी के वर्तमान रवैय्ये को देखकर संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरू जी की वह बात याद आती है कि जब उन्होंने मिर्जा राजा जय सिंह का उल्लेख करते हुए लिखा है कि वह एक तरह से खूब धार्मिक था, बहुत पूजा-पाठ करता था, हिन्दुओं के व्रत रखता था, दान-पुण्य भी खूब करता था लेकिन औरंगजेब का सिपहसालार होने के चलते वह प्रकारांतर से मंदिरों को तोडऩे में सहयोगी था। हिन्दुओं के जबरन मतांतरण पर भी उसे कोई समस्या नहीं थी, हिन्दुओं पर जजिया कर से भी उसे कोई कष्ट नहीं था। क्या यही स्थिति राहुल गंाधी और कांग्रेस पार्टी की नहीं है वरना यदि वह सच्चे अर्थों में हिन्दू हैं तो राम मंदिर के प्रति पक्षधरता क्यों नहीं व्यक्त करते? यह बात इसलिए भी उल्लेखनीय है कि कांग्रेस पार्टी के नेता सर्वोच्च न्यायालय में राम मंदिर के प्रश्न पर 2०19 लोकसभा के चुनाव के बाद सुनवाई की मांग कर चुके हैं।

वह यह मानने को तैयार नहीं कि बंग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्या मुस्लिमों को देश से बाहर निकाला जाना चाहिये। वस्तुत: सच्चा हिन्दू होने या हिन्दुत्ववादी होने की एकमात्र कसौटी यही है कि राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हो पर हकीकत यही है कि कांग्रेस पार्टी मात्र अपने हितों की पक्षधर है, तभी तो किसी भी वर्ग या समुदाय की अनुचित मांग के साथ खड़ी हो जाती है। जैसे यदि जाट आरक्षण के लिए आंदोलन करें तो कांग्रेस पार्टी उनके साथ, पाटीदार आंदोलन करे तो उनके साथ, मराठा आंदोलन करें तो उनके साथ। बड़ा सच यही है कि यदि कांग्रेस पार्टी का वश चलता तो अब तक देश में 100 प्रतिशत आरक्षण हो गया होता जिसमें प्रतिभाओं के लिए कोई जगह नहीं रहती।

कांग्रेस पार्टी एवं राहुल गांधी का यह नया हिन्दू अवतार वस्तुत: वोट की दृष्टि से ही है। उन्हें लगता है कि भाजपा का विस्तार हिन्दू पक्षधरता के चलते हुआ है, इसलिए उन्हें भी अपने को कुछ आगे का हिन्दू दिखाना चाहिए पर वस्तुत: यहां भी उनकी समझ पर तरस आता है। वस्तुत: संघ और भाजपा का विस्तार हिन्दू प्रदर्शित करने से नहीं, ंिहन्दुत्व के जीवन मूल्यों यानी राष्ट्रहित सर्वोपरि है, इस जीवन दृष्टि के चलते हुआ है जो कि एकमेव सत्ता को दृष्टिगत रखने वाली कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी की समझ के परे है। ऐसी स्थिति में कुछ ज्यादा ही हिन्दू दिखने के लिए वह जो कर रहे हैं, उसके लिए माणिक वर्मा के शब्दों में यही कहा जा सकता है- 'देख तुम्हारी उछल-कूद बंदर भी शरमाये।'

- वीरेन्द्र सिंह परिहार

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