मुद्दा: जनता के धन को नेताओं पर उड़ा रही है सरकार

मुद्दा: जनता के धन को नेताओं पर उड़ा रही है सरकार

हाल ही में मध्य प्रदेश में नीमच के रहने वाले एक आरटीआई कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौड़ ने सूचना के अधिकार के तहत लोकसभा व राज्यसभा सचिवालय से अलग-अलग जानकारी प्राप्त की है। पिछले चार वर्षों में लोकसभा और राज्यसभा सांसदों के वेतन और भत्तों पर सरकारी खजाने के 19.97 अरब रुपये की भारी-भरकम रकम खर्च की गई। सूचना के अधिकार से यह खुलासा हुआ है कि गत चार साल में लोकसभा के हर सांसद ने प्रति माह औसतन 5 लाख 94 हजार 115 रुपये के वेतन-भत्ते हासिल किए, वहीं राज्यसभा के हर सांसद ने प्रत्येक माह औसतन 3 लाख 69 हजार 473 रुपये के नकद वेतन-भत्ते पाये। इसके अलावा उनको सरकारी मकान, मुफ्त बिजली, पानी, टेलीफोन, हवाई, रेल यात्र, मुफ्त चिकित्सा सुविधा, पद से हटने के बाद जीवन पर्यन्त पेंशन, मुफ्त रेल बस यात्रा की सुविधा मिलती है। इतना मिलने के उपरान्त भी सांसदों का सरकार पर वेतन में और बढ़ोत्तरी करने का लगातार दबाव बना हुआ है।

गुजरात विधानसभा ने गत माह एक विधेयक पारित कर विधायकों का वेतन प्रति माह 64 फीसदी बढ़ा लिया। वहां विधायकों का मासिक वेतन तकरीबन 45000 रुपए प्रतिमाह बढऩे से एक लाख 16 हजार रुपए हो गया है। वर्तमान में विधायकों का वेतन 70 हजार 727 रुपए है। वहीं मंत्रियों, विधानसभा अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और विपक्ष के नेता का वेतन तकरीबन 54 फीसदी बढ़कर एक लाख 32 हजार रुपए हो गया। अभी उनका वेतन 86000 रुपए है। इतना ही नहीं, संशोधित वेतन डेढ़ वर्ष पहले फरवरी 2017 से लागू होगा। गुजरात विधानसभा में विधायकों के वेतन बढ़ाने के प्रस्ताव का किसी भी दल के सदस्य ने विरोध नहीं किया। सभी ने एकराय होकर इस प्रस्ताव का समर्थन कर इसे तुरन्त पास करवा दिया।

इसे हम देश का इसे दुर्भाग्य ही कहेंगें कि यहां वोट देने वाला आम मतदाता दिन प्रतिदिन गरीब होता जा रहा है जबकि गरीबों के वोटों से जीत कर सांसद,विधायक बनने वाले जनप्रतिनिधि दिन-प्रतिदिन अमीर होते जा रहें हैं। आज राजनीति पैसा कमाने का जरिया बन गई है। लाभ के इस धन्धे में नेता करोड़पति बन रहे हैं। लोकतंत्र में संसद और विधानसभा देश की जनता का आईना होती है। संसद व विधानसभा के सदस्यों की समृद्वि को देखकर आसानी से समझा जा सकता है कि देश में अमीर-गरीब की खाई पहले से अधिक तेजी से बढ़ रही है। राजनीति में नेताओं की यह समृद्धि यूं ही नहीं आई है, इसके पीछे किसी न किसी का शोषण जरूर होता है।

एक चुनाव से दूसरे चुनाव के 5 बरसों के अन्तराल में जनप्रतिनिधियों की सम्पति में 10 गुना से 20 गुना तक वृद्धि हो जाती है जबकि देश की अर्थव्यवस्था 8 फीसदी तक नहीं बढ़ पा रही है। राजनीति करने वाले राजनेता जिनको बहुत अधिक वेतन नहीं मिलता, वो किस बूते बड़े शहरों में करोड़ों रूपयों वाले महलनुमा आलीशान बंगले खरीद लेते हैं तथा लाखों-करोड़ों की महंगी गाडिय़ों में घूमते हैं? इसमें दो राय नहीं है कि सरकारी दफ्तरों से लेकर नौकरशाहों के बीच भ्रष्टाचार की गंगा बह रही है लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि यदि राजनीतिक नेतृत्व ईमानदार हो तो मातहत कैसे भ्रष्टाचार कर सकते हैं?

वास्तव में देश के भीतर भ्रष्टाचार की एक श्रृंखला बन चुकी है। देश में व्याप्त राजनीति में मूल्यों के पतन से भ्रष्टाचार की फसल लहलहा रही है लेकिन सबसे चिंताजनक बात यह है कि राजनीति में धन व बल के बढ़ते वर्चस्व के चलते माफिया व आपराधिक तत्व राजसत्ता पर काबिज होने लगे हैं जिसके चलते भ्रष्टाचार का निरंतर पोषण जारी है। महंगी होती चुनाव प्रणाली ने इसे और प्रोत्साहित किया है। चुनाव में हुए खर्च को चुने गये जन प्रतिनिधि कई गुणा लाभ के साथ वसूलते हैं। जाहिर तौर पर यह पैसा भ्रष्ट आचरण, दलाली, कमीशन व ठेकों से उगाहा जाता है। फिर कमजोर नेतृत्व ने राजसत्ता को बरकरार रखने के लिए जिस तरह माफिया व अपराधियों का सहारा लिया उसके घातक परिणाम अब हमारे सामने आने लगे हैं।

सांसदों और विधायकों के चुनाव लड़ते वक्त दिये गये शपथपत्र के विश्लेषण से पता चला कि देश में चाहे 75 करोड़ लोग बीस रुपये रोज पर ही जीवन यापन करने पर मजबूर हो लेकिन जनता ने जिन्हें जिता कर संसद और विधानसभा में भेजा है, उसमें से 75 फीसदी यानी 4852 नुमाइन्दों में से 3460 नुमाइन्दें करोड़पति हैं। लोकसभा के 545 सांसदों में 445 व राज्यसभा के 250 सांसदों में से 194 सांसद करोड़पति हैं। इसी तरह देश के कुल 4078 विधायकों में से 2825 विधायक करोड़पति हैं। राजनीति को समाज तथा देश सेवा का माध्यम समझा जाता है, लेकिन यहां हो रहा है उसका बिलकुल उलटा।

हमारे देश के सांसदों की आार्थिक स्थिति का अंदाज तो इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज दोनों सदनों के सांसदों की घोषित सम्पति दस हजार करोड़ रूपए से अधिक है। सांसदों पर आरोप लगता है कि उनके पास घोषित से अधिक अघोषित संपत्ति है। आज राजनीति कमाई का सबसे अच्छा जरिया बन गई है। चुनाव लडऩे वाले नेताओं की संपत्ति में पांच वर्ष में औसत 134 प्रतिशत वृद्धि बड़े-बड़े उद्योगपतियों को चौंकाती है। कुछ मामलों में तो संपत्ति में वृद्धि की दर एक हजार प्रतिशत से ज्यादा देखी गई है। इसीलिए अब समृद्ध व्यापारी और उद्योगपति भी सांसद, विधायक बनने लगे हैं।

हमारे जनप्रतिनिधि अपने चुनाव खर्च की व्यवस्था भी उद्योगपतियों से करवाते है। यह सभी को पता है कि कोई भी व्यक्ति बिना किसी काम के किसी को पैसा अर्थात चंदा नहीं देता। सांसद या विधायक बनाने के बाद उनकी संपत्ति में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हो जाती है। लखपति करोड़पति व करोड़पति अरबपति हो जाता हैं, वो भी केवल पांच साल में। ये लोग संसद में सवाल पूछने के लिए भी उद्योगपतियों से पैसे लेते हैं। सरकार का विरोध या समर्थन करने के लिए भी पैसे व पद की मांग करते हैं। और तो और, सांसद व विधायक निधि से होने वाले काम में भी कमीशन लेते हैं।

पिछले दिनों एक बार फिर सर्वोच्च न्यायालय ने भ्रष्ट नेताओं पर प्रहार करते हुये कई सांसदों तथा विधायकों की संपत्ति में हुए पांच सौ गुणा तक के इजाफे पर सवाल खड़ा करते हुए यह जानना चाहा कि ऐसे जनप्रतिनिधि यह भी बता दें कि क्या उनकी आमदनी में इतनी तेजी से बढ़ोत्तरी उनके किसी व्यापार की वजह से हुई है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि अब यह सोचने का वक्त आ गया है कि भ्रष्ट नेताओं के विरुद्ध कैसे जांच की जाए। उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि जनता को यह पता होना चाहिए कि नेताओं की आय क्या है। इसे आखिर क्यों छुपा कर रखा जाए।

लोगों का मानना है कि सांसदों, विधायकों का वेतन भले ही दस गुना बढ़ा दिया जाए लेकिन वेतन के अलावा न तो उन्हें किसी तरह का भत्ता दिया जाना चाहिए, न ही मकान, वाहन, भोजन, चिकित्सा, रेल, हवाई यात्र, टेलीफोन और अन्य सुविधाओं पर उनके खर्च का भुगतान सरकारी खजाने से किया जाना चाहिए। सांसदों, विधायकों को भी काम के आधार पर वेतन दिया जाना चाहिये। संसद, विधानसभा के सत्र में भाग नहीं लेने वालों को उस दिन के वेतन का भुगतान नहीं होना चाहिये।

आज सांसद, विधायक ही नहीं छुटभैय्या नेता भी महंगी गाडिय़ों में घूमते हैं। राजधानी के बड़े होटलों में ठहरते हैं। कोई उनसे यह नहीं पूछता कि अचानक उनके पास इतना धन कहां से आ गया है। वो सब नेता अपने घर से तो लाकर पैसा खर्च करने से रहे। उनके द्वारा खर्च किया जा रहा पैसा सत्ता में दलाली कर गलत तरीकों से कमाया हुआ होता है जिसे वे जमकर फिजूलखर्ची में उड़ाते हैं। जब तक सत्ता में दलाली, भ्रष्टाचार का खेल बन्द नहीं होगा, तब तक राजनीति में सुचिता की बातें करना बेमानी ही होगा।

- रमेश सर्राफ धमोरा

विश्लेषण: अन्नदाता के परेशान रहते विकास के दावे बेमानी६

किसान क्रांति मार्च ने देश का ध्यान एक बार फिर किसान की दशा की ओर आकर्षित किया है। चुनावी राजनीति के चलते सभी दल अपने- अपने ढंग से इसे भुुनाने की कोशिशें कर रहे हैं। विपक्ष इसे सरकार की विफलता बता रहा है जबकि न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि सहित किसानों की अनेक मांगें मान कर सरकार ने इस आंदंोलन को समाप्त कराने में 'फिलहालÓसफलता प्राप्त की। स्वयं को सबसे बड़ा किसान हितैषी घोषित कर पक्ष-विपक्ष संभावित वोटों का आंकलन करने में व्यस्त हैं।

वोटों की बढिय़ा फसल प्राप्त करने की तिकड़म में लगे नेताओं को कहां मालूम है कि भारतीय परम्परा में धरतीपुत्र किसान को अन्नदाता घोषित करते हुए कृषि को श्रेष्ठ कार्य कहा गया है। यथा प्रसिद्ध कवि घाघ कहते हैं- उत्तम खेती मध्यम बान, निकृष्ट चाकरी, भीख निदान। वेदों में भी कृषि की महिमा है। ,ऋग्वेद में कहा गया है अक्षैर्मा दीव्य: कृषिमित् कृषस्व अर्थात् द्यूत आदि दुर्गुणों को छोड़कर सुख के लिए कृषि करो। इसी प्रकार कहा गया है- राजा और मंत्री दोनों मिल कर, बीज बोयें और समय- समय पर खेती कर प्रशंसा पाते हुए, आर्यों का आदर्श बनें। (ऋग्वेद 1.117) राजा हल पकड़ कर, मौसम आते ही खेती की शुरुआत करे और दूध देने वाली स्वस्थ गायों के लिए भी प्रबंध करे। (ऋग्वेद 4.574)। राजा जनक द्वारा हल चलाते हुए सीता की प्राप्ति है। इस से पता चलता है कि राजा- महाराजा भी वेदों की आज्ञा का पालन करते हुए स्वयं खेती किया करते थे। महाभारत आदिपर्व में ऋषि धौम्य अपने शिष्य आरुणि को खेत का पानी बंधने के लिए भेजते हैं अर्थात् ऋषि लोग भी खेती के कार्य करते थे। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो कृषि और किसान को प्रतिष्ठित करते है। इस बात पर विचार कौन और कब करेगा कि सदियों की भारतीय अवधारणा शीर्षासन को क्यों प्राप्त हुई?

यह कोई रहस्य नहीं कि आज छोटे किसान की हालत अत्यन्त खराब है। लगातार महंगी होती खेती कभी प्राकृतिक आपदाओं तो कभी संसाधनों के अभाव से घाटे का सौदा बनती जा रही है। आज गांव का किसान शहर में मजदूर बनने को विवश है तो यह अकारण नहीं हो सकता। अधिसंख्यक किसान बीमारी, शादी अथवा अन्य किसी कार्य के लिए ही नहीं, खाद आदि के लिए भी कर्ज लेने को विवश है क्योंकि केवल खेती पर आश्रित किसान की औसत मासिक आय शहर की न्यूनतम मजदूरी की एक चौथाई भी नहीं है।

कृषि उत्पाद के न्यूनतम खरीद मूल्य सरकार तय करती है। भुगतान की समस्या तो है ही, किसान को खरीद केन्द्र पर अनेक प्रकार की समस्या का सामना करना पड़ता है। तब वह खुले बाजार में सस्ते पर बेचने को विवश हो जाता है।

कृषि प्रधान कहे जाने वाले देश में किसान की दुर्दशा यह प्रमाणित करती है कि स्वतंत्रता के बाद से ही लगभग सभी सरकारों का कृषि के विकास और किसान के कल्याण के प्रति ढुलमुल रवैय्या रहा है। सत्ता गवां कर किसान समर्थक हो जाने वाले राजनैतिक दल से पूछे जाने पर कि 'क्या वे सत्ता में रहते हुए किसान की दशा सुधारने में अपनी विफलता को स्वीकार करते हैंÓ तो वे बहाने बनाने लगते हैं। अधिक हुआ तो सारा दोष वर्तमान सरकार पर लाद कर सत्ता में आते ही किसान की 'हर समस्या के समाधानÓ का वचन देते हैं। अपने पाप छिपाने के उपक्रम में उन्हें हिंसक आंदोलन से भी परहेज नहीं। उपरोक्त लक्षण किसी दल विशेष के नहीं क्योंकि सभी इस रोग से ग्रस्त हैं। किसान की कर्ज माफी का वादा अब से पूर्व भी अनेक दलों ने किया, दशा सुधारने की कसमें खाई परंतु जहां बढ़ती आबादी, औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के कारण कृषि योग्य क्षेत्रफल में निरंतर गिरावट आई है,, वहीं कृषि उत्पादन लागत में भी भारी वृद्धि हुई है।

लाख दावों के बावजूद कृषि पर आधारित उद्योग हर जिले तो दूर, हर प्रांत में भी अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करा सके। कृषि उत्पादों को सुरक्षित रखने के लिए गोदाम, कोल्ड स्टोरेज, रेफ्रीजिरेटर वैन, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, सार्वभौमिक फसल बीमा, विद्युत आपूर्ति, समय पर ऋण और बाजार उपलब्ध कराने के दावे सबने किये परंतु अनेक स्थानों पर खुले में बर्बाद होते अनाज के चित्र इन दावों की पोल खोलते हैं। दूसरी ओर फसल के समय कूड़े के दाम बिकने वाले प्याज सहित कुछ कृषि उत्पादों के दाम अचानक आसमान को छूने लगते हैं। स्पष्ट है कि अवसर मूल्य के नाम पर अर्जित मोटी कमाई बिचौलियों की जेबों में गई और किसान की हालत जस की तस बनी रही।

इस बात से शायद ही कोई असहमत हो कि देश की अर्थव्यवस्था के विकास में किसानों का महत्त्वपूर्ण योगदान है लेकिन छोटे और मंझोले किसानों की दशा सुधारने के लिए कोई ठोस नीति अनुपस्थित है। सब्सिडी को हर हालत में समाप्त करने की जिद्द करने वाले को दुनिया के बड़े देशों के दबाव में आये बिना बीज वितरण प्रणाली, सिंचाई सुविधा, वित्तीय सहायता, बाजार व्यवस्था, भंडारण सुविधा, फसल बर्बाद होने पर राहत पर अधिकतम ध्यान देना चाहिए।

किसान को परंपरागत कृषि व्यवस्था के साथ-साथ आधुनिकता के लिए तैयार करने में उदारता से निवेश करना चाहिए। उसे दाल, तिलहन जैसी वे फसलें बोने के लिए तैयार करना चाहिए जिन्हें हम आयात करते हैं अथवा जिन फसलों, फलों या सब्जियों की बाजार में ज्यादा मांग है। हर किसान को मौजूदा परिस्थितियों में उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए संसाधन और ज्ञान उपलब्ध कराते हुए उसके तात्कालिक लाभ की बात सोचना अपराध होगा।

यह संतोष की बात है कि वर्तमान सरकार ने 2०22 तक देश के किसानों की आय को दोगुना करने का लक्ष्य रखा है। प्रधानमंत्री जी बार-बार दोहराते हैं कि गांव, गरीब, किसान, मजदूर, महिला और युवा उनकी सरकार की शीर्ष प्राथमिकताएं हैं। न्यूनतम प्रीमियम पर अधिकतम मुआवजा देने के लिए फसल बीमा योजना से 5०,००० करोड़ रुपए की प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत हर खेत को पानी पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। मिट्टी की जांच कर अब तक 7 करोड़ से अधिक कार्ड जारी किये जा चुके हैं जबकि लक्ष्य सभी 14 करोड़ किसानों को ये कार्ड जारी करने का है। ई-नाम के जरिये किसान सारे कृषि बाजारों से जोड़े के प्रयास जारी है, ताकि हर किसान को जहां अच्छा भाव मिले, वहां अपनी फसल बेच सके। यहां यह विशेष ध्यान देना होगा कि हमेशा की तरह सरकारी व्यवस्था कागजी आंकड़े जारी न करें। इसके लिए जरूरी है कि भारी भरकम सरकारी मशीनरी को यह स्पष्ट निर्देश दिया जाये कि यदि आंकड़ों और यथार्थ में कहीं भी कोई विसंगति पायी जाती है तो संबंधित अधिकारी को दोषी मानते हुए उसके विरूद्ध कार्यवाही की जायेगी।

क्या यह उचित नहीं होगा कि विदेशी निवेश पर लाभ की 'काउंटर गारंटी' देने वाली पिछली सरकारों के साथ -साथ उस नीति को जारी रखने वाली वर्तमान सरकार खेती पर भी न्यूनतम लाभ की गारंटी का कानून बनाये। एक भी अन्नदाता की परेशानी के रहते विकास के हमारे सारे दावे खोखले ही नहीं, हास्यास्पद भी हैं। मोदीजी ने 'जय जवान' को सार्थक करते हुए सेना की आवश्यकताओं पर विशेष ध्यान दिया है। उसे 'जय किसान' के लिए भी और अधिक सक्रिय होना होगा।

ञ्च डा. विनोद बब्बर

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