बहस :सामाजिक और संवैधानिक नैतिकता में छिड़ा द्वंद्व

बहस :सामाजिक और संवैधानिक नैतिकता में छिड़ा द्वंद्व

रूढ़ हो चुकी सामाजिक धारणाओं व नैतिकता के खिलाफ जाकर समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर निकालने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला कई स्तरों पर झकझोरने वाला है। पहला तो यह कि देश बहुसंख्यक धारणाओं से नहीं, संविधान से संचालित होगा। दूसरा यह कि नैतिकता के आधार पर किसी के मौलिक अधिकारों (निजता के अधिकार सहित) को नहीं रोका जा सकता। तीसरा यह कि जन्मजात जो जैसा है, उसे वैसा ही स्वीकार करने की सहनशीलता समाज में होनी चाहिए। इन तीनों बातों का इससे कोई लेना-देना नहीं कि समलैंगिक संबंध अच्छा है या बुरा और होना चाहिए या नहीं।

कोर्ट की यह टिप्पणी काफी सारगर्भित है कि राज्य द्वारा स्थापित अदालतें अपराध के लिए तो दंडित कर सकती हैं पर पाप के लिए नहीं। पाप का फैसला कहीं और होता है। पाप और अपराध एक दूसरे का विस्तार नहीं हैं। जिन तर्कों के आधार पर कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है, उन पर शायद ही किसी को आपत्ति हो पर जिन बातों पर कोर्ट ने विचार नहीं किया है, उन्हें लेकर जरूर चर्चा गर्म हो रही है। यह फैसला किस तरह अन्य फैसलों को भी प्रभावित कर सकता है?

निजता के अधिकार पर पिछले साल अगस्त में आए फैसले को एक साल हो चुका है। तब सीजेआई ने कहा था, दरअसल स्वतंत्रता के अधिकार, मान-सम्मान के अधिकार और निजता के मामले को एक साथ कदम दर कदम देखना होगा।

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने निजता के तीन क्षेत्र बताए थे। पहला, आंतरिक क्षेत्र, जैसे शादी और बच्चे पैदा करना आदि इसके अंतर्गत बताए। दूसरा, जहां हम अपनी निजता को किसी और से शेयर नहीं करना चाहते, जैसे अगर बैंक में हम अपना डेटा देते हैं तो हम चाहते हैं कि बैंक ने जिस उद्देश्य से डेटा लिया है, उसी उद्देश्य से उसका इस्तेमाल करें। किसी और को डेटा न दें। तीसरा, सार्वजनिक क्षेत्र। इस दायरे में निजता का संरक्षण न्यूनतम होता है, फिर भी मानसिक और शारीरिक निजता बरकरार रहती है।

समलैंगिकता पर फैसले की इबारत उसी समय लिख दी गई थी, जब सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार पर फैसला सुनाया था। तब से ही माना जा रहा है कि इसका सभी क्षेत्रों पर पडऩे वाले प्रभाव का आकलन करना आसान नहीं है। तीन मामले सीधे तौर पर इससे जुड़े हैं। पहला, आधार की अनिवार्यता। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ में सुनवाई पूरी हुई थी जिसके बाद पीठ फैसला सुनाने वाली है। पीठ को तय करना है कि आधार निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है या नहीं।

भारत में अब दो समलिंगी बालिगों के बीच सहमति से बने संबंध अपराध नहीं रहे। कोई इसे समानता का अधिकार कायम होना बता रहा है तो किसी को इसमें हरेक को जिंदगी अपने मन से जीने की छूट मिली दिखाई दे रही है लेकिन क्या वाकई ऐसा है? हर व्यक्ति की इस बारे में अलग सोच हो सकती है। भारतीय समाज का एक बड़ा हिस्सा शायद इसे ऐसा घिनौना कार्य मानता है जिसे पशु भी नहीं करते। मन से जीना एक बात है और मनमानी से प्रवाह पतित हो जाना दूसरी बात है।

हवा से भी तेज गति से चलने वाला मन सब कराता है। अमर्यादित यौन आचरण, हर युग में रहा है लेकिन वह मूलत: शक्तिवान समाज से जुड़ा दिखाई पड़ता है। प्रकृति ने इस दृष्टि से सभी प्राणियों को मर्यादा में बांध रखा है। हम किसी भी प्राणी को देखेंगे तो वह उस प्रकृति प्रदत्त सीमा से बाहर यौनाचार करता दिखाई नहीं पड़ता। जंगल में रहने वाले स्वच्छंद प्राणी भी प्राकृतिक क्रम में और संतानोत्पत्ति के लिए ही यौनाचार करता है।

केवल मानव ही अपने अहंकार की तुष्टि के लिए अमर्यादित चर्या की ओर आकृष्ट होता है। उससे भी आगे बढ़कर आज बहुशिक्षित समाज में विशेष कर पाश्चात्य समृद्ध देशों में व्यक्ति जिन कुंठाओं के बीच जीवन यापन करता दिखाई पड़ता है और जिस तरह के मादक पदार्थों के सेवन के बीच अपनी वासनाओं से संघर्ष करता है, वहां इस तरह की गतिविधियों का चलन तेजी से बढ़ा है।

दूसरी बात यह भी है कि वहां हमारी तरह की कोई समाज व्यवस्था नहीं है जिसका अंकुश परोक्ष रूप से किसी व्यक्ति पर लगता हो। वहां की आबादी की इकाई व्यक्ति ही है और सारे कानून भी व्यक्ति को ध्यान में रखकर बने होते हैं। इसी का परिणाम है कि व्यक्ति स्वतंत्र होने के बजाय स्वच्छंद हो गया। सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को वैधता प्रदान नहीं की है। सिर्फ इसे डि-क्रिमिनलाइज (अपराध नहीं मानना) किया है। फैसले से सिर्फ इतना हुआ है कि एलजीबीटी समुदाय को पुलिस परेशान नहीं कर सकती।

लेकिन इस समुदाय की शिकायतों को पुलिस कितनी गंभीरता से लेगी, इसमें अभी दुविधा है। आमतौर पर हम देखते हैं कि कई दूसरे कानूनों के उल्लंघन के मामलों में भी पुलिस का रवैय्या सहयोगात्मक नहीं होता है। महिलाओं के शोषण के मामले में भी हम पाते हैं कि पुलिस एक बाधा बनी रहती है।

उल्लेखनीय है कि अब भी ऐसा नहीं हो सकता कि परिवार या समाज आसानी से मान जाएगा और कोई भी अपना लैंगिक सुझाव बता देगा और उसे आसानी से स्वीकार कर लिया जाएगा, जैसे दहेज के खिलाफ भी कानूनी प्रावधान है लेकिन दहेज का लेन-देन जारी है। अंतरधार्मिक विवाह को भी कानूनी मान्यता है लेकिन समाज उसे आसानी से स्वीकार नहीं करता। वैसे ही एलजीबीटी समुदाय को भी परिवार या समाज आसानी से स्वीकार नहीं करेगा।

हमारी परंपराएं कानून के समकक्ष मानी गई हैं। पुरूष प्रधान सेवाओं पर भी इसका असर पड़ेगा। इस तरह के कानून तो समाज की मर्यादा के भीतर ही अपना अस्तित्व तय करें, उसी में समाज और देश का हित शामिल है। एक काल के बाद हमें भी इस देश में सांस्कृतिक पवित्रता तार-तार होती दिखने लग जाएगी। चंद लोगों की मनमानी के कारण हमारे पुरातन ज्ञान की यही उच्छृंखल लोग होली जलाएंगे।

- नरेंद्र देवांगन

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