कानून की तलवार, स्त्रियों की रखवार

कानून की तलवार, स्त्रियों की रखवार

घर की जिस चारदीवारी को स्त्री की सुरक्षा की सबसे बड़ी गारंटी माना जाता है, वस्तुत: वही कई बार स्त्रियों के लिए उनके हिंसक शारीरिक-मानसिक उत्पीडऩ का सबसे बड़ा और स्थायी स्रोत बन जाती है। सार्वजनिक अपमान की ठोस घटनाओं और कटु-कर्कशी सच्चाइयों से भरे परिवारों के उत्पीडऩ से, बिना अपनी अस्मिता छोड़े, निबटने की ताकत 'घरेलू हिंसा निषेधी कानून' के रूप में सरकार ने को महिलाओं को थमा दी है।

यह कानून (नियम) हर उस महिला पर लागू होता है जो किसी घर के दायरे में रहती है। यह विधेयक इस मामले में भी अहम् है कि यह देश के सभी धर्मों की औरतों पर समान रूप से लागू होता है। इसमें घरेलू हिंसा की शिकार महिला को फौरी मदद पहुंचाने की भी गुंजाइश है। इस कानून में सिर्फ सजा देने भर पर ही जोर नहीं दिया गया है बल्कि परेशान महिला को अधिक भटकना न पड़े, इसका भी पूरा इंतजाम किया गया है।

विधेयक की परिभाषा के मुताबिक शारीरिक हिंसा, लैंगिक हिंसा, मौखिक एवं भावनात्मक हिंसा, आर्थिक हिंसा तथा दहेज से जुड़ी उत्पीडऩ की शिकायतों को कोई भी महिला थाने में दर्ज करा सकती है जिस पर त्वरित कार्रवाही की जाएगी।

घरेलू औरतों को थप्पड़ मारना, ठोकर मारना, दांँत काटना, लात मारना, मुक्का मारना, धक्का देना, धकेलना या किसी अन्य तरीके से शारीरिक तकलीफ देने पर इस विधेयक के अनुसार उत्पीडऩकर्ता को सजा हो सकती है।

घरेलू औरतों या लड़कियों से जबर्दस्ती यौन संबंध बनाना, अश्लील साहित्य पढऩे को देना, अश्लील तस्वीरें या सामग्री देखने को मजबूर करना, किसी दूसरे का मन बहलाने के लिए मजबूर करना, अपमानित करने या नीचा दिखाने के लिए लैंगिक प्रकृति का या कोई दूसरा कर्म करना जो महिलाओं के सम्मान को किसी न किसी रूप में चोट पहुंचाता हो और बालकों या बच्चियों के साथ यौनिक दुर्व्यवहार को भी इस विधेयक में शामिल किया गया है।

किसी भी घरेलू औरत का मजाक उड़ाना, गालियां देना, उसके चरित्र या आचरण पर दोषारोपण करना, लड़का या संतान न होने पर उसे प्रताडि़त करना, ताना देना, दहेज के सवाल पर प्रताडि़त करना या अपमानित करना, स्कूल, कॉलेज या किसी अन्य संस्थान में जाने से रोकना, नौकरी करने से रोकना, नौकरी छोडऩे पर मजबूर करना, महिला या उसके साथ रहने वाले किसी बच्चे/बच्चों को घर से जाने से रोकना, किसी व्यक्ति विशेष से मिलने से रोकना, ख्वाहिश के खिलाफ शादी करने पर मजबूर करना, पसन्द के व्यक्ति से शादी करने से रोकना, आत्महत्या करने पर मजबूर करना या पुरूष को या उसके किसी भी सहयोगी को सजा मिल सकती है।

महिला या महिला की संतानों को भरण-पोषण के लिए पैसा न देना, भोजन, कपड़ा, औषधि आदि की व्यवस्था न करना, महिला या उसके बच्चों को घर से निकलने पर मजबूर करना, घर के किसी हिस्से में जाने या किसी हिस्से के इस्तेमाल पर रोक लगाना, रोजगार करने से रोकना, किसी रोजगार को अपनाने में बाधा पहुंचाना, मासिक वेतन या पारिश्रमिक को जबर्दस्ती हड़प लेना, कपड़े या दूसरी रोजमर्रा के घरेलू इस्तेमाल की चीजों के प्रयोग से रोकना, स्त्री अगर किराये के मकान में रह रही है तो उसका किराया न देना, बिना महिला की सूचना और सहमति के स्त्रीधन (स्त्री की सम्पत्ति) या अन्य मूल्यवान वस्तुओं को बेच देना या बंधक रखना, स्त्रीधन को खर्च कर देना आदि पर भी यह विधेयक अपना शिकंजा कसता है और महिला उपरोक्त सभी या किसी भी एक के होने पर कानूनी सहायता ले सकती है।

दहेज से संबंधित किसी भी प्रकार की मांग या दहेज से संबंधित किसी प्रकार के उत्पीडऩ पर महिला इस विधेयक के माध्यम से कानूनी कार्यवाही कर सकती है। इस विधेयक ने महिलाओं को सशक्त बनाया है और वे घरेलू हिंसा के खिलाफ अब अपनी आवाज उठा सकती है। अब औरत का शरीर ही नहीं बल्कि उसका दिल दुखाना भी मर्दों को महंगा पड़ेगा।

हिन्दुस्तान के निवासी मर्द अगर स्त्रियों के लिए संवेदनशील नहीं बने तो उन्हें अब अनेक मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। घरेलू हिंसा को विस्तार से जानकर और समझकर ही महिलाएं इस विधेयक से लाभ उठा सकती हैं।

-पूनम दिनकर

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