राजनीति: तत्काल तीन तलाक पर कांग्रेस व विपक्षियों की दोगली राजनीति

राजनीति: तत्काल तीन तलाक पर कांग्रेस व विपक्षियों की दोगली राजनीति

केन्द्र में भाजपा नेतृत्व वाली सरकार ने जिस प्रकार तत्काल तीन तलाक बिल को लोकसभा में पारित करवाया तथा वहां कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने अपना समर्थन व्यक्त किया परन्तु जब बिल राज्यसभा में ले जाया जाने लगा तो कांग्रेस व विपक्षी दलों ने अपना समर्थन वापस ने लिया और तत्काल तीन तलाक का यह बिल राज्यसभा में पारित होने से रुक गया तथा यह कानून न बन सका। पहले लोकसभा में समर्थन तथा फिर राज्यसभा में समर्थन क्यों नहीं? इसको दोगली राजनीति ही कहा जायेगा। बस भाजपा को तत्काल तीन तलाक का श्रेय न मिल जाये तथा 2019 के चुनाव में कांग्रेस व विपक्षी दल भाजपा के विरुद्ध यह प्रचार करें कि भाजपा मुस्लिम महिलाओं की हितैषी नहीं है क्योंकि 2104 के चुनाव में मुस्लिम महिलाओं ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को वोट दिया था।

भाजपा ने भी 19 सितम्बर 2018 को तत्काल तीन तलाक पर अध्यादेश लाकर तत्काल तीन तलाक को अपराध की श्रेणी में रख दिया जिससे आगामी छ: महीनों के लिए मुस्लिम महिलाओं को एक साथ तत्काल तीन तलाक जैसी कुरीति के उत्पीडऩ से तत्काल राहत मिल जायेगी। संसद के शीत कालीन सत्र में सरकार इस बिल को पास कराने की कोशिश करेगी, उसमें 2019 के नजदीक आते चुनावों में कांग्रेस व विपक्षी दल क्या रवैया अपनाते हैं, यह देखना है? केन्द्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि कांग्रेस व विपक्ष ने तत्काल तीन तलाक विधेयक को राज्यसभा में पारित नहीं होने दिया तथा मुस्लिम महिलाओं के अधिकार संरक्षण वाले मामले में कांग्रेस व विपक्षी दल मुस्लिम तुष्टिकरण करके वोट की राजनीति कर रही है।

तत्काल तीन तलाक के मामले पर सजा के प्रावधान के बाद से पहले मुस्लिम महिलाएं कितनी असुरक्षित थी और अब बाद में कितनी सुरक्षित होंगी, यह अलग सवाल है। सरकार ने साफ कर दिया है कि वो तत्काल तीन तलाक पर मुस्लिम महिलाओं की स्थिति को लेकर गम्भीर है जो कि स्वागत योग्य है। इस कानून में सजा का प्रावधान किया गया है। सरकार एक स्वच्छ मंशा से मुस्लिम महिलाओं की भलाई के लिए कदम उठा रही है। इस मामले में भाजपा सरकार की मंशा निर्मल व स्वच्छ है तथा इससे मुस्लिम समाज का लाभ ही होगा।

विवाह के उपरान्त मुस्लिम महिला के अधिकारों की रक्षा के लिए यह अध्यादेश लाना केन्द्र सरकार का नैतिक दायित्व बन गया था। उच्चतम न्यायालय के द्वारा तत्काल तीन तलाक को अवैध घोषित कर देने के बाद भी मुस्लिम समुदाय द्वारा छोटी सी बात पर पत्नी को तीन तलाक बोल कर परित्याग करने का सिलसिला जारी था। बीवी अगर देर से सोकर उठी तो तत्काल तीन तलाक, मनपसंद खाना नहीं बनाया तो तत्काल तीन तलाक, मायके से देर से आयी तो तत्काल तीन तलाक। मुस्लिम मर्दों ने तत्काल तीन तलाक को मजाक बना दिया व औरतें बेबस, निरीह और दया की पात्र हो गयी। उच्चतम न्यायालय में इस विषय पर लम्बी लम्बी बहसें हुई। इसे उच्चतम न्यायालय के द्वारा यूंही अवैध घोषित नहीं किया गया था। देश के प्रत्येक धर्म की महिलाओं को बराबरी का अधिकार व हक है तो फिर मुस्लिम महिलाओं को इस अधिकार से वंचित कैसे किया जा सकता है?

मुस्लिम मर्दों पर दकियानूसी मौलानाओं का आवश्यकता से अधिक प्रभाव है। इसलिए वे इस बिल का शरीयत के नाम पर विरोध करते है। मर्दों का यह विरोध और कुछ नहीं, विधवा विलाप ही सिद्ध होने वाला है क्योंकि महिलाओं ने इसे प्रसन्नतापूर्वक और अत्यन्त उत्साह से स्वीकार किया है। केन्द्र सरकार इस अध्यादेश को लाने के लिए बधाई की पात्र है। कांग्रेस व विपक्षी दलों को इस बिल व अध्यादेश का समर्थन करना चाहिए। जो भी इसका विरोध करेगा, इतिहास उसे कभी माफ नहीं करेगा। आश्चर्य है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, मोरक्को, इंडोनेशिया, मलेशिया, टयूनीशिया जैसे इस्लामिक देशों सहित 22 देशों ने पहले ही तत्काल तीन तलाक पर प्रतिबंध लगा रखा हैं। क्या वहां का शरीयत कुछ अलग है परन्तु भारत के मौलाना व मुस्लिम वोटों की राजनीति करने वाले राजनीतिक दल चीख चीख कर इसका विरोध करते है। जो समाज कुरीतियों और गलत परम्पराओं को नहीं छोड़ता, समय उसका साथ छोड़ देता है।

देवबंद के दारुल उलूम के मोहतमीम ने इस अध्यादेश को मजहबी मामलों में हस्तक्षेप और सरकार की मनमानी करार दिया है। मोहतमीम मुफ्ती अबुल कासिम नौमानी ने कहा कि देश का संविधान हमें मजहबी आजादी के साथ जीने की इजाजत देता है। तलाक व निकाह जैसे मामले पूरी तरह मजहबी हैं। धार्मिक मामलों में कोई हस्तक्षेप कबूल नहीं है, लिहाजा सरकार का यह कदम संविधान के खिलाफ है। सरकार मुस्लिम पर्सनल लॉ से छेड़छाड़ कर संविधान विरोधी और अनुचित कार्य कर रही है। तंजीम उलमा-ए-हिंद के प्रदेश अध्यक्ष मौलाना नदीमुल वाजदी ने कहा कि तीन तलाक को कानूनन जुर्म बना कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार मुसलमानों को परेशान कर रही है। जमीयत उलमा -ए- हिंद के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष हसीब सिदद्ीकी ने कहा कि सरकार तत्काल तीन तलाक पर बनाए बिल को राज्य सभा में नहीं पास करा पायी। अब अध्यादेश लाकर जबरन इस कानून को थोपा जा रहा है।

अध्यादेश के लागू होने से अब तक बोल कर, कागज की पर्ची पर तीन बार लिखकर, ई-मेल द्वारा, एस एम एस द्वारा या व्हाटसऐप के द्वारा तत्काल तीन तलाक देना वैध था जो अब अवैध और अमान्य हो गया। जम्मू व कश्मीर को छोड़ कर शेष भारत में अध्यादेश लागू हो गया। एक साथ तीन तलाक बोल कर तत्काल तीन तलाक देना अब एक आपराधिक कृत्य माना जायेगा जिसके लिए तीन साल तक की कैद और जुर्माने का प्रावधान है। यह एक गम्भीर व गैर जमानती अपराध माना जाएगा। भारत में हिन्दू, सिक्ख, जैन, बौद्ध, ईसाई महिलाओं और पुरुषों के लिए एक ही तरह का तलाक कानून है और वह है अदालत के द्वारा उचित सुनवाई के बाद तलाक। जब सभी सम्प्रदायों में तलाक का निर्णय अदालत में न्यायाधीश के द्वारा गुण दोष के आधार पर किया जाता है तो मुस्लिम समुदाय अपवाद क्यों?

जेल से लौटने के बाद मुस्लिम महिला का पति तीन महीने का समय लेते हुए एक एक महीने के बाद तीन बार तलाक बोल कर अपनी पत्नी से छुटकारा पा सकता है जो कहीं से भी तर्कसंगत नहीं होगा वरन् यह मुस्लिम महिलाओं पर अत्याचार ही कहा जा सकता है। सरकार को अदालत के अतिरिक्त किसी भी तरीके से दिए गये तलाक को अवैध और आपराधिक कृत्य घोषित करना चाहिए था। तत्काल तीन तलाक जैसी कुरीति के साथ हलाला और मुताह भी एक तरह की कुरीतियां ही है जो मुस्लिम महिलाओं पर अत्याचार करती है। इनके लिए भी कानून लाना चाहिए और इस प्रकार के कानून मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति करने वाले राजनीतिक दल नहीं ला सकते है। वे तो वोट के लालच में तत्काल तीन तलाक, मुताह व हलाला का तमाशा देखते रहेगें और मुस्लिम महिलाओं पर अत्याचार होता रहेगा।

मुस्लिम महिला विधेयक को लोकसभा में पास कराने तथा अब अध्यादेश लाने के लिए केन्द्र की मोदी सरकार निश्चित रुप से बधाई की पात्र है। राज्यों के महिला आयेाग व केन्द्रीय महिला आयोग को भी तत्काल तीन तलाक, हलाला व मुताह पर संज्ञान लेने के लिए कहा जाना चाहिए। मुस्लिम वोटों के लिए कांग्रेस सहित विपक्षी दल दोगली राजनीति करते ही रहेंगे।

- डा. सूर्य प्रकाश अग्रवाल

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