विश्लेषण: संघ दृष्टि में 'भविष्य का भारत' की प्रासंगिकता

विश्लेषण: संघ दृष्टि में भविष्य का भारत की प्रासंगिकता

भारत सदैव से ही दुनिया के लिए उत्सुकता का विषय रहा है। विश्व इतिहास में भी दर्ज है कि ज्ञान और कला की हमारी समृद्ध विरासत को निकट से देखने, अनुभव करने और लेखनीबद्ध करने के लिए दुनियाभर के विद्वान यात्रियों ने भारत की यात्राएं की हैं। आज भी विश्व के लिए भारत के अतीत और भविष्य का महत्व है तो स्वयं भारतीयों में अपनी मातृभूमि के लिए भावनाएं न हों, ऐसा होना अस्वाभाविक है। हर भारतवंशी भारतवर्ष को विश्व के महान और समृद्ध देशों में अग्रणी देखना चाहता है। इसके लिए उसे भारत के हर महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व और संस्था से अपेक्षाएं भी है।

पक्ष-विपक्ष कुछ भी कहे लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि वर्तमान भारतीय समाज में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ महत्वपूर्ण स्थान रखता है, केवल इसलिए नहीं कि संघ विश्व का सबसे बड़ा स्वैच्छिक संगठन है बल्कि इसलिए भी वर्तमान में देश के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर अनेक केन्द्रीय और प्रादेशिक मंत्री संघ के स्वयंसेवक रह चुके हैं। यह भी विशेष उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ दशकों से देश की सामाजिक, राजनीतिक दिशा और दशा पर संघ विचार का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। वहीं विरोधी भी संघ के बारे में अनेक प्रकार के भ्रम उत्पन्न कर रहे हैं। ऐसे में केवल भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में संघ को निकट से जानने की उत्सुकता हैं।

हालांकि संघ समय-समय पर इस बारे में चर्चा करता रहता है लेकिन यह पहली बार है कि उसने विश्व के अनेक देशों, अपने देश के सभी राजनैतिक दलों तथा उद्योग, मीडिया और अन्य क्षेत्रों के प्रतिनिधियों, बुद्धिजीवियों, कलाकारों, साहित्यकारों, नौकरशाहों, न्यायविदों के साथ तीन दिवसीय संवाद कार्यक्रम आयोजित किया। 'संघ की दृष्टि में भविष्य का भारत' विषय पर प्रथम दो दिन संघ प्रमुख श्री मोहन भागवत ने अपने व्याख्यान में सार्वजनिक महत्व के अधिकांश विषयों पर संघ के विचार प्रस्तुत किये और सभी श्रोताओं से उनकी शंकाएं व प्रश्न भी आमंत्रित किये। अंतिम दिन प्राप्त 215 प्रश्नों के उत्तर देकर विभिन्न शंकाओं का निवारण करने का प्रयास भी हुआ।

संवाद भारत की परम्परा है, इसलिए ऐसे हर आयोजन का स्वागत होना चाहिए। लगभग 3000 लोगों को आमंत्रित किया गया था। विपक्ष के अधिकांश दल इस संवाद से दूर रहे जबकि समाज के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधि अपेक्षा के अनुरूप दिल्ली के विज्ञान भवन में बड़ी संख्या में उपस्थित थे। इसलिए संघ दृष्टि पर चर्चा होना स्वाभाविक है। अपेक्षा के अनुरूप 'हिन्दुत्व और हिन्दू राष्ट्र' पर अनेक प्रश्न भी रहे। वहीं संघ प्रमुख ने स्वतंत्रता आंदोलन में कांग्रेस की भूमिका की सराहना करते हुए कहा था कि 'संघ युक्त भारत में विश्वास रखता है, मु्क्त भारत में नहीं।' हालांकि इसके अनेक अर्थ लगाये जा सकतेे हैं।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि, 'देशभक्ति, पूर्वज गौरव व संस्कृति हिन्दुत्व के तीन आधार हैं। भारत हिंदू राष्ट्र था, है और रहेगा। देश में रहने वाले विभिन्न जातियों, धर्म, बोलियों को बोलने व मानने वाले सभी लोग अपने हैं। हमारा कोई शत्रु देश व दुनिया में नहीं है, यदि कोई है भी तो हम उसे साथ लेकर चलने की आकांक्षा रखते हैं। हिंदू राष्ट्र का यह अर्थ नहीं है कि मुसलमानों को बाहर निकाल दो। सभी मतों के तत्व ज्ञान को हम हिन्दू धर्म कहते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि हिन्दू मत कहो, भारतीय कहो। बात तो एक ही है। हिन्दू शब्द के रहने से भारतीय स्वभाव नहीं बदलेगा।'

संघ प्रमुख ने सरकार चलाने की अटकलों को खारिज करते कहा, 'बेशक सरकार में काम कर रहे काफी लोग स्वयंसेवक हैं लेकिन मुझे संघ कार्य का जितना अनुभव है, उससे ज्यादा उनका राजनैतिक अनुभव है। उन्हें अपनी राजनीति चलाने के लिए किसी की सलाह की आवश्यकता नहीं है। हां, उन्हें सलाह चाहिए और हम दे सकते हैं तो हम देते हैं। देश की व्यवस्था संविधान के अनुसार चलती है। चलनी भी चाहिए क्योंकि हम संविधान का आदर करने वाले लोग हैं।

'एक ही दल में स्वयंसेवक क्यों' का उत्तर देते हुए उनका मत था कि हम अपने स्वयंसेवकों को किसी विशिष्ट राजनीतिक दल का काम करने के लिए नहीं कहते। 'राष्ट्र के लिए एक विचार को लेकर, एक नीति का स्वप्न लेकर काम करने वालों के पीछे खड़े हो जाओ', ऐसा हम जरूर कहते हैं। वह नीति किसी भी दल की हो सकती है। संघ के दायित्वधारी कार्यकर्ता राजनीति में नहीं पड़ते हैं। हां, सामान्य स्वयंसेवक स्वतंत्र हैं, वह कर भी सकते हैं और नहीं भी। हमारा काम राजनीति नहीं, व्यक्ति निर्माण है। अन्य दल भी इसका लाभ ले सकते हैं। हम राजनीति में नहीं पड़ते लेकिन राष्ट्रनीति पर मौन नहीं रह सकते।

उन्होंने राममंदिर का निर्माण जल्द से जल्द होने की बात कही, वहीं धारा 370 पर अपने परम्परागत मत को दोहराते हुए इसे हटाने पर बल दिया। जाति और आरक्षण के सवाल पर उनका दृढ़ मत था कि सामाजिक विषमता को हटाकर समाज में सबको अवसर मिले। संविधान सम्मत आरक्षण को संघ का समर्थन है। समस्या आरक्षण नहीं, आरक्षण की राजनीति है। समाज के सभी अंगों को साथ लाने पर ही काम करना होगा। जो ऊपर हैं, उन्हें झुकना होगा और जो नीचे हैं, उन्हें एड़ी ऊपर करके बढऩा होगा। कभी जाति व्यवस्था रही होगी लेकिन अब जाति अव्यवस्था है। सामाजिक विषमता को बढ़ाने वाली सभी बातें दूर होनी चाहिए। यह यात्रा लंबी है लेकिन यह करना ही होगा। संघ में किसी से उसकी जाति नहीं पूछी जाती। रोटी, बेटी के संबंध पर उन्होंने भारत के प्रथम अन्तर्जातीय विवाह पर गुरुजी के संदेश की चर्चा करते सर्वाधिक अन्तर्जातीय विवाह संघ के स्वयंसेवकों के होने की बात भी कही।

हर मातृभाषा को सम्मान, सम्पर्क के लिए हिंदी और हिंदी भाषियों को कम से कम एक क्षेत्रीय भाषा सीखने पर बल देते हुए शिक्षा के माध्यम व शिक्षा नीति पर भी अपने विचार रखे। शिक्षा नीति में आमूल चूल परिवर्तन की मांग करते हुए उनका मत था, 'धर्म की शिक्षा भले न दें लेकिन देश की शिक्षा अनिवार्य है। हर कोई इंजीनियर या डाक्टर नहीं बन सकता।

जो करें उसे बढिय़ा ढंग से करें।' इस संबंध में उन्होंने तिलक जी द्वारा अपने पुत्र को लिखे पत्र का विशेष उल्लेख किया जिसमें उन्होंने अपने पुत्र से कहा था, 'जो भी करो, श्रेष्ठ करने का प्रयास करो। अगर जूते भी बनाओ तो ऐसे कि हर व्यक्ति कहे- मुझे तिलक के बेटे के हाथ के बने जूते ही लेने हैं।'

गोरक्षा और माब लिंचिंग पर भागवत जी ने कहा, 'गाय ही नहीं, किसी भी मुद्दे पर भी कानून हाथ में लेना या तोडफ़ोड़ करना अपराध है। गोरक्षा होनी चाहिए, लेकिन गोरक्षकों और उपद्रवियों में तुलना नहीं होनी चाहिए।' समान नागरिक संहिता और जनसंख्या नियंत्रण , धर्मान्तरण, एससी, एसटी एक्ट, नोटा पर भी प्रश्नों के उत्तर देते हुए कहा, 'राजनीति में पूर्णता फिलहाल संभव नहीं। अत: उपलब्ध विकल्पों में बेहतर (बेस्ट एवेलेबल) को चुनना चाहिए। नोटा का उपयोग सबसे खराब (वस्र्ट एवेलेबल) की ओर ले जा सकता है। यह भी कहा कि यह सुनिश्चित हो कि किसी कानून का दुरुपयोग न हो परंतु अत्याचारी भी नहीं बचने चाहिए।

इस पहल पर कहा जा सकता है कि यदि संघ आज की वास्तविकता है तो उसके विचारों को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। राष्ट्रहित में अपनी नीतियों की लगातार समीक्षा, समयानुकूल आपेक्षाकृत लचीला रुख अपनाने के लिए संघ की प्रशंसा करते हुए भविष्य के भारत पर संघ दृष्टि पर निष्पक्षता और गंभीरता से विचार अवश्य किया जाना चाहिए।

- डा. विनोद बब्बर

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