मुद्दा: शौचालय निर्माण व स्वच्छता मिशन का आर्थिक विकास में योगदान

मुद्दा: शौचालय निर्माण व स्वच्छता मिशन का आर्थिक विकास में योगदान

देश में स्वास्थ्य का अधिकार जनता का प्राथमिक अधिकार समझा जाता है परन्तु भारत में स्वास्थ्य की तरफ पर्याप्त ध्यान न देने से तथा स्वास्थ्य सेवा के अभाव के कारण देश में प्रतिदिन ही हजारों लोग अपनी जान अस्पतालों में चिकित्सा के दौरान गंवा देते है।

देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के द्वारा इस ओर ध्यान दिया गया तथा अक्टूबर 2014 में स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत कर दी। 2 अक्टूबर 2019 तक समस्त भारत से खुले में शौच व्यवस्था का समूल उन्मूलन करने का लक्ष्य निश्चित किया गया। शौचालय निर्माण तथा स्वच्छता से देश के आर्थिक विकास में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रुप से योगदान दिखाई देने लगा है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन में केन्द्र व राज्य सरकारों ने रोग नियंत्रण कार्यक्रमों में भारी निवेश किया गया है। शौचालयों का निर्माण भी तेज गति से किया गया है। वर्ष 2014-15 से अब तक 7,196 करोड़ शौचालय बनाने का दावा किया गया है। भारत में अब तक 3,60,000 से अधिक गांवों को खुले में शौच से मुक्त घोषित कर दिया गया है।

लोगों का औसत मासिक पारिवारिक चिकित्सा बिल जो लगभग 120/- प्रति महीने आता था, वह अब कम हो गया है। परिवार के बीमार सदस्यों को चिकित्सक के पास ले जाने में व्यय होने वाले समय में भी कमी आयी है। अब वे लोग उत्पादक कार्य की ओर अधिक ध्यान देने लगे है। खुले में शौच मुक्त गांवों के परिवारों को मिलने वाले आर्थिक लाभ को ज्ञात करने के लिए यूनिसेफ ने 12 राज्यों के 18,000 लोगों के बीच एक अध्ययन कराया था, उससे ज्ञात हुआ कि खुले में शौच से मुक्त होने पर प्रति परिवार के चिकित्सा व्यय में लगभग 4,200/- रुपये प्रति परिवार वार्षिक बचत हुई है। समय की बचत हुई सो अलग तथा लोगों की जान भी बची है जिससे प्रति परिवार 19,000/- की सम्पत्ति में बढोत्तरी हुई है। सफाई के कारण प्रति परिवार दस वर्ष की अवधि में निवेश से 4.3 गुना अधिक प्राप्ति होगी।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू एच ओ) के अनुसार सफाई पर होने वाले व्यय पर वैश्विक आर्थिक प्रतिफल प्रति डॉलर निवेश पर करीब 5.5 डॉलर है। यू एन वाटर के अनुसार साफ सफाई में बेहतरी से प्रत्येक परिवार को काम करने, अध्ययन करने, बच्चों की देखभाल करने आदि के लिए 1,000 अतिरिक्त घंटे मिलते है अर्थात प्रति परिवार अब 8 घंटे के काम के 125 दिन अतिरिक्त मिलते है। खुले में शौच मुक्त भारत को प्रतिवर्ष काम के 1,००० करोड अतिरिक्त दिन मिल सकते है।

विश्व बैंक के अनुसार अपर्याप्त सफाई के कारण प्रति वर्ष लगभग 26,000 करोड डॉलर की हानि होती है जिससे विभिन्न देशों को जीडीपी के 0.5 प्रतिशत से 7.2 प्रतिशत तक की हानि होती हैं। विश्व बैंक से ऋण लेने के बाद सरकार ने अनुमान लगाया कि गांवों में शौचालय बनाने के लिए 2,200 करोड़ डॉलर अर्थात 1496 अरब रुपये की आवश्यकता होगी। वर्ष 2017-18 तक सरकार द्वारा केवल 3,700 करोड़ व्यय किये गये जबकि 2018-19 के लिए 15,400 करोड़ रुपये का आंबटन हो चुका है।

भारत में पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में करीब 38 प्रतिशत शारीरिक व संज्ञानात्मक रुप से कमजोर है। ऐसी स्थिति में देश में साफ सफाई व स्वच्छता एक मुख्य मुददा देश के राजनीतिक दलों के लिये हो सकता है। इसका प्रभाव देश में भविष्य की उत्पादन क्षमता पर पड़ता है अर्थात जनसंख्या का बड़ा हिस्सा अपनी उत्पादकता का पूर्ण प्रयोग नहीं कर पायेगा। प्रधानमंत्री मोदी के स्वच्छ भारत अभियान से ग्रामीण क्षेत्रों में साफ सफाई का स्तर सुधर रहा है तथा अक्टूबर 2014 के 39 प्रतिशत की तुलना में अब यह 84 प्रतिशत तक पहुंच गया है।

देश में भी साफ सफाई उद्योग 3,200 करोड़ डॉलर का है जो 2021 तक दुगना हो जायेगा जिससे रोजगार के भी नये नये अवसर सामने आ सकते है। महिलाओं को 168 करोड़ काम के घंटे की बचत होने का अनुमान लगाया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में शौच से बनी खाद से प्याज की बेहतर उपज होने में मदद मिली है क्योंकि यह खाद रासायनिक व अन्य जैविक खाद की तुलना में बेहतर समझी जा रही है। सरकार ने स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत दो पिट वाले शौचालयों को प्रोत्साहित किया है जो स्वत: खाद तैयारी करने में मदद करते है। इससे खेती में सुधार हो सकेगा तथा एक नये उद्योग का जन्म भी हो सकेगा। रासायनिक खाद के प्रयेाग में भी बचत हो सकेगी।

भारत सरकार के इस सफाई अभियान से स्वास्थ्य के प्रति एक सकारात्मक वातावरण बनता जा रहा है जिसका सीधा सीधा प्रभाव देश की उत्पादकता पर पडेगा। इस मिशन के अंतर्गत अब सफाई राष्ट्रीय विकास के मुद्दों में प्रमुखता ग्रहण करती जा रही है। इससे आर्थिक उन्नति में सहयोग प्राप्त होता है। बैंक, खाद व रोजगार का विकास भी हो रहा है। इस क्षेत्र में निवेश के रास्ते भी खुलते जा रहे है। 'पहला सुख निरोगी काया व दूसरा सुख घर में माया' वाली कहावत चरितार्थ होती जा रही है कि साफ सफाई एक उद्योग बनता जा रहा है व लोगों के रोजगार के अवसर खुल रहे है व सफाई रखने से लोग स्वस्थ रहेंगे तो देश की उत्पादकता भी अधिक हो सकेगी।

भारत जैसी वर्ण व्यवस्था के सामाजिक ढंाचे में उन लोगों के दृष्टिकोएा को बदलने की भी आवश्यकता है जो मानव मल के निस्तारण को अभी भी निचली जातियों से जोड़ कर देखते हैं। घरों में बनने वाले शौचालय सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती हैं क्योंकि जलापूर्ति के साथ साथ तरल व ठोस कचरे के प्रबंधन की सुविधा तैयार करना एक जटिल कार्य है जिसके लिए सरकार को अधिक प्रभावी कदम उठाने होंगे क्योंकि भारत में अधिकांश लोग सफाई से संबंधित अपने अपने सामाजिक उत्तरदायित्वों को न तो समझ पाते है और न ही निभा पाते हैं। तैयार हुए शौचालय काम करते रहें, यह भी एक बडी चुनौती है क्योंकि लोग उनका ठीक से रख रखाव नहीं करते तथा शौचालयों में निरन्तर जलापूर्ति की व्यवस्था भी नहीं बनी रहती है।

-डा. सूर्य प्रकाश अग्रवाल

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