चेतावनी: सरकारी तंत्र की लापरवाही से हुए हादसों का जिम्मेदार कौन?

चेतावनी: सरकारी तंत्र की लापरवाही से हुए हादसों का जिम्मेदार कौन?

हादसा अगर दैविक हो तो कुछ हद तक कह सकते हैं कि ईश्वरीय प्रकोप से बचना मुश्किल होता है और दुर्भाग्यवश ऐसे हादसे होते हैं लेकिन अगर ऐसे ही हादसे लापरवाही से हों तो बस एक प्रश्न हृदय में घुमडऩे लगता है कि हादसों में हुए इन हत्याओं का जिम्मेदार आखिर कौन है? हत्या मैं इसलिए कह रहा हूँ कि जब मालूम हो कि किसी दुर्घटना की संभावना है। इसके बावजूद मुकम्मल कार्रवाई समय पर न की जाएँ, न ही आम लोग को उस खतरे से आगाह किया जाए, बस चुपके चुपके सरकारी तंत्र अपनी कमाई का जुगाड़ तलाशने लगे और इसी बीच घटित हादसे में आम लोग बेमौत मारे जाएं, ऐसी स्थिति में इसे दुर्घटना कहना बेमानी होगी। इसे हत्या का नाम देना ही उचित होगा।

31 मार्च 2016 को जब कोलकाता के बड़ा बजार के पोस्ता इलाके में एक निर्माणाधीन फ्लाईओवर का एक हिस्सा गिर गया था। सरकारी आंकड़ों की मानें तो करीब 26 लोग मारे गये थे। यह जख्म भरा भी नहीं था कि हाल ही में 4 सितम्बर, 2018 को तकरीबन 50 साल पुराना 40 मीटर लम्बा कोलकाता माझेरहाट ब्रिज, जो कोलकाता के मुख्य हिस्से को दक्षिण उपनगरीय इलाके से जोड़ता है, उसका एक हिस्सा टूट कर गिर गया । सरकारी आंकड़ों की माने तो एक से दो लोग ही मृत्यु को प्राप्त हुए हैं और तकरीबन 25 से अधिक लोग घायल है लेकिन दुर्घटना स्थल की तस्वीर देख ऐसा बिलकुल नहीं प्रतीत होता कि मरने वाले और घायलों की संख्या इतनी कम होगी जबकि इस हादसे में एक मिनी बस, कुछ कारें और बाइक सवार चपेट में आ गए और यह आंकड़ा और भी संदेहास्पद लगता है जबकि पुल के मरम्मत में लगे कुछ श्रमिक अस्थायी निवास बनाकर पुल के ही नीचे रह रहे थे।

ऐसा ही एक हादसा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी में हुआ जब 16 मई 2018 को वाराणसी कैंट से लहरतारा के बीच बन रहा निर्माणाधीन पुल का एक हिस्सा तब गिरा जब पुल के नीचे ट्रैफिक जाम था।

हर बार हादसे के बाद सरकारी कवायद जस की तस, जांच आयोग बैठाना, मुआवजे की घोषणा और निर्माण, मरम्मत और रखरखाव करने वाले पर त्वरित कार्रवाई का आश्वासन, जिस क्षेत्र में घटना घटी हो, उसके विपक्षी नेताओं द्वारा सरकार से इस्तीफे की मांग, कुछ राजनीतिक बयानबाजी और विरोध लेकिन क्या ऐसे हादसों में मृत्यु को प्राप्त निर्दोष लोगों की मौत हमारे सरकारी तंत्र को विचलित करती हैं क्या ? क्या वे अपनी गलती से कुछ सीखते हैं या फिर सीखने की कोशिश करते हैं क्या ? लापरवाही न दुहराई जाये, इसके लिए सरकार आवश्यक कदम उठाती है क्या ? क्या सचमुच विरोध करने वाले आम जन का हित चाहते हैं या निशाना सिर्फ सियासत तो नहीं है ?

अगर इन हादसों का अलग अलग विश्लेषण करें तो कोलकाता में बड़ा बाजार के पोस्ता इलाके में जो निर्माणाधीन फ्लाई ओवर गिरा, उसकी जांच एजेंसी की रिपोर्ट कहती है कि हादसे का मुख्य कारण दोषपूर्ण डिजाइन और निर्माण में इस्तेमाल किए गए माल की खराब गुणवत्ता थी।

यह हादसा और जांच की रिपोर्ट अपने आप ही सरकार और सरकारी तंत्र पर कई प्रश्न चिन्ह खड़ेे करती है। क्या हमारी सरकार योग्यता की पहचान में असक्षम है? कहीं टेंडर आवंटन में भ्रष्टाचार तो नहीं हो रहा ? पुल निर्माण जैसे संवेदनशील कार्य जिसकी गुणवत्ता सौ फीसदी सटीक होनी चाहिए, उसके निर्माण में खराब माल का इस्तेमाल और हद की इंतहा कि सरकार को कानों कान खबर नहीं कैसे ? सरकार क्यों किसी पुल की गुणवत्ता की जांच पुल के गिरने के बाद करवाती है ? और पहले जब सुरक्षा प्रमाणपत्र जारी किए जाते हैं तो उन्हें खामियों का पता क्यों नहीं चलता ? खराब माल के इस्तेमाल के बावजूद निर्माण से जुड़े सरकारी तंत्र को आखिर भुगतान बिना जांचे परखे कैसे हो जाता है ?

अगर हम वाराणसी में हुए हादसे के कारणों का अवलोकन करे तो पता चलता है कि वहां भी जो हादसा हुआ, वो भी सरकारी तंत्र की लापरवाही के कारण ही हुआ। पुल निर्माण नियम के तहत जब कोई पुल का निर्माण हो रहा हो, वैसी हालत में उस रास्ते से वाहनों की आवाजाही रोक दी जाती है और यदि ऐसा करना संभव न हो तो निर्माण का कार्य सिर्फ रात को ही किया जा सकता है। सुरक्षा व्यवस्था के तहत पुल निर्माण में लगी कंपनी को यह स्थानीय ट्रैफिक पुलिस को लिखित तौर पर देना होता है कि वह कितने बजे से कितने बजे तक निर्माण कार्य जारी रखेगी। ऐसी स्थिति में जरूरत पडऩे पर ट्रैफिक पुलिस वाहनों का मार्ग बदल देती है लेकिन वाराणसी में जो पुल हादसा का शिकार हुआ, उसके निर्माण में लगी कंपनी ब्रिज कंस्ट्रक्शन लिमिटेड ने ऐसा नहीं किया जिस कारण यह हादसा शाम साढ़े पांच बजे तब हुआ जब पुल के नीचे जाम लगा था। यहीं कारण रहा कि इसके चपेट में काफी लोग आ गए। अब फिर प्रश्न वही कि नियम का पालन क्यों नहीं हो रहा था ? आखिर लापरवाही बरती ही क्यों गयी ? और हादसे के बाद जांच में जो अंतरिम रिपोर्ट आई, वो भी बेहद चौंकाने वाली है।

फ्लाई ओवर का डिजाइन या ड्राइंग सक्षम विभागीय अधिकारी द्वारा अनुमोदित नहीं था। कॉलम के बीच में ढाली गयी बीमों को क्रॉस बीमों से टाई नहीं किया गया। जांच के दरम्यान बीमों की गुणवत्ता का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध ही नहीं था। सीमेंट, बालू, गिट्टी के मिश्रण के अनुपात का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था। ढाली गई बीमों की गुणवत्ता की जांच अधिकारियों द्वारा की ही नहीं जा रही थी। किसी बड़े प्रोजेक्ट में खासकर जब यह देश के प्रधान का संसदीय क्षेत्र हो, ऐसी बुनियादी लापरवाही भ्रष्टाचार की ओर ही इशारा करते हैं और यही कारण रहा कि इस हादसे में उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम के प्रबंध निदेशक तथा 5 अन्य अधिकारियों को इस हादसे का दोषी करार दिया गया।

आखिरी में जो कोलकाता के माझेरहाट में पुल गिरने का जो ताजा हादसा घटित हुआ है। राज्य सरकार ने आनन फानन में मृत्यु को प्राप्त तथा घायल लोगों के लिए मुआवजे का एलान कर दिया है। जांच के आदेश दे दिया गया है और यह आश्वासन भी दिया जा रहा कि दोषी बख्शे नहीं जाएंगे। सियासी बयानबाजी के बीच इस्तीफा मांगने वाले नेतागण भी चर्चा में आ गए हैं लेकिन सवाल उठता है कि जब बङा बाजार पोस्ता इलाके के पुल के गिरने के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जब सभी पुलों और फ्लाई ओवर के जांच का आदेश दिया था तो उसका पालन करने में कोताही कैसे बरती गई ? लोक निर्माण विभाग ने कितने फ्लाईओवर और पुल की जांच की ? जब पुल और फ्लाई ओवर के रखरखाव की जिम्मेदारी लोक निर्माण की है तो क्या लोक निर्माण विभाग अपनी जिम्मेदारी ठीक से निभा रहा है या नहीं, इसकी कभी कोई जांच हुई ? और सबसे आश्चर्यजनक यह कि कैसे हादसे से सिर्फ दो हफ्ते पहले लोक निर्माण विभाग के इंजीनियरों ने इस पुल की जांच के बाद उसे सुरक्षित होने का प्रमाणपत्र दे दिया ?

सवाल तो कई हैं लेकिन सबसे बड़ा सवाल सरकारी तंत्र की लापरवाही और भ्रष्टाचार के कारण हुए इन हादसों का जिम्मेदार कौन है ? सवाल सिर्फ दोषियों की सजा का नहीं है। सवाल है इस प्रकार के हादसे में मौत के शिकार हुए उन लोगों का भी जिसकी आमदनी बंद हो जाने से घर परिवार सड़क पर आ जाता है। किसी के बच्चों की पढ़ाई बाधित हो जाती है तो किसी की बिटिया की शादी बाधित हो जाती है। कई बार तो परिवार के एक इंसान के जाने से खाने के लाले पड़ जाते हैं और पूरा घर परिवार बिखर जाता है। सरकार द्वारा दिये मुआवजे उनकी समस्याओं का हल नहीं हैं। सरकार चाहे कहीं की भी हो, ऐसे हादसे की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए ऐसे हादसे की चपेट में आए लोगों के परिवार की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। सिर्फ मुआवजे की घोषणा उन्हें मुँह चिढ़ाने और विपक्ष के हमलों से बचने की कवायद के सिवा कुछ भी नहीं है।

- अमित कुमार अम्बष्ट 'आमिली'

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