राष्ट्ररंग: घटती आय के कारण गांवों से हो रहा है पलायन

राष्ट्ररंग: घटती आय के कारण गांवों से हो रहा है पलायन

एक तरफ केंद्र सरकार की यह सुखद घोषणा सबको याद है कि वह अगले पांच वर्षों में देश के किसानों की आय दोगुना तक बढ़ाने को लेकर प्रतिबद्ध है और इसके तहत मुख्य फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य को लागत से डेढ़ गुना किया जाएगा। दूसरी तरफ कुछ दिन पहले नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट (नाबार्ड) ने अखिल भारतीय ग्रामीण समावेशी वित्तीय सर्वेक्षण 2016-17 की रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि कृषि में संलग्न परिवारों की आमदनी में कृषि और सहायक गतिविधियों का हिस्सा महज 43 फीसदी ही रहता है जबकि शेष 57 फीसदी आय मजदूरी, नौकरी व उद्यम इत्यादि से प्राप्त होती है।

करीब 12 वर्ष पूर्व गठित स्वामीनाथन आयोग ने भारत सरकार से कहा था कि किसानों की मेहनत व उनके जोखिम को देखते हुए किसान की लागत में 50 प्रतिशत जोड़कर समर्थन मूल्यों की घोषणा की जानी चाहिए। आयोग को यह अपेक्षा थी कि इस प्रकार के समर्थन मूल्यों से सीमांत तथा लघु किसानों को भी लाभ होगा। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या समर्थन मूल्य बढऩे से सभी किसानों को लाभ होगा?

स्वामीनाथन आयोग की मानें तो लगभग दो-तिहाई किसानों के पास दो हेक्टेयर से भी कम कृषि भूमि थी। इतनी छोटी जोतों के चलते इन किसानों के लिए खेती करना कतई लाभप्रद नहीं हो सकता। 2011-12 की कृषि गणना के अनुसार जहां दो हेक्टेयर से कम भूमि वाले किसानों की संख्या सभी किसानों में 80 प्रतिशत है, वहीं इन लघु व सीमांत किसानों के पास कुल भूमि क्षेत्र का 10 प्रतिशत भू-भाग ही है। इसके विपरीत मध्यम वर्ग के किसानों (2-4 हेक्टेयर) की संख्या कुल किसानों में करीब 15 प्रतिशत है जबकि कुल कृषि क्षेत्र में उनकी कृषि भूमि 30 प्रतिशत है।

इसी तरह 17 हेक्टेयर से अधिक भूमि वाले किसानों, जिन्हें बड़ा किसान माना जाता है, की संख्या कुल किसानों में पांच प्रतिशत है। कुल कृषि भूमि में इनकी भूमि 60 प्रतिशत है। यह कहना प्रासंगिक होगा कि देश में कृषि भूमि का वितरण अत्यंत दोषपूर्ण है तथा बड़े किसानों के पास कृषि भूमि का बड़ा हिस्सा है। ऐसे परिवार जो कृषि में संलग्न नहीं हैं, उन्हें औसतन कुल आमदनी का 54.2 प्रतिशत मजदूरी से, 32 प्रतिशत सरकारी और निजी नौकरियों से और मात्र 11.7 प्रतिशत ही उद्यम से प्राप्त होता है। यदि कृषि और गैर कृषि में संलग्न परिवारों को मिला दिया जाए तो ग्रामीण क्षेत्रों में मात्र 23 प्रतिशत ही आमदनी कृषि से हो रही है और शेष 77 प्रतिशत मजदूरी, सरकारी एवं निजी नौकरियों और उद्यम से प्राप्त होता है।

इन आंकड़ों से जो चिंताजनक तस्वीर उभर कर आई है वह यह है कि ग्रामीण इलाकों में आमदनी के लिहाज से खेती-बाड़ी हाशिए पर आ गई है। हालांकि किन्हीं दो स्रोतों से आंकड़ों की तुलना करना शोध की दृष्टि से औचित्यपूर्ण नहीं होता, फिर भी गांवों और शहरों की तुलना के लिए मात्र यही एक माध्यम बचता है क्योंकि केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) गांवों और शहरों की आमदनी के आंकड़ों का नियमित प्रकाशन नहीं करता।

देखा गया है कि छोटे व सीमांत किसान केवल जीवन निर्वाह के लिए ही कृषि में संलग्न हैं। यह वर्ग उन्नत बीजों तथा सिंचाई के साधनों का सीमित प्रयोग ही कर पाता है। इस स्थिति में इनकी जमीनों पर अनाज उत्पादकता कम रहती है। वाणिज्यिक फसलों, मसालों, फलों, तिलहनों व दलहनों का चयन भी ये इसलिए नहीं कर पाते क्योंकि परिवार की उदरपूर्ति के लिए इनकी प्राथमिकता अनाज पैदा करने में होती है। जोत बहुत छोटी होने पर सीमांत तथा छोटे किसानों के पास बाजार में लाने योग्य अतिरिक्त अनाज भी बहुत कम होता है।

नाबार्ड के सर्वेक्षण 2016-17 के मुताबिक 50 हजार से कम आबादी के गांव-शहरों के कुल 21.17 करोड़ परिवार में सिर्फ 10.07 करोड़ ही कृषि आधारित परिवार हैं। ये वे हैं जिनके परिवार के कम से कम एक सदस्य की सालाना आमदनी पांच हजार रूपए से ज्यादा है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार देश में 68.8 प्रतिशत आबादी गांवों में बसती है। यदि वर्ष 2016-17 की परिकल्पित जनसंख्या को लिया जाए तो ग्रामीण जनसंख्या 90.30 करोड़ मानी जाएगी। यदि गांवों में 21.17 करोड़ परिवार है तो औसतन परिवार का आकार 4.27 सदस्यों का है।

एक ओर तो फसलों के प्रारूप (अनाज आधारित) तथा छोटी जोत के कारण सीमांत व छोटे किसान बाजार में कृषि उपज के मूल्य बढऩे के बावजूद लाभ से वंचित रहते हैं, वहीं दूसरी ओर परिवार के भरण-पोषण के लिए बाजार से अनाज खरीदने को भी विवश रहते हैं। समर्थन मूल्य बढऩे के पश्चात कृषि जिंसों की ढुलाई, परिवहन तथा अन्य खर्च जोडऩे पर बाजार में खाद्यान्नों के खुदरा दाम बढ़ जाते हैं। समर्थन मूल्य बढऩे से सार्वजनिक वितरण प्रणाली से उपलब्ध खाद्यान्न भी महंगा होना संभावित है जब तक कि सरकारी अनुदान में वृद्धि न हो।

कुछ वर्ष पहले तक शहरी प्रति व्यक्ति आय ग्रामीण प्रति व्यक्ति आय से 9 गुणा ज्यादा थी। 2016-17 तक आते-आते यह अंतर 12.3 गुणा तक पहुंच गया है। यह शहर और गांव के बीच बढ़ती खाई चिंता का विषय है और नीति-निर्माताओं के लिए एक चुनौती भी। यह गांवों से शहरों की ओर पलायन का कारण भी है और गांवों में बढ़ती गरीबी और बेरोजगारी का संकेत भी। स्वामीनाथन आयोग ने इस ओर ध्यान खींचा था कि सरकार की ओर से कृषि पर किया जाने वाला व्यय लगातार कम हो रहा है। दूसरे, कृषि जोतों के अपखंडन तथा उप विभाजन की गहन समस्या के प्रति सरकार संवेदनशील नहीं है।

हाल ही में एक अनुमान यह लगाया गया कि देश में एक सीमांत किसान की औसत आय 14,784 रूपए मात्र है और वह इस आय को लेकर परिवार की उदरपूर्ति नहीं कर सकता। ऐसे किसानों के पास पूरक आय का कोई स्रोत भी नहीं है। यही वजह है कि समर्थन मूल्यों के बढऩे के बावजूद इस वर्ग के किसानों को कोई लाभ नहीं मिल पाता है।

-नरेंद्र देवांगन

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