विश्लेषण: कश्मीर में हर सुबह एक नई चुनौती?

विश्लेषण: कश्मीर में हर सुबह एक नई चुनौती?

कश्मीर वादी में आतंक की आग कब बंद होगी, कहना मुश्किल है। हर सुबह आतंक एक नयी सोच के साथ पैदा हो रहा है। अभी तक पत्थरबाज हमारी सेना के लिए सबसे बड़ी चुनौती बने हैं लेकिन अब एक नई साजिश सामने आयी है जिसकी वजह से घाटी में सुरक्षाबलों की नींद उड़ गयी है। आतंकवादियों ने अब कश्मीर पुलिस के साथ अफसरों के परिजनों को अगवा कर सुरक्षाबलों के सामने नयी चुनौती रखी है। आतंकी फंडिंग के आरोप में राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी एनआईए ने हिजबुल मुजाहिदीन के प्रमुख सैयद सलाउद्दीन के बेटे शकील अहमद को उठाया है जिसके बाद आतंकियों ने अब सुरक्षा एजेंसियों की नीति पर चलते हुए पलटवार किया है। मीडिया में आतंकियों ने एक वीडियो जारी किया है जिसमें कहा गया है कि अगर सुरक्षा एजेंसियां आतंकियों के परिजनों को उठाएंगे तो उसका जवाब उन्हीं की भाषा में दिया जाएगा।

इस नई चुनौती से सुरक्षाबलों की चिंता बढ़ गयी है। दो दिन के अंदर 1० लोगों का अपहरण किया गया। हालांकि बाद में सभी को सुरक्षित छोड़ दिया गया। जिन लोगों का अपहरण किया गया, वे सभी कश्मीर की सुरक्षा में लगे स्थानीय अफसरों और पुलिसकर्मियों के परिजन हैं। ये अपहरण शोपियां, अनंतनाग, कुलगाम, अवंतिपोरा से हुए हैं लेकिन आतंक की यह नयी सोच बेहद विस्फोटक है। आतंकवादियों की यह साजिश निश्चित रुप से मानवता के खिलाफ एक अमानवीय कृत्य है। इसकी जितनी भी निंदा की जाए वह कम होगी।

कश्मीर घाटी में सुरक्षाबलों की कड़ी कार्रवाई की वजह से आतंक की नींव दरक चुकी है। सुरक्षाबलों ने एक-एक कर टाप आतंकवादियों का सफाया कर दिया है जिसकी वजह से आतंकी घबरा गए हैं। आपरेशन आल आउट के तहत अब तक टाप 140 से अधिक आतंक के आकाओं का सेना सफाया कर चुकी है। आतंकी सेना से सीधे मुकाबले की स्थिति में नहीं हैं, इसलिए वे नई साजिशें रच रहे हैं। अभी तक जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा में तैनात स्थानीय पुलिस के जवानों और आम नागरिकों का अपहरण कर हत्या की साजिश रची। बावजूद सेना के मनोबल और पुलिस के परिजनों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा तो अब इस नीति को अपडेट कर सिविल पुलिस के परिजनों को अगवा करने का गंदा खेल रचा।

आतंकियों की मंशा साफ है कि वह सिविल पुलिस और अफसरों के मनोबल को इसके जरिए गिराने में कामयाब होंगे क्योंकि सेना जिस तरह से आतंकियों को सफाया कर रही है, उसमें सिविल पुलिस की बड़ी भूमिका है। दोनों की संयुक्त रणनीति और कुशल नेतृत्व में आतंकी साजिश को काफी हद तक विफल कर दिया गया है क्योंकि सुरक्षाबलों के परिजनों की अगर अगवा करने के बाद हत्या कर दी जाती है तो अफसरों के साथ पुलिस का मनोबल गिरेगा। कश्मीर में सेना के खिलाफ उबाल पैदा होगा जिसके बाद आतंकी आम कश्मीरी लोगों को आतंक के समर्थन में लामबंद करने में कामयाब हो सकते हैं। आतंकियों की यह मनोवैज्ञानिक दवाब वाली रणनीति है।

सुरक्षाबलों की सबसे बड़ी चुनौती पत्थरबाज के साथ आम कश्मीरी हैं। आतंकवादियों की तरफ से स्थानीय सुरक्षाबलों के जवानों के परिजनों के साथ नागरिकों को निशाना बनाए जाने के बाद भी कश्मीर का आम नागरिक आतंक के खिलाफ हमारी सेना के साथ नहीं खड़ा मिलता क्योंकि आम कश्मीरी डरा-सहमा है। दूसरी सबसे बड़ी चुनौती राजनैतिक दलों की अलगाववादी सोच है। जमीनी सच्चाई तो यही है कि अलगाववादियों से अधिक जिम्मेदार वहां की राजनीति है। जब लोग सत्ता में रहते हैं तो दूसरे राग अलापते हैं लेकिन सत्ता के बाहर आते ही आतंक के हिमायती बन जाते हैं।

हमारी सेना वहां खुल कर अपनी रणनीति को अंजाम नहीं दे पा रही है। वह अपनी रणनीति के तहत आगे बढ़ रही है। मानवाधिकार के नाम पर जहां राजनैतिक दल सेना को बदनाम करते हैं, वहीं पत्थरबाजों को आगे किया जा रहा है। कश्मीर का एक भी राजनीतिक दल सेना के साथ नहीं खड़ा है। सेना की अच्छी कार्रवाई की प्रशंसा नहीं की जाती। उल्टे हमारे जवानों को कटघरे में खड़ा किया जाता है। वहां की लोकल सरकारें मुकदमा लादती हैं जिसकी वजह से हमारे जाबांज जवानों का मनोबल टूटता है।

कश्मीर घाटी में धारा 36-ए और 370 पर कश्मीरियों को भड़काया जा रहा है। सोशल मीडिया पर झूठी खबरें फैला कर अफवाहें फैलायी जा रही हैं। कश्मीर को अशांत किया जा रहा है। सुप्रीमकोर्ट से कानून-व्यवस्था का हवाला देकर 35-ए की सुनवाई बार-बार टालने की बात कही जाती है। अहम सवाल है कश्मीर के राजनेता और वहां के नागरिक मुख्यधारा की बात क्यों नहीं करते। वे कश्मीर की स्वायत्तता की हिमायत क्यों करते हैं। अलगाववाद को हवा क्यों दी जाती है। पाकिस्तान के साथ जुगलबंदी की वजह क्या है। बुरहानवानी जैसे आतंकी को वहां का युवा आदर्श क्यों मानता है जबकि औरंगजेब जैसे राष्ट्रभक्त की शहादत पर आंसू की एक बूंद नहीं टपकती। अफजल गुरु को आदर्श बताया जाता है। अलगाववादी कश्मीरियों को क्यों भड़काते हैं? हमारी सेना पर पत्थरबाजी क्यों की जाती है? इस तरह के अनगिन ऐसे सवाल हैं जिसका जवाब अलगाववादियों, राजनैतिकदलों, पत्थरबाजों के साथ आम कश्मीरियों के पास नहीं हैं।

जिस दिन आतंक और अलगाववाद के खिलाफ पूरा कश्मीर एक साथ सुरक्षाबलों के साथ खड़ा हो जाएगा, आतंकियों को संरक्षण देना बंद कर दिया जाएगा, उसी दिन में आतंकी कमर टूट जाएगी। इसके लिए आतंकी फंडिंग की रीढ़ तोडऩे के साथ अलगाववादियों को कश्मीर से हटाना होगा।

अगर राजनेता आतंक की हिमायत करते हैं तो उनके साथ भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत निपटने की आवश्यकता है। कश्मीर पर जरा सी ढील मुश्किल में डाल सकती है लेकिन जब तक हम इस तरह के हालात पैदा नहीं करते, हम आतंकवाद जैसी चुनौती का सामना नहीं कर सकते।

-प्रभुनाथ शुक्ल

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