राजनीति: बंगाल की दुर्दशा के लिए दोषी कौन?

राजनीति: बंगाल की दुर्दशा के लिए दोषी कौन?

26 जनवरी 1950 को अस्तित्व में आया पश्चिम बंगाल राज्य स्वतंत्रता के 71 वर्ष पश्चात आज भी अपनी दुर्दशा के लिए रो रहा है जबकि उस समय एवं उसके वर्षों पश्चात तक देश में अस्तित्व में आने वाले समस्त राज्य विकास, उन्नति एवं प्रगति के मामले में नित नई ऊंचाइयां तय कर रहे हैं। आखिर ऐसा क्या, क्यों एवं कैसे हुआ जो पश्चिम बंगाल आज भी दुर्दशाग्रस्त है और उसके लिए दोषी एवं जिम्मेदार कौन हैं?

पश्चिम बंगाल में गत 68 वर्षों से वहां की जनता के द्वारा चुनी गई सरकार राज कर रही है। इसमें से 1950 से 1977 के मध्य 27 वर्षों तक कांग्रेस ने एकछत्र एवं अकेले राज किया। तब केंद्र एवं उस राज्य में कांग्रेस की सरकार थी। उसके पश्चात 1977से 2011 तक अर्थात 34 वर्षों तक इस राज्य में वामपंथियों ने राज किया ।

20 मई 2011 से वर्तमान समय तक इस राज्य में अकेली तृणमूल कांग्रेस पार्टी राज कर रही है और इस पार्टी की सुप्रीमो 63 वर्षीय ममता बनर्जी मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल रही हैं। पार्टी एवं सरकार में सब कुछ एवं सर्वेसर्वा ममता बनर्जी ही हैं, लिहाजा राज्य के अच्छे बुरे सब के लिए फिलहाल वही जवाब देह हैं। पश्चिम बंगाल में 34 वर्षों तक वामपंथियों ने राज किया, इसीलिए राज्य की दुर्दशा के लिए उन्हें ही दोषी एवं जिम्मेदार ठहराया जा सकता है किंतु इसके बाद भी राज्य में शासन करने वाली कुल जमा 3 पार्टियों के राजकाज की समीक्षा करना लाजिमी है।

राज्य गठन के पश्चात 26 जनवरी 1950 से 1977 के दरमियान पश्चिम बंगाल में कांग्रेस पार्टी ने शासन किया तब केंद्र एवं राज्य में कांग्रेस पार्टी की ही सरकार थी। इस राज्य के प्रारंभिक 27 वर्षों तक तत्कालीन सरकार को आवश्यक मूलभूत सुविधा संसाधन जुटाने के लिए मेहनत करनी पड़ी। इस अवधि में राज्य में कुछ उद्योग- धंधे, कल-कारखानों की नींव पड़ी।

1977 से वामपंथियों ने जो 34 वर्षों तक शासन किया, इस बीच प्रदेश के अधिकतर कल-कारखानों एवं उद्योग धंधों की कमर टूटती गई। यह सब लगातार श्रमिक नेताओं के आंदोलन एवं हड़ताल के चलते ठप्प से होते गए, घाटे में डूबते चले गए जबकि राज्य की वामपंथी सरकार ने आय बढ़ाने की बजाय केंद्र से कर्ज लेकर तब सरकार चलाने को महत्त्व दिया।

वामपंथी सरकारों के कारण राज्य की चौतरफा दुर्गति होती चली गई। उद्योग धंधे कल कारखाने सब तबाह होते गए जो खंडहर एवं कबाड़ मशीनों के रूप में आज भी विद्यमान हैं। वाम सरकारों की नीति उद्योग धंधे कल-कारखानों को चलाने के विपरीत श्रमिकों की वेतन सुविधा बढ़ाने तक सीमित रही जबकि बंद उद्योग-धंधों को चालू करने व कल कारखानों को संचालित करने हेतु उन्होंने कुछ प्रयास नहीं किया।

राज्य में घाटे में डूबते एवं बंद होते उद्योग-धंधों एवं कल कारखानों के कारण नए उद्योग डालने की किसी ने हिम्मत नहीं की। तब बुद्धदेव भट्टाचार्य ने उदारीकरण की नई नीति को महत्त्व दिया जिससे टाटा अपने नैनो कार उत्पादन के लिए निवेश कर कारखाना बनाने आगे बढ़ा किंतु उसके खिलाफ अभियान चलाकर तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने उसे भी बंद करवा दिया।

ममता के इसी अभियान के बाद सन 2011 में वामपंथी सरकार का पतन हुआ। ममता ने मुख्यमंत्री की कुर्सी में बैठने के बाद नए उद्योगों के लिए निवेश कराने का प्रयास किया किंतु किसी को उन पर भरोसा नहीं हुआ। जो निवेश कर नए उद्योग डालने वाले थे, उन्होंने भी अपने कदम वापस ले लिए। आज वाम सरकार के बाद ममता सरकार के कारण ही कोई उद्योगपति निवेश के लिए कदम नहीं बढ़ा रहा है।

राज्य में उनके लिए भरोसेमंद वातावरण नहीं है इसीलिए राज्य इस मामले में पिछड़ा और राज्य में राज करने वाली वामपंथी एवं ममता सरकार के कारण पश्चिम बंगाल बर्बाद हो गया। सरकारें जब सही काम करेंगी, तभी राज्य का उद्धार होगा। निवेशक आगे आएंगे, उद्योग डालेंगे, तब लोगों को रोजगार मिलेगा और विकास होगा किंतु ऐसा हो नहीं पा रहा है। किसी भी राज्य को दुर्दशा से उबारने में सत्तारूढ़ पार्टी एवं उसके मुख्यमंत्री की भूमिका सबसे मुख्य एवं महत्त्वपूर्ण होती है। राज्य के नाम पश्चिम बंगाल को बदलने मात्र से उसकी तस्वीर नहीं बदल जाएगी।

- डा. सीतेश कुमार द्विवेदी

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