राष्ट्ररंग: विधेयक बन जाने भर से घूसखोरी से मुक्ति नहीं मिलेगी

राष्ट्ररंग: विधेयक बन जाने भर से घूसखोरी से मुक्ति नहीं मिलेगी

कोई घूस देकर काम करा लेता है तो कोई नियम-कानून की दुहाई देता फिरता है और बेचारा परेशान रहता है। आलम यह है कि घूस देना और लेना स्थायी भाव सरीखा हो गया है। हम सबको बिलकुल भी गैर जायज-असहज नहीं लगती यह बुराई। इसी मानसिकता से उबरना है। बुरा लगना चाहिए।

हाल ही में भ्रष्टाचार निवारण संशोधन विधेयक-2018 में घूस लेने के साथ घूस देने को भी अपराध बनाया गया है हालांकि कानून बना देना ही काफी नहीं है। लोगों की चेतना जब तक जागृत नहीं होगी, तब तक घूस जैसी बुराई से पार नहीं पाया जा सकता है। यह ऐसी दीमक है जो हमारे देश को कई तरह से चट कर रही है। तभी तो अक्सर खबरें पढऩे को मिलती हैं कि चतुर्थ श्रेणी के सरकारी कर्मचारी के यहां मिला खजाना। इस खजाने में आम जनता के खून-पसीने की पाई-पाई होती है जिसे अपना काम कराने के एवज में घूस के रूप में उसने वसूला होता है।

अंतर्राष्ट्रीय गैर सरकारी संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की 2017 की रिपोर्ट के मुताबिक एशिया-प्रशांत क्षेत्र के 16 देशों में से रिश्वत देने के मामले में भारत सबसे आगे है। यहां घूसखोरी की दर 69 फीसद है यानी दस में से लगभग सात भारतीय शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी आम सुविधाओं के लिए घूस देते हैं। इस सर्वेक्षण के लिए ट्रांसपेरेंसी इंडेक्स संस्था ने जुलाई, 2015 से जनवरी, 2017 के बीच 16 देशों के 21,861 लोगों से बात की। भारत में गरीब तबके के 73 फीसदी लोग रिश्वत देते हैं जबकि अमीर तबके के 55 फीसद लोगों को घूस देकर काम करवाना पड़ता है।

रिपोर्ट के मुताबिक पुलिसवाले सबसे ज्यादा घूस लेते हैं। पुलिस के संपर्क में आने वाले एक तिहाई लोगों ने पुलिस को रिश्वत दी। रिश्वत देने के मामले में महिलाएं पीछे नहीं हैं। महिलाएं अपने पुरूष समकक्षों के बराबर ही घूस देती हैं। भारत में सरकारी नौकरियों में घूस लेने-देने को बेहद सामान्य माना जाता है। एक पढ़ा-लिखा सरकारी अफसर जब नियमों को तोड़-मरोड़कर अनपढ़ नेता को धन कमाने में मदद करता है, तो उसके मन में ख्याल आता है कि वह खुद धन क्यों नहीं कमा रहा। यही वजह है कि रिश्वत का कीड़ा तंत्र में अंदर तक पैठ गया है।

घूस लेना या देना ऐसा भ्रष्टाचार है जो हमारे संस्थागत मूल्यों को तो खोखला कर ही रहा है, देश की अर्थव्यवस्था को भी भारी चपत लगा रहा है। घूस देने वाला व्यक्ति सीधे तौर पर इससे प्रभावित होता है तो जिन लोगों का घूस देने या लेने की प्रक्रिया से दूर-दूर का नाता नहीं है, वे भी इससे अछूते नहीं हैं। वे सरकारी दफ्तरों की कार्य कुशलता और भेदभाव का शिकार होते हैं। तमाम क्षेत्रों पर इसके नकारात्मक असर होते हैं।

बुनियादी सुविधाओं में खराब गुणवत्ता के लिए कई बार घूसखोरी जिम्मेदार होती है। अक्सर हम सुनते हैं कि फलां पुल ढह गया, फलां इमारत जमींदोज हो गई। दरअसल ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए इसके ठेकेदारों ने गुणवत्ता से समझौता किया क्योंकि उनको इसे तैयार करने के एवज में भारी-भरकम कमीशन चुकाना पड़ा था। भरपाई के लिए उन्होंने ये तरीका अख्तियार कर लिया। अब खराब गुणवत्ता के पुल और घर या अन्य संरचनाएं जब भरभराकर ढहती हैं तो आम लोगों के जान-माल का नुकसान होता है। घूस जैसा भ्रष्टाचार संगठित अपराध को बढ़ावा देता है। आतंकवाद और अन्य खतरे बढ़ते हैं।

हम में से अधिकांश यह मानकर बैठे हैं कि रिश्वत जैसे भ्रष्टाचार को टाला नहीं जा सकता है। यह हमारे जीवन में रोजमर्रा की बात बन चुका है। कुछ लोग इसे तर्कों से जायज भी ठहराने लगते हैं। उनका कहना होता है कि आखिरकार कुछ देने के एवज में कुछ हासिल तो होता है। ऐसे ही तमाम तर्क लोगों के जेहन में घूमते रहते हैं जिसके चलते वे खुशी-खुशी इस प्रक्रिया का हिस्सा बन जाते हैं। इस समस्या को उचित ठहराने के लिए जिम्मेदार कुछ कारकों से हमें निपटने की जरूरत है।

विश्व के अलग-अलग देशों में भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिए आवश्यकतानुसार नए कानून लाए जाते रहे हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में एफसीपीए कानून 1997 में एवं ब्रिटेन में यूके ब्राइबरी 2010 में लाया गया। भारत में कठोर भ्रष्टाचार रोधी कानून की आवश्यकता पिछले कई दशकों से महसूस की जाती रही है जो कि संयुक्त राष्ट्र के संधि यूएनएसी एवं भारत के सुप्रीम कोर्ट के कई महत्त्वपूर्ण निर्णयों के अनुरूप हो।

देश में पहले ही काफी कानून हैं। एक थानेदार को भी ताकत है कि वह आईजी, डीआईजी को रिश्वत लेने में गिरफ्तार कर सकता है। ऐसे कई उदाहरण भी हैं, जब थानेदार ने डीएसपी के साथ भी ऐसा किया है। कानून की कोई कमी पहले भी नहीं थी और आज भी नहीं है। अब रिश्वत लेने वाले के साथ रिश्वत देने वाला भी बच न सके, इसके लिए कानून बनाना जरूरी था। हालांकि जल्दी और आसानी से काम निकलवाने के लिए लोगों की रिश्वत देने की आदत को बदले बिना सिर्फ कानून आ जाने से रिश्वतखोरी बंद हो जाए, ये बहुत मुश्किल है।

कानून भले ही कितना अच्छा हो, उसका समुचित क्रियान्वयन अपने आप में एक चुनौती रहती है। पारित संशोधन भ्रष्टाचार के खात्मे में न केवल दर्ज होने वाले केसों की संख्या बल्कि मामले की सुनवाई की समय सीमा तक को प्रभावित करेगा। अपराध की परिभाषा से प्रारंभ होकर यह संशोधन आपराधिक दुव्र्यवहार की सही व्याख्या एवं रिश्वत देने और लेने वाले दोनों को दंडित करने तथा कथित ईमानदार नौकरशाही के लिए सुरक्षा कवच एवं निश्चित समयावधि में भ्रष्टाचार संबंधित मामले की सुनवाई का प्रावधान करता है।

भ्रष्टाचार के दानव से लडऩे के लिए सिर्फ कानून प्रभावी नहीं होगा। इसके लिए अभिभावकों और शिक्षकों को बच्चों को अच्छे मूल्य सिखाने होंगे। सभी शिक्षण संस्थानों में नैतिक शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। व्यावसायिक संस्थानों को चाहिए कि वे भ्रष्टाचार रोधी कानूनों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण सत्र रखें।

- नरेंद्र देवांगन

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