तोडऩा होगा गरीबी का मकडज़ाल

तोडऩा होगा गरीबी का मकडज़ाल

भारत गांव में रहता है। जो अनपढ़ है, आधुनिकता रहित है, साधनहीन है, महत्त्वाकांक्षी नहीं है, आज केवल वही गांवों में रहता है। जो उन्नति करना चाहता है, कुछ कर दिखाना चाहता है, उसे गांव छोड़कर शहर की तरफ भागना पड़ता है। सफलता उसे तभी मिलती है जब गांव छोड़ देता है।

प्रत्येक परिवार के जो सदस्य गांव के बाहर निकल जाते हैं, वे कालान्तर में सम्पन्न बन जाते हैं। गांव में रहने वाले परिवार अपने भाग्य को कोसते हैं। उनके बच्चे अपने माता-पिता को अपने पिछड़ेपन का दोषी मानते हैं।

वास्तव में गांवों के हितैषी गांववालों के सिवाय कोई नहीं हैं। जो लोग अपने आपको गरीबों का हितैषी कहते हैं, वे वास्तव में गरीबी का शोषण करने वाले हैं, गरीबी हटाने वाले नहीं हैं। उनका स्वयं का जिन्दा रहना, महत्त्वपूर्ण रहना, इस बात पर निर्भर करता है कि दूसरे लोग गरीब, अनियोजित, अशक्त और अज्ञानी बने रहें। यह कड़वा सत्य है।

गांव में परम्परागत रोजगार देने की बात हर पंचवर्षीय योजना में है पर परम्परागत धन्धे उन जातियों और परिवारों के पिछड़े बने रहने की गारंटी भी हैं। गांवों और शहरों के बीच की सुविधाएं जब तक एक सी नहीं होती, गांव वाला गरीब व पिछड़ा रहेगा।

इसमें सबसे बड़े कसूरवार हमारी राजनैतिक पार्टियां और उनके नेतागण हैं। पिछले साठ सालों में उन्होंने केवल सब्जबाग दिखाये हैं। गांवों में सड़कें बनी हैं पर साफ पानी का प्रबन्ध नहीं हुआ है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जब तक गांव के बच्चों की अच्छी शिक्षा न मिले, तब तक गांव पिछड़े रहेंगे।

दूसरी समस्या यह कि पढ़ लिखकर गांव का युवक गांव में कुछ कर नहीं कर सकता। वह सरकारी नौकर भी बन जाये तो निम्नतम स्तर पर रहता है। वह बड़ा अफसर तो बन ही नहीं सकता। वह धनवान हो सकता है पर इसके लिए उसके पास काफी जमीन और अच्छी पैदावार चाहिए। गांव का आदमी शहर की तरफ नहीं भागे, ऐसे प्रोग्राम कभी सफल नहीं हो सकते जब तक गाँव शहर के बराबर खड़े नहीं होंगे। उच्च शिक्षा प्राप्त किये बिना यह बराबरी नहीं आ सकती और गांव में उच्च शिक्षा प्राप्ति का भी कोई अवसर नहीं है। गांव में तो प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा भी मुश्किल से मिलती है।

फिर उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद कृषक का बेटा कृषक नहीं रहता। गांवों में खेती करने वाले युवकों की कमी भी होती ही जायगी। इस नये संकट से जूझने के लिए भी हमें तैयार रहना चहिए। खेती जीवन का आधार है और उन्नत खेती के विकास के लिए गांवों में ऐसे युवकों की हमेशा जरूरत रहेगी जो खेती में नये-नये प्रयोग कर सकें और उसे आधुनिक बना सकें।

- उपध्यान चन्द्र कोचर

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