विश्लेषण: सर्जिकल स्ट्राइक भाजपा की एक अनुपम रणनीति

विश्लेषण: सर्जिकल स्ट्राइक भाजपा की एक अनुपम रणनीति

सर्जिकल स्ट्राइक के बारे में पचास तरह के अनुमान और व्याख्याएं हो सकती हैं। लोग अपने अपने हित के गणित के अनुसार कर भी रहे हैं, की जानी भी चाहिए क्योंकि राजनैतिक गुणावगुणों के अनुसार सारे राजनैतिक दल अपने अपने हितों के अनुसार इसकी व्याख्या करेंगे।
एक स्वस्थ प्रजातंत्र के लिए यह आवश्यक भी है कि देश की किसी ऐसी घटना जिससे देश की राजनीति पर दूरगामी परिणाम पड़ता हो, की विवेचना होनी ही चाहिए किन्तु भारतीय सेना द्वारा की गई विगत सर्जिकल स्ट्राइक की मोदी विरोध के चलते जो छीछालेदार अपने आप को देश की सबसे बड़ी और आजादी दिलाने की स्वयंभू झंडाबरदार पार्टी द्वारा की जा रही है, उसे किसी भी दृष्टिकोण से न तो उचित ही किया जा सकता है और न संगत ही कहा जा सकता है।
हम कांग्रेस पार्टी के इस दावे को सिरे से खारिज नहीं कर रहे कि उसके समय में इस तरह के कई सर्जिकल स्ट्राइक नहीं हुए होंगे। एक लम्बा समय कांग्रेस ने देश पर राज किया है। इसी बहादुर सेना के बल पर देश ने उसके राज में कई युद्ध जीते हैं, इसको तो कोई खारिज नहीं कर सकता किन्तु सर्जिकल स्ट्राइक के तुरंत बाद जिस तरह की प्रतिक्रिया कांग्रेस के मुखिया और प्रथम पंक्ति के नेताओं से लेकर प्रवक्ताओं की फौज के द्वारा तब से अब तक प्रकट की जा रही हैं, उसे केवल एक शब्द से व्याख्यित करना हो तो वह शब्द 'प्रलाप' सटीक लगेगा। इस प्रकरण में कांग्रेस अपने बनाए जाल में खुद फंस गयी है। उसके व्यवहार से लग रहा है कि जैसे भारतीय सेना उसके अपने देश की सेना नहीं है अपितु किसी अन्य देश की सेना हो या फिर मोदी की सेना हो जिसे किसी भी बहादुरी या अनन्यतम कार्य का कोई क्रेडिट देना देश के हित में नहीं हो।
हो सकता है कि कांग्रेस के अनुसार उसके कार्यकाल में इससे छोटे या बड़े कई सर्जिकल स्ट्राइक हुए हों मगर जिस सही समय पर यह सर्जिकल स्ट्राइक हुई है, उसे बेजोड़ कहा जा सकता है। पाकिस्तानी फौज के साथ कई आतंकवादी समूहों के काले गठजोड़ के चलते कश्मीर में हो रहे अंधाधुंध आतंकवादी हमलों से अधिक विरोधी दलों की भारतीय सेना के प्रति झूठी सहानुभूति की आड़ में विरोधी दलों की सेना की आलोचना से त्रस्त भारतीय सेना के मनोबल को बनाए रखने के लिए उसे आवश्यकता थी अपने सैनिकों का मनोबल बढ़ाए रखने की, ऐसे समय पर जब सेना को किसी बड़े अभियान की आवश्यकता थी।
इस लाजवाब अभियान ने एक तीर से कई निशाने लिए। एक ओर जहां इस अभियान ने सेना के मनोबल को बहुत ऊंचाई पर पहुंचाया, वहीं पाकिस्तानी सेना और आतंकियों के गठजोड़ को रसातल के करीब लाने का प्रयास किया। भारतीय सेना की सर्जिकल स्ट्राइक के बाद अब पीओके में स्वच्छन्दता के साथ आतंकी और उसकी समर्थक सेना की गतिविधियों में बहुत बड़ी कमी आई है। अब वे उतनी खुली गतिविधियों से अपने कैम्प चलाने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं जैसे कि पहले निद्र्वंद्व किया करते थे।
इस सर्जिकल स्ट्राइक का सबसे बड़ा लाभ देश को यह हुआ है कि अपने आपको नेपोलियन बोनापार्ट के समतुल्य समझने वाले और भारतीय जनरलों से श्रेष्ठ समझने की मानसिकता से ग्रसित पाकिस्तानी जनरल राहिल को अपनी हैसियत का अंदाजा हो गया और अपना कार्यकाल बढऩे के हर पैमाने पर अपने आप को सिद्ध कर चुके जनरल राहिल को निर्धारित समय पर ही जाना पड़ा। यह भी भारतीय सेना की एक बहुत बड़ी जीत थी। इसे अपने अपने हितों की रक्षा में बेलगाम बोलने वाले राजनीतिबाज नहीं समझेंगे। जब देश की सेना का हर जवान इस स्ट्राइक का जश्न मना रहा था तो कुछ राजनैतिक दल सारी मर्यादाएं भूल कर अनर्गल प्रलाप में मस्त थे।
इस सर्जिकल स्ट्राइक के माध्यम से सरकार के शीर्ष नेतृत्व और सेना के शीर्ष नेतृत्व के मध्य एक बेहतर तालमेल की जो मिसाल सामने आई है, उसने देश की सेना की शक्ति की जो छवि विश्व के सामने रखी है, उससे विश्व की कई महाशक्तियां भी प्रभावित हुई हैं और इसी कारण अपने निहित स्वार्थों के चलते केवल चीन को छोड़ कर कोई अन्य देश पाकिस्तान के पक्ष में खड़ा नहीं हुआ। यह भी भारत की एक बहुत बड़ी कूटनीतिक विजय रही। यहाँ तक कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इस विषय पर कोई गंभीर टिप्पणी करने से परहेज किया। इसे कम बात नहीं माना जाना चाहिए। यह पाकिस्तान की गिरती साख को भी दिग्दर्शित करती है।
यह सही है कि देश इस समय उस कगार पर खड़ा है जहां सरकार के हर कार्य को 2019 के चुनावों के सामने रख कर तौला जाएगा। सर्जिकल स्ट्राइक के दो साल बाद उसके वीडियो प्रदर्शन को भी इसी तराजू पर रख कर कांग्रेस और अन्य विरोधी दल तौल रहे हैं। यह भी सही है कि किसी भी समय इन्हें प्रस्तुत किया जाता, कोई न कोई तर्क देकर इसे गलत सिद्ध करने का प्रयास विरोध पक्ष द्वारा किया जाता किन्तु विशेषज्ञों की यह बात तो समझ में आती है कि अगर इन वीडियो क्लिपों को जो सैन्य रणनीति को उजागर नहीं करने की रणनीति के चलते काट छांट कर प्रदर्शित की गयी हैं, उस समय सामने लाया जाता तो विरोधियों को अनेक कुतर्क सामने रखने का मौका मिलता और विश्व के सामने भारत की छवि धूमिल होती। विरोधी सवाल पर सवाल करते और सेना पूरी रणनीति छिपाती और एक नया तमाशा सामने लाकर देश की छवि का ध्यान न रख कर ऊलजलूल सवाल पूछे जाते। इसलिए अगर इस समय इन वीडियो क्लिपों को सामने लाकर देश को अवगत कराने की सेना की यह कोशिश उचित कही जाय तो गलत नहीं होगा। भाजपा का यह तर्क भी कि इसे चुनावी परिप्रेक्ष्य में इसलिए नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि अभी तो चुनावों में ग्यारह महीने हैं को भी नकारा जाना उचित नहीं होगा।
इसमें कोई शक नहीं है कि एक न्यूज चैनल ने इस वीडियो को इस दावे के साथ जारी किया है कि उसे यह वीडियो आधिकारिक रूप से प्राप्त हुआ है। इस वीडियो के विषय में सेना या उसके प्रवक्ता की चुप्पी भी यह सिद्ध करती है कि इसे सेना की सहमति से ही जारी किया गया है। जिस सैन्य अधिकारी के सामने यह घटनाक्रम चल रहा था, उसके द्वारा इस वीडियो की सत्यता सिद्ध करना भी इसी ओर इंगित करता है कि यह भारतीय सेना की शौर्यगाथा है। इसे कब और क्यों जारी किया जाए, यह भारतीय सेना का अपना निर्णय हो सकता है किन्तु मोदी विरोध के चलते कांग्रेस और अन्य मुखर विरोधी दल इसे निर्वाचन में एक मुद्दा बना कर भाजपा के हाथ में थमा देंगे इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती हैं।
कुछ केन्द्रीय मंत्रियों के बयानों से भी लगता है कि वे इसे चर्चा में रखना चाहते हैं और कांग्रेस और विरोधी दलों के पुराने बयानों को हवा देकर वे इस प्रकरण को चुनाव तक जीवित रखना चाहते हैं। अगर विरोधी दलों विशेष रूप से कांग्रेस ने इस मुद्दे को अनावश्यक रूप से उछाला तो निश्चित रूप से यह प्रकरण चुनावी मुद्दा बनेगा और इसका लाभ भी कांग्रेस अनजाने रूप से भाजपा को दे देगी क्योंकि कांग्रेस में राहुल को इतना समझदार मानने को कोई तैयार नहीं है उन्हें कोई निर्णय लेने दिया जाय। इसके सर्वथा विपरीत उन्हें अपने नम्बर बढ़वाने की लालसा से ग्रसित अनेक स्वयंभू नेता सलाह दे दे कर विभ्रम की स्थिति में डाल कर उन्हें हंसी का पात्र बनाने का प्रयास जरुर करते रहते हैं। इस बात की तो तारीफ ही की जानी पड़ेगी कि मोदी की शीर्षता के चलते भाजपा के रणनीतिकारों ने एक ऐसा मुद्दा जनता के बीच परोस दिया है जो कांग्रेस को अब न तो उगलते बनेगा और न ही निगलते। भाजपा ने कांग्रेस के पुराने बयानों के परिप्रेक्ष्य में उसके पाले में बड़ी चतुरता से जो मासूम सवाल डाले हैं अगर उन के पूर्व उत्तरों पर कायम रहती है तो जनता में अपनी छवि को नुकसान पहुंचाती है और अगर उनसे हटती है तो भाजपा की साख को बढ़ाती है। इन सवालों के साथ भाजपा ने एक और सवाल कांग्रेस के पाले में डाला है और वह है बहादुर सैनिक औरंगजेब के घर सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत और रक्षामंत्री निर्मला सितारमन के शोक व्यक्त करने हेतु जाने को कांग्रेस द्वारा ड्रामा बताए जाने के औचित्य का ? इसे भाजपा का मास्टर स्ट्रोक कहें तो अनुचित नहीं होगा।
- राज सक्सेना

Share it
Share it
Share it
Top