बहस: कश्मीरी नेताओं के अनर्गल प्रलाप के पीछे उनका व्यक्तिगत स्वार्थ है, कोई जनहित नहीं

बहस: कश्मीरी नेताओं के अनर्गल प्रलाप के पीछे उनका व्यक्तिगत स्वार्थ है, कोई जनहित नहीं

कश्मीरी नेताओं के अनर्गल प्रलाप के पीछे उनका व्यक्तिगत स्वार्थ है, जनहित जैसी कोई खास बात नहीं। कांग्रेस के कद्दावर नेताओं- गुलाम नबी आजाद और सैफुद्दीन सोज की हालिया बयानबाजी भी इसका अपवाद नहीं है। इस पर बीजेपी नेताओं की जो प्रतिक्रिया आ रही है, वह भी राजनीतिक ज्यादा है, व्यावहारिक कम। यह कटु सत्य है कि महाराजा हरि सिंह से लेकर महबूबा मुफ्ती तक जितने भी कश्मीरी शासक हुए, उन्होंने आम कश्मीरियों के विषय में कभी नहीं सोचा।
हां, उनकी बादशाहत कैसे कायम रहे, शायद इसी नजरिए से हर फैसले लिए और वक्त-वक्त पर कई तरह के विरोधाभासी पैंतरे भी बदले। निस्सन्देह इन सभी के दुष्प्रभावों को ही समवेत रूप में कश्मीर समस्या करार दिया जाता है लेकिन इसके समाधान के नाम पर कांग्रेस नीत यूपीए और बीजेपी नीत एनडीए में जो सियासी खींचातानी चल रही है और आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है, उससे पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों और अलगाववादियों के हौसले बढ़ेंगे जबकि इसका कोई समाधान नहीं निकलने वाला।
तब पाकिस्तान की बेजा हरकतों से बचने के लिए नेहरू ने जिस तरह से कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र संघ के समक्ष रखवाया और इस वैश्विक संस्था ने जितना अदूरदर्शी रवैय्या अपनाया, उससे कश्मीर संकट बढ़ा। दरअसल, भारत-पाकिस्तान और कश्मीर के लोगों को मिलाकर इस समस्या के समाधान के जो सपने देखे गए, वो अव्यावहारिक थे क्योंकि कश्मीर का भारत में विलय होते ही पाकिस्तान और कश्मीरियों की भूमिका नेपथ्य में चली गई और भारत सरकार का दृष्टिकोण महत्त्वपूर्ण हो गया लेकिन हमारे अकर्मण्य शासकों ने अपने उत्तरदायित्व को समझने में भूल की, जिससे पाकिस्तानियों और कश्मीरी अलगाववादी नेताओं को बल मिला।
यह कितनी हैरत की बात है कि कांग्रेस के नेता सत्ता से हटते ही पाकिस्तानियों और अलगाववादियों की भाषा बोलते हैं जबकि बीजेपी सिर्फ सत्ता के लिए पीडीपी से सियासी प्रेम करती है और फिर तलाक भी लेती है जो गलत है।
अतीत साक्षी है कि पाकिस्तान ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का विषय बना लिया है और कश्मीर समस्या को तरह-तरह से भड़काने वाली चालें चल रहा है। आलम यह है कि जब वह युद्ध में भारत का मुकाबला नहीं कर सका तो आतंकवाद और अलगाववाद को बढ़ावा देने में जुटा हुआ है जिसका दुष्परिणाम हमारे सामने है।
यह कड़वा सच है कि कश्मीर मसले पर देश-दुनिया ने भी अपनी नैतिक जिम्मेवारी नहीं निभाई। दरअसल, भारत-पाक की आपसी रंजिश की आड़ में पहले अमेरिका-रूस ने और अब अरब-चीन ने जो अदूरदर्शिता दिखाई, उससे कश्मीर समस्या के साथ-साथ अफगानिस्तान समस्या ने भी विकराल रूप धारण कर लिया है जिससे धरती का जन्नत समझा जाने वाला यह इलाका आए दिन लहूलुहान हो रहा है।
ऐसी जटिल परिस्थितियों में पाकिस्तानी हुक्मरान और अलगाववादी कश्मीरी नेता यदि यह सोच रहे हैं कि चीन की सरपरस्ती में वो भारत से कश्मीर छीन लेंगे तो उन्हें यह याद रखना चाहिए कि जब पाक-अमेरिकी नापाक गठजोड़ से उनकी यह मुराद पूरी नहीं हुई तो पाक-चीन के मौकापरस्त गठबंधन में भी अधूरी ही रहेगी क्योंकि भारत सरकार ने नए सिरे से अपनी कमर कस ली है।
सच कहा जाए तो भारत-पाक के बीच कश्मीर का मुद्दा एक राजनैतिक समस्या है जिसका शक्तिपूर्वक समाधान कभी नहीं निकलेगा क्योंकि यहां की जो कतिपय समस्याएं सामने आ रही हैं, वह महाराज हरि सिंह से लेकर महबूबा मुफ्ती जैसे अदूरदर्शी शासकों के व्यक्तिगत स्वार्थों की देन है जिससे आमलोगों का कोई वास्ता नहीं। यही वजह है कि कश्मीर और इस्लाम की आग भड़का कर भारत को तोडऩे का स्वप्न देखने वाले जो कुछ लोग हैं, उन्हें हमेशा निराशा ही हाथ लगेगी।
हाल ही में पीडीपी-बीजेपी गठबंधन टूटने से उत्साहित कांग्रेसी नेता गुलाम नबी आजाद और सैफुद्दीन सोज ने कश्मीर और कश्मीरियत को लेकर जो अनर्गल प्रलाप किए हैं, वह उनकी खीझ है और कुछ नहीं लेकिन कांग्रेस जिस तरह से उनके साथ नरम व्यवहार कर रही है, वह उसी के लिए एक दिन भारी पड़ेगी क्योंकि इससे उनकी पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर कितनी क्षति होगी, शायद इसका अनुमान लगाने में वे विफल हैं।
यह कौन नहीं जानता कि आतंकवादियों से लडऩे में मनमोहन सरकार साफ्ट थी जबकि मोदी सरकार बेहद हार्ड। कांग्रेस नीत संप्रग सरकार में आतंकवादी सालाना दो अंकों में मारे जाते थे जबकि बीजेपी नीत राजग सरकार ने इसे सालाना तीन अंकों में पहुंचा दिया है जिससे कश्मीर मूल के कांग्रेसी और अलगाववादी नेता बौखलाए हुए हैं। एक तरफ पूर्व केंद्रीय मंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री रहे कांग्रेसी रणनीतिकार गुलाम नबी आजाद अनर्गल प्रलाप कर रहे हैं तो दूसरी ओर पूर्व केंद्रीय मंत्री सैफुद्दीन सोज।
आजाद कहते हैं कि कश्मीर में चल रहे आपरेशन का खामियाजा जम्मू-कश्मीर की आम जनता को भुगतना पड़ता है क्योंकि आतंकी कम और आम नागरिक ज्यादा मारे जा रहे हैं। चार आतंकियों को मारने के लिए बीस नागरिकों को मार दिया जाता है लेकिन आश्चर्य की बात है कि आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा ने भी आजाद की तरफदारी की है। इसलिए अब आजाद को कौन समझाए कि यदि ये चार आतंकी जिंदा बच जाते तो सुरक्षाकर्मियों समेत सैंकड़ों लोगों को मौत की मुंह में धकेल देते। उसकी तुलना में 20 लोगों की शहादत क्षम्य है।
दूसरी ओर, पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेसी नेता सैफुद्दीन सोज कह रहे हैं कि कश्मीर के लोगों की पहली प्राथमिकता आजादी पाना है। वर्तमान स्थिति में कश्मीर की आजादी इससे जुड़े देशों के कारण सम्भव नहीं है। उनके इस मत से तो यही लगता है कि शायद उन्हें कश्मीरियत और जम्हूरियत की असली समझ नहीं है। अलबत्ता, इस जन्म में होगी भी नहीं क्योंकि धरती के इस जन्नत की तदबीर और तासीर ही कुछ अलग है। उनका यह बात दुहराना कि सरदार पटेल कश्मीर को पाकिस्तान को दे देना चाहते थे, आपत्तिजनक है और इसके पीछे की जो उनकी कुटिल सोच है, वह कभी नहीं पूरी होगी।
अब जिस तरह से भाजपा और शिवसेना ने कांग्रेस समेत इन नेताओं को कठघरे में खड़ा किया है, उससे साफ है कि जो पाकिस्तानी पूर्व राष्ट्रपति मुशर्रफ गिरफ्तारी के भय से अपने देश पाकिस्तान आने में डर रहा है, वह एकबारगी भारत की भृकुटि तनने पर कश्मीरियों के साथ कितने सेकेंड खड़ा रह पायेगा, समझना आसान है और उसको भी भलीभांति पता होगा ही। रही बात कांग्रेस नेता सैफुद्दीन सोज की तो वह मुशर्रफ की भाषा बोल लें, किताबों में लिखकर अपने मन भी भड़ास निकाल लें, उनके ही कांग्रेसी मित्रों के शब्दों में- इससे किताबें कुछ अधिक बिक जाएंगी लेकिन वो यह बात हमेशा याद रखें कि कश्मीर पर उनकी क्षुद्र सोच नहीं बल्कि भारतीयों के उदारमना नजरिए का सिश्चा चलेगा।
यह कटुसत्य है कि उनकी और उन जैसों की ही दोगली नीतियों पर थिरकने वाली कांग्रेस इतिहास की सबसे बड़ी सियासी दुर्दिन से गुजर रही है और 545 संसदीय सीटों में से मात्र 44 सीट तक सिमट गई है जो कि दस प्रतिशत से भी कम है। शायद उन्हें पता नहीं कि जब देशवासियों की भौंवें तनेंगी तो न कांग्रेस उनकी हिफाजत कर पायेगी, न ही कश्मीर के सिरफिरे अलगाववादी क्योंकि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और रहेगा। जो इसमें बाधक बनेगा, साफ हो जाएगा।
जहां तक कश्मीर के सवाल पर जनमत संग्रह करवाने के सपने देखे जाने की बात है तो ऐसे लोगों को यह बात गांठ बांध लेनी चाहिए कि अब किसी भी प्रकार का जनमत संग्रह कश्मीर के हिन्दुस्तान में रहने या नहीं रहने के सवाल पर नहीं बल्कि इस बात के लिए होना चाहिए कि हिन्दुओं के हिस्से के भारत को धर्मनिरपेक्ष बनाना क्या उचित है या अनुचित? क्या पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के प्रेम और 'तलाक' से उपजी पंथनिरपेक्षता (धर्मनिरपेक्षता) भारत के लिए 'मीठा वैचारिक जहर' नहीं है?
यही नहीं, सबकी जेहन में सुलगता सवाल तो यह भी है कि यदि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की तादाद अप्रत्याशित रूप से घट रही है तो तुलनात्मक रूप से भारत में क्यों बढऩे दी जाए, शायद ऐसा इसलिए हो रहा है कि भारतीय सत्ता घुमा-फिराकर 'वर्णसंकरों' के हाथ में ज्यादा रही है जिनका मकसद धर्मनिरपेक्षता की आड़ लेकर अल्पसंख्यकों की आबादी में इजाफा होने देना है जबकि ऐसे ही कतिपय हुक्मरानों की शह पर हिन्दुओं के हिस्से सरकारी षड्यंत्र वाला बंध्याकरण नसीब हुआ है ताकि हिन्दुओं की आबादी कम होती रहे।
गनीमत है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके विभिन्न अनुषांगिक संगठनों ने ऐसे अहम सवालों पर हिन्दुओं की चेतना को जागृत किया है जिससे कश्मीर में भी बीजेपी बैकफुट पर लौटी है। उसने पीडीपी से रणनीतिक तलाक ले लिया है। पीएम मोदी को पता है कि सुलगते कश्मीर और दहकती सीमाओं के रहते हुए बीजेपी को फिर से 2019 में बहुमत मिलने वाला नहीं है!
यह कौन नहीं जानता कि राम मंदिर बने या नहीं बने, कोई चिंता की बात नहीं लेकिन कश्मीर में और सीमाओं पर हमारे सैनिक शहीद हों, यह किसी को गंवारा नहीं। जब जब देश के किसी भी हिस्से में हमारे सैनिक शहीद होते हैं तो वह पल हमारा खून खौला देने वाला जज्बाती पल होता है। यह कड़वा सच है कि जब भी सैनिकों की अर्थियां उठती हैं तो पूरा गांव क्या, सारा देश रोता है, गमगीन हो उठता है।
लिहाजा, सैफुद्दीन सोज जैसे कांग्रेसी नेता अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर जो चाहें मनमाफिक बोल लें लेकिन यह नहीं भूलें कि 70 साल से कश्मीर भारत का है और रहेगा। यह भारत मां का मस्तक है। इसे हमलोग न झुकने देंगे, न ही कटने देंगे। हां, सम्भव है कि उन जैसे 'देशद्रोहियों' को पालने वाली पार्टी ही खत्म हो जाए और उनके समेत उनका कुनबा भी क्योंकि एनएसजी जवान अब कश्मीर पहुंच चुके हैं।
बहरहाल, आतंकियों को पालने वाले सफेदपोश नेता सिर्फ इतना याद रखें कि बकरे की मां आखिर कब तक खैर मनाएगी? उन्हें पता होना चाहिए कि कश्मीर में जो भी भारत के खिलाफ सिर उठाएगा, या तो आत्म-समर्पण करेगा या फिर मारा जाएगा, शासन के रुख से ऐसा ही लग रहा है।
- कमलेश पांडे

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