प्रश्न चिन्ह: क्या अमेरिकी इशारे पर चलेगा भारत या फिर चुकाएगा बड़ी कीमत?

प्रश्न चिन्ह: क्या अमेरिकी इशारे पर चलेगा भारत या फिर चुकाएगा बड़ी कीमत?

पिछले डेढ़ दशक में भारत-अमेरिकी सम्बन्ध जितनी तेजी से आगे बढ़े हैं, अब उस पर ब्रेक लगने के स्पष्ट आसार नजर आ रहे हैं क्योंकि आगे पारस्परिक उलझाऊ रिश्तों का पहाड़ है तो पीछे आपसी विश्वासघात की खाई, जिस पर लुढ़कना खतरे से खाली नहीं। ऐसा इसलिए कि अमेरिका भारत को अपने वैश्विक हितों के मुताबिक मोहरा बनाना चाह रहा है जबकि रूस और चीन की भारत से अलग-अलग अपेक्षाएं हैं।
यही नहीं, भारतीय गुटनिरपेक्षता की ऐतिहासिक नीति भी उसे इस बात की इजाजत नहीं देती कि वह अंतरराष्ट्रीय मसलों पर अमेरिकी मतलबपरस्ती की बीन पर थिरके अथवा किसी खेमे में मिलकर अपने पुराने मित्रों के साथ हो रहे छल या भेदभाव पर खामोश अथवा तमाशबीन बना रहे। लिहाजा, सुलगता सवाल है कि आखिरकार करे तो क्या करे भारत? किसे संतुष्ट करे और किसे नाराज? दूसरों की नाराजगी की कीमत कम चुकाए या ज्यादा।
दरअसल, वैश्विक दुनियादारी और कारोबारी द्विपक्षीय रिश्तों पर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की हठधर्मिता और अदूरदर्शिता इतनी भारी पड़ रही है कि दुनिया के कई देशों से अमेरिका का रिश्ता बेहद पेंचीदा होता जा रहा है। पहले रूस, फिर चीन और अब भारत के साथ उनका जो रवैय्या है और कभी सीरिया, कभी ईरान और कभी उत्तर कोरिया आदि को लेकर वह जिस कदर अपने शुभचिंतक राष्ट्रों को भी आंख दिखाने से बाज नहीं आ रहा है उससे अमेरिकी दादागिरी को बढ़त तो मिली है, लेकिन ट्रेड वार की आशंका प्रबल है। कोढ़ में खाज यह कि सीरिया, ईरान, उत्तर कोरिया आदि के मुद्दे पर उनकी जो दुविधा सामने आई है, वह भारत के समक्ष भी कई नीतिगत और रणनीतिक सवाल खड़े करती है। खासकर ईरान से भारत के आर्थिक सम्बन्धों के बारे में, क्योंकि अमेरिका उसके साथ हुए परमाणु करार को तोड़कर उस पर नए सिरे से वैश्विक आर्थिक प्रतिबंध लगा चुका है।
लिहाजा, भारत का फर्ज बनता है कि अमेरिका की दलीलों को सुनने के बाद वह अन्य मित्र देश रूस, चीन, जापान, फ्रांस, इजरायल, आस्ट्रेलिया आदि से संबंधित मसलों पर विचार विमर्श करे और सामूहिक समझदारी भरा फैसला ले क्योंकि विश्व कूटनीति में न तो कोई स्थायी दोस्त होता है और न ही दुश्मन जबकि ईरान से भारत के सम्बन्ध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दोनों हैं जिन्हें अमेरिका के चलते दांव पर लगाना इस्लामिक देशों में पाकिस्तान को मजबूत करने जैसा होगा। ऐसा इसलिए भी कि ट्रंप के कतिपय प्रशासनिक फैसलों से स्पष्ट है कि वैश्विक कूटनीति के नजरिए से वह भरोसेमंद नहीं, बल्कि सनकी प्रवृत्ति वाले शासक हैं जिन पर विश्वास करना खुद को धोखे में रखने जैसा है।
इस बात में कोई दो राय नहीं कि वे अमेरिकी हितों के संबद्र्धक हैं लेकिन यदि वे द्विपक्षीय और क्षेत्रीय स्तर पर भारतीय हितों की अनदेखी कर रहे हैं तो उनसे मित्रता से क्या फायदा और शत्रुता से क्या हानि? शायद अमेरिका को यह नहीं मालूम कि उसकी दोमुंहीं नीति के चलते ही आज गुटनिरपेक्ष भारत की विदेश नीति कई तरह के अंतरराष्ट्रीय दबावों को झेलने को अभिशप्त है। खासकर अर्थनीति और विदेश नीति के मोर्चे पर इसके सामने कई तरह की आकस्मिक चुनौतियां आ खड़ी हुई हैं। ऐसा इसलिए कि भारत-अमेरिका के द्विपक्षीय सम्बन्धों के जो दांवपेंच हैं, वो भारत-रूस के भरोसेमंद द्विपक्षीय सम्बन्धों से जरा अलग हटके हैं। इसलिए अमेरिका के इशारे पर थिरकने की बजाय भारतीय नेतृत्व को फूंक-फूंक कर कोई भी कदम आगे बढ़ाना चाहिए क्योंकि 2000 वर्षों के पारस्परिक जनविश्वास को तुच्छ सामरिक-आर्थिक स्वार्थ के लिए नष्ट कर देना कोई बुद्धिमत्ता वाली बात नहीं होगी।
इसमें कोई दो राय नहीं कि आज भी भारतीय नेतृत्व के समक्ष कमोबेश वही आजादी कालीन चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं, जो आज से छह-सात दशक पहले भी हुआ करती थीं लेकिन इसके लिए दोषी हमारा पुराना नेतृत्व तो रहा ही है लेकिन परवर्ती नेतृत्व की जल्दबाजी और अदूरदर्शिता से भी स्थिति थोड़ी जटिल हुई है, इसलिए भारत यदि सूझबूझ पूर्वक कदम उठाएगा तो यश पाएगा, अन्यथा अपयश मिलना तय है। भले ही भारत-रूस सम्बन्ध, भारत-अमेरिका सम्बन्ध और भारत-चीन सम्बन्ध की अपनी-अपनी अहमियत है, लेकिन पारस्परिक प्रतिस्पर्धा जनित त्रिकोणात्मक प्रेम के चलते ये सम्बन्ध अब पहले जैसे भरोसेमंद नहीं रह गए हैं। लिहाजा, अतिरिक्त सावधानी के साथ-साथ तीसरी दुनिया के देशों की हिमायत भी जरूरी है, क्योंकि वे भी आज कई तरीके के वैश्विक दांव-पेंचों से गुजर रहे हैं और भारत को अपना स्वाभाविक मित्र मानते हैं। लिहाजा, भारत को चाहिए कि वो सार्क देशों, अरब देशों और आशियान देशों के साथ अपने सम्बन्ध बेहद मधुर बनाए। साथ ही, यूरोपीय देशों, अफ्रीकी देशों, पूर्वी एशियाई देशों और आस्ट्रेलिया को भी समान रूप से अतिरिक्त तरजीह दें। यह ठीक है कि भारत के सम्बन्ध जापान, फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका और इजरायल से भी प्रगाढ़ हैं तथा ईरान, इराक, सऊदी अरब और जर्मनी आदि देशों से भी मधुर सम्बन्ध हैं। यही नहीं, और भी कई छोटे देश हैं जिससे भारत के रिश्ते घनिष्ठ हैं। इसलिए यदि अमेरिका, रूस या चीन यह चाहे कि भारत उनकी शह और मात की रणनीति के अनुरूप चले तो भारत को इससे स्पष्ट इनकार कर देना चाहिए। यही गुटनिरपेक्षता की नीति है और होगी जिससे विश्व-विरादरी में भारत की अलग साख है और बनेगी भी।
भारत की विडम्बना यह है कि वह अपने सर्वाधिक भरोसेमंद देश रूस से इतर मतलबपरस्त देश अमेरिका और विस्तारवादी देश चीन को जो साधने की कोशिश कर रहा है, उसमें ही वह घात-प्रतिघात का शिकार हो रहा है क्योंकि सामरिक रूप से चीन और आर्थिक रूप से अमेरिका, भारत पर हरसम्भव दबाव बनाने-बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं जो अनुचित है, लिहाजा भारत को अत्यधिक सतर्कता बरतनी पड़ रही है। जहां तक अमेरिकी दवाब का सवाल है तो वह यह चाहता है कि भारत, ईरान से कच्चा तेल न खरीदे। शायद यही दवाब बनाने के लिए अमेरिका ने गत दिनों भारत के साथ प्रस्तावित टू प्लस टू द्विपक्षीय वार्ता रद्द कर दी जिससे दोनों देशों के रक्षा और विदेश मंत्रियों की बैठक फिर टल गई, और एक अन्य सम्भावित तिथि का लालीपाप थमा दिया।
हालांकि अमेरिकी दबाव का मामला सिर्फ ईरान के तेल तक ही सीमित नहीं है बल्कि कुछेक और भी अहम मसले हैं जिस पर भारत-अमेरिका की सोच जुदा-जुदा है। यह बात अलग है कि ईरान का मामला कुछ ज्यादा महत्त्वपूर्ण है क्योंकि ईरान को तेल की कीमत स्थानीय मुद्रा रुपए में चुकाई जाती है जिसके चलते विदेशी मुद्रा की काफी बचत होती है लेकिन अब हर कोई जानता है कि जहां अमेरिकी दादागिरी का पुराना इतिहास रहा है, वहीं भारत भी समय-समय पर उसका माकूल जवाब देता आया है। इसलिए हैरत की बात है कि अब अमेरिकी दवाब के चलते भारतीय पेट्रोलियम मंत्रालय धीरे-धीरे ईरान से तेल लेना कम करते हुए उसे बंद करेगा, उसके बाद बहुमूल्य विदेशी मुद्रा चुकाकर तेल खरीदेगा जिससे निश्चित रूप से तेल अपना शतक पूरा करेगा।
जानकारों का भी मानना है कि अमेरिकी भय और बिना रीढ़ की विदेश नीति के कारण भारत को ऐसे असमंजस पूर्ण माहौल का शिकार होना पड़ रहा है। मसलन, हाल के दिनों में जिस सफल विदेश नीति की चर्चा हमलोग कर रहे थे, उसका ऐसा हश्र होगा शायद किसी को पता नहीं था क्योंकि जब पोखरण विस्फोट हुआ था, तब भी इसी अमेरिका द्वारा लादे गए बहुत सारे प्रतिबंधों को भारत ने झेला लेकिन कभी घुटने नहीं टेके किन्तु अब ईरान के मसले पर देशहित में फैसला लेने में टीम मोदी से जो चूक हो रही है, वह अक्षम्य है।
लगता है कि संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत निक्की हेली अपनी हालिया दौरे में भारत पर दबाव बनाने में सफल रही हैं जिससे जनता पर एक बार फिर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढऩे का अंदेशा बढ़ गया है। साफ है कि गप्प मारना अलग बात है लेकिन अटल जी जैसा दृढ़ निर्णय लेना अलग बात क्योंकि चर्चा खास है कि निक्की हेली भारत को मनाने या धमकाने आई थीं। लिहाजा, अब देखना यह है कि पीएम मोदी भारत के दूरगामी हितों और स्वाभिमान की रक्षा करते हैं या फिर ट्रंप के आगे घुटने टेक देते हैं। उल्लेखनीय है कि जब निक्की हेली भारत में थीं तभी ट्रंप ने छह महीने में तीसरी बार मोदी प्रशासन से बातचीत स्थगित कर दी है।
ऐसा इसलिए कि अमेरिका चाहता है कि भारत ईरान से कच्चे तेल की खरीदारी बिलकुल बंद कर दे। यही नहीं, उसका दूसरा एजेंडा है कि भारत में अमेरिकी उत्पादों पर बढ़ाई गई ड्यूटी को भी भारत वापिस ले। उसका तीसरा एजेंडा है कि वह रूस से एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदने का इरादा छोड़े। सच कहा जाए तो पहली नजर में इन तीनों ही मामलों में अमेरिकी हित के अनुरूप फैसला लेने से मोदी प्रशासन के समक्ष कई और अन्य मुश्किलें पैदा हो जाएंगी और बढ़ भी जाएंगी क्योंकि अमेरिका की स्पष्ट चाल है कि नहीं मानोगे तो अमेरिका से सम्बन्धों में आई दरार और चौड़ी होगी। इस विरोधाभासी स्थिति से स्पष्ट है कि यह सब विदेश नीति के दिशाहीन होने की वजह से भी हुआ है क्योंकि सबको साधने की चक्कर में हमलोग सबकी आंखों में चढ़ गए हैं।
बता दें कि भारत, ईरान से अपनी जरूरत का तकरीबन 17 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है जिसमें पिछले साल 34 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। ऐसा इसलिए कि उसको किए जाने वाले मूल्य भुगतान का एक हिस्सा वस्तुओं के आदान-प्रदान से भी चलता रहता है। बहरहाल, ईरान ने भारत पर बढ़ते अमेरिकी दबाव के चलते तेल की मुफ्त शिपिंग और साठ दिन का उधार भी देने का प्रस्ताव दिया है जिससे भारत फायदे में रहेगा। जानकारों का यह भी कहना है कि केवल ईरान से तेल लेना बंद करने का मतलब है अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त भार और पेट्रोल की खुदरा कीमत 100 रुपए तक जाने का खतरा, खास तौर पर चुनावी साल में।
यही नहीं, भारत-अमेरिकी संबंधों को गहरे तक प्रभावित करने वाला चौथा मामला फाउंडेशन एग्रीमेंट के कम्यूनिकेशन प्रोटोकाल का है जिसमें भारत को अपनी गुप्त संचार कोडिंग अमेरिका से साझा करनी है हालांकि भारतीय सेना ने इसका सख्त विरोध किया है जिसके चलते इसे रोक कर रखा गया है।
अलबत्ता, इन चारों महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं पर यदि नजर रखी जाए तो यह स्पष्ट होते देर नहीं लगेगी कि मोदी सरकार भारत के हितों और स्वाभिमान की रक्षा करती है या फिर ट्रंप के आगे घुटने टेक देती है। अब जो भी हो, लेकिन वैश्विक कूटनीति की छोटी सी भूल यदि सबको उलझा दे तो कोई हैरत की बात नहीं होगी।
- कमलेश पांडे

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