पक्ष या विपक्ष नहीं, मुद्दों पर वैचारिक गठबंधन के बहुमत से हों फैसले

पक्ष या विपक्ष नहीं, मुद्दों पर वैचारिक गठबंधन के बहुमत से हों फैसले

कर्नाटक में आये वर्तमान जनादेश तथा ऐसे ही पिछले अनेक खण्डित चुनाव परिणामों से वर्तमान संवैधानिक प्रावधानों में संशोधन की जरूरत लगती है। सरकार बनाने के लिये बड़ी पार्टी के मुखिया को नहीं वरन चुने गये सारे प्रतिनिधियों के द्वारा उनमें आपस में चुने गये मुखिया को बुलाया जाना चाहिये। आखिर हर पार्टी के चुने गये प्रतिनिधि भले ही उनके क्षेत्र के वोटरों के बहुमत से चुने जाते हैं किन्तु हारे हुये प्रतिनिधि को भी तो जनता के ही वोट मिलते हैं और इस तरह वोट प्रतिशत की दृष्टि से हर पार्टी की सरकार में भागीदारी लोक के सच्चे प्रतिनिधित्व हेतु उचित लगती है। वर्तमान स्थितियों में राज्यपाल के विवेक पर छोड़े गये निर्णय ही हर बार विवादास्पद बनते हैं व रातो रात सुप्रीम कोर्ट खोलने पर मजबूर करते हैं। किसी भी स्वस्थ समाज में कोर्ट का हस्तक्षेप न्यूनतम होना चाहिये पर पिछले कुछ समय में जिस तरह से न्यायालयीन प्रकरण बढ़ रहे हैं, वह इस तथ्य का द्योतक है कि कहीं न कहीं हमें बेहतर व्यवस्था की जरूरत है।

कोई भी सभ्य समाज नियमों से ही चल सकता है। जनहितकारी नियमों को बनाने और उनके परिपालन को सुनिश्चित करने के लिए शासन की आवश्यकता होती है। राजतंत्र, तानाशाही, धार्मिक सत्ता या लोकतंत्र, नामांकित जनप्रतिनिधियों जैसी विभिन्न शासन प्रणालियों में लोकतंत्र ही सर्वश्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि लोकतंत्र में आम आदमी की सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित होती है एवं उसे भी जन नेतृत्व करने का अधिकार होता है। भारत में हमने लिखित संविधान अपनाया है। शासन तंत्र को विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के उपखंडों में विभाजित कर एक सुदृढ़ लोकतंत्र की परिकल्पना की है। विधायिका लोकहितकारी नियमों को कानून का रूप देती है, कार्यपालिका उसका अनुपालन कराती है एवं कानून उल्लंघन करने पर न्यायपालिका द्वारा दंड का प्रावधान है।
विधायिका के जनप्रतिनिधियों का चुनाव आम नागरिकों के सीधे मतदान के द्वारा किया जाता है किंतु हमारे देश में आजादी के बाद के अनुभव के आधार पर इस चुनाव के लिए पार्टीवाद तथा चुनावी जीत के बाद संसद एवं विधानसभाओं में पक्ष विपक्ष की राजनीति ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमजोरी के रूप में सामने आई है।
सत्तापक्ष कितना भी अच्छा बजट बनाये या कोई अच्छे से अच्छा जनहितकारी कानून बनाये, विपक्ष उसका विरोध करता ही है। उसे जनविरोधी निरूपित करने के लिए तर्क कुतर्क करने में जरा भी पीछे नहीं रहता। ऐसा केवल इसलिए हो रहा है क्योंकि वह विपक्ष में है। हमने देखा है कि वही विपक्षी दल जो विरोधी पार्टी के रूप में जिन बातों का सार्वजनिक विरोध करते नहीं थकता था, जब सत्ता में आया तो उन्होंने भी वही सब किया और इस बार पूर्व के सत्ताधारी दलों ने उन्हीं तथ्यों का पुरजोर विरोध किया जिनके वे खुले समर्थन में थे। इसके लिये लच्छेदार शब्दों का मायाजाल फैलाया जाता है।
ऐसा लोकतंत्र के नाम पर बार-बार लगातार हो रहा है अर्थात हमारे लोकतंत्र में यह धारणा बन चुकी है कि विपक्षी दल को सत्ता पक्ष का विरोध करना ही चाहिये। शायद इसके लिये स्कूलों से ही वादविवाद प्रतियोगिता की जो अवधारणा बच्चों के मन में अधिरोपित की जाती है वही जिम्मेदार हो। वास्तविकता यह होती है कि कोई भी सत्तारूढ़ दल सब कुछ सही या सब कुछ गलत नहीं करता । सच्चा लोकतंत्र तो यह होता कि मुद्दे के आधार पर पार्टी निरपेक्ष वोटिंग होती, विषय की गुणवत्ता के आधार पर बहुमत से निर्णय लिया जाता पर ऐसा हो नहीं रहा है।
अन्ना हजारे या बाबा रामदेव किसी पार्टी या किसी लोकतांत्रिक संस्था के निर्वाचित जनप्रतिनिधि नहीं थे किंतु इन जैसे तटस्थ जनों को जनहित एवं राष्ट्रहित के मुद्दों पर अनशन तथा भूख हड़ताल जैसे आंदोलन करने पड़ रहे हैं एवं समूचा शासनतंत्र तथा गुप्तचर संस्थाएं इन आंदोलनों को असफल बनाने में सक्रिय है। यह लोकतंत्र की बहुत बड़ी विफलता है। अन्ना हजारे या बाबा रामदेव को देश व्यापी जनसमर्थन मिला, मतलब जनता भी यही चाहती है।
मेरा मानना यह है कि आदर्श लोकतंत्र तो यह होता कि मेरे जैसा कोई साधारण एक व्यक्ति भी यदि देशहित का एक सुविचार रखता तो उसे सत्ता एवं विपक्ष का खुला समर्थन मिल सकता। आखिर ग्राम सभा स्तर पर जो खुली प्रणाली हम विकास के लिये अपना रहे हैं, उसे राष्ट्रीय स्तर पर क्यों नहीं अपनाया जा सकता?
इन अनुभवों से यह स्पष्ट होता है कि हमारी संवैधानिक व्यवस्था में सुधार की व्यापक संभावना है। दलगत राजनैतिक धु्व्रीकरण एवं पक्ष विपक्ष से ऊपर उठकर मुद्दों पर आम सहमति या बहुमत पर आधारित निर्णय ही विधायिका के निर्णय हो, ऐसी सत्ताप्रणाली के विकास की जरूरत है।
इसके लिए जनशिक्षा को बढ़ावा देना तथा आम आदमी की राजनैतिक उदासीनता को तोडऩे की आवश्यकता दिखती है। जब ऐसी व्यवस्था लागू होगी, तब किसी मुद्दे पर कोई 51 प्रतिशत या अधिक जनप्रतिनिधि एक साथ होंगे तथा किसी अन्य मुद्दे पर कोई अन्य दूसरे 51 प्रतिशत से ज्यादा जनप्रतिनिधि, जिनमें से कुछ पिछले मुद्दे पर भले ही विरोधी रहे हो साथ होंगे तथा दोनों ही मुद्दे बहुमत के कारण प्रभावी रूप से कानून बनेंगे।
क्या हम निहित स्वार्थों से ऊपर उठकर ऐसी आदर्श व्यवस्था की दिशा में बढ़ सकते हैं एवं संविधान में इस तरह के संशोधन कर सकते हैं। यह खुली बहस का एवं व्यापक जनचर्चा का विषय है जिस पर अखबारों, स्कूल, कालेज, बार एसोसियेशन, व्यापारिक संघ, महिला मोर्चे, मजदूर संगठन आदि विभिन्न विभिन्न मंचों पर खुलकर बातें होने की जरूरत हैं जिससे इस तरह के जनमत के परिणामों पर पुनर्चुनाव की अपेक्षा मुद्दों पर आधारित रचनात्मक सरकारें बन सकें जिनमें दलों की तोड़ फोड़, दल बदल या निर्दलीय जन प्रतिनिधियों की कथित खरीद फरोख्त घोड़ों की तरह न हो बल्कि वे मुद्दों पर अपनी सहमति के आधार पर सरकार का सकारात्मक हिस्सा बन सकें। गठबंधन का गणित दलगत न हो, मुद्दों पर हो।
- विवेक रंजन श्रीवास्तव

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