मुद्दा: भारत का इकतरफा संघर्ष विराम-क्या अच्छा होगा अंजाम

मुद्दा: भारत का इकतरफा संघर्ष विराम-क्या अच्छा होगा अंजाम

महबूबा मुफ्ती की अपील पर केंद्र सरकार द्वारा इकतरफा बिना शर्त संघर्ष विराम की घोषणा करने की कुछ लोगों को छोड़कर अधिकाँश लोगों द्वारा आलोचना की जा रही है। राजनीति, युद्ध और अनवरत संघर्ष की बारीकियों से अपरिचित जनसाधारण के लिए यह एक दोषपूर्ण फैसला हो सकता है। होना भी चाहिए। वह समझ रही है कि जब, भारतीय सेना आतंकवादियों की कमर लगभग तोड़ चुकी है, तब इस प्रकार संघर्षविराम करके क्या केंद्र ने, महबूबा मुफ्ती जिन्हें स्वयं आतंकवादियों का छद्म समर्थक माना जाता रहा है, की चतुराई भरी राजनैतिक चाल के फेर में आकर केंद्र को इस तरह का आत्मघाती कदम नहीं उठाना चाहिए था।

बात किसी हद तक सही भी है। आज तक इस तरह के जितने भी संघर्ष विराम हुए हैं, उनसे आतंकवादियों को आक्सीजन और भारतीय सुरक्षा बलों को अपूरणीय क्षति ही हुई है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी आतंकवादियों के कई गुटों ने इस संघर्ष विराम को मानने से इनकार कर दिया है और हमले जारी रखे हैं। ऐसे में इस प्रकार का आत्मघाती निर्णय जो बिना मोदी की सहमति के नहीं लिया गया होगा, क्या उचित कहा जा सकता है ?
यह शाश्वत सत्य है कि किसी भी बात के दो पक्ष होते हैं, एक सकारात्मक और एक नकारात्मक। भारत सरकार में कदम-कदम पर अनेक विषय विशेषज्ञ तमाम पत्रवलियों और रणनीतियों के पुलंदे लिए बैठे हैं। स्वयं 'मोदी नामक प्रधानमंत्री' हर ऐसे विषय जिसकी राष्ट्रीय महत्ता हो या चाहे वह किसी भी राज्य से सम्बन्धित हो, की गहन समीक्षा अपनी व्यस्तताओं के बावजूद गम्भीरता से करते हैं और परिपक्व निर्णय लेते हैं। इस विषय में भी उन्होंने निश्चित रूप से गहन और आंतरिक समीक्षा शासन के नीति विशेषज्ञों के साथ मिलकर की होगी और इसे राष्ट्रहित में उचित और दूरगामी लाभ का पाकर ही यह निर्णय लिया होगा, ऐसा माना जा सकता है।
इतने लंबे समय से देश के लिए नासूर बने इस रोग के इलाज के लिए किसी सरकार ने इस समस्या के स्थाई निराकरण का गम्भीरता से प्रयास करना तक उचित नहीं समझा। अपना कार्यकाल निर्विवाद और शान्ति से कट जाए, बस यही उद्देश्य लेकर सब अपना-अपना कार्यकाल काट कर आते जाते रहे। इस छद्म शान्ति के लिए वह कुतर्कों का सहारा लेकर एक ओर राष्ट्रीय हितों की बलि चढ़ाते रहे, यहाँ तक कि वे अलगाववादियों को शाही सुविधाएं और एक आकर्षक राशि मासिक रूप से बांधते रहे किन्तु इस बार स्थिति दूसरी है। मोदी सरकार ने इस बार इस समस्या को गम्भीरता से लिया है और वह इस समस्या के अस्सी प्रतिशत निराकरण के नजदीक पहुंच चुकी है।
उसने एक एक कर समस्या की जड़ों को काटना प्रारम्भ करने की, नीति पर काम किया और पहले कदम के रूप में पाकिस्तान से सम्बन्ध सुधारने के प्रयास प्रारम्भ किये भले ही वहां पर सेना का दखल ज्यादा होने के कारण वह राजनैतिक रूप से इतने सफल न रहे हों जितने की अपेक्षा की जा रही थी किन्तु पाकिस्तान में एक ऐसा वर्ग सशक्त हुआ जो भारत से दोस्ती चाहता है ताकि पाकिस्तान भी समृद्ध और समर्थ बन सके। दूसरे कदम के रूप में भारत सरकार पूरी शिद्दत के साथ पाकिस्तान के समर्थक देशों से अपने सम्बन्ध बढ़ाने में जुट गयी और उन्हें यह समझाने में सफल रही कि उनके दिए पैसे से पाकिस्तान पूरी दुनिया और विशेषकर कश्मीर में आतंकवादियों का पोषण कर रहा है।
स्थिति आज सामने है। पाकिस्तानी क्षेत्र में घुस कर आतंकवादी अड्डे को समाप्त करने पर किसी भी देश ने भारत को गलत नहीं कहा। तीसरे कदम के रूप में केंद्र ने आतंकवादियों और अलगाववादियों की छद्म समर्थक पीडीपी से समझौता कर उसे ही दूध की रखवाली करने पर नियुक्त कर दिया। इस नीति ने जहां राजनैतिक विश्लेषकों को हतप्रभ करके रख दिया, वहीं भाजपा को सत्तालोलुप होने के आरोपों की पत्थरबाजी को भी सहने का साहस दिखाना पड़ा। परिणाम सामने हैं। दूरगामी परिणामों के चलते यह निर्णय भी सही साबित हुआ। भाजपा विरोधियों और अलगाववादियों ने कश्मीर को जलाने के बहुत प्रयास किये किन्तु अंतत: जनसमर्थन पीडीपी प्रमुख महबूबा के प्रयास से ही पटरी पर आया।
वस्तुत: भाजपा के नीतिनिर्धारक यह पहले ही जान चुके थे कि कश्मीर समस्या का समाधान सैन्य बल नहीं है। पिछली सरकारों की दोषपूर्ण नीतियों के चलते बंदूक के बल पर शान्ति संस्थापन की नीति कश्मीर के लिए घातक सिद्ध हुई है। ऊपर से तो कश्मीर शांत बना रहा और अंदर-अंदर उसका युवावर्ग धधकता रहा। पाक सरकार रूपी सांप को बार-बार घायल करके जिंदा छोड़ देने की नीति भी देश के लिए घातक रही। उसने पूर्वी बंगाल के अंगभंग का बदला कश्मीर से लेने की नीति पर पूरा जोर लगा दिया और घाटी में मुस्लिम मानसिकता के प्रसार के लिए कई अन्य मुस्लिम देशों के सहयोग से घाटी में मस्जिदों का जाल बिछा दिया। सही मायनों में ये मस्जिदें पृथकतावाद की प्राथमिक पाठशालाएँ बनीं और इन्होंने एक पूरी पीढ़ी को भारत विरोधी और पाक समर्थक बना दिया। यही भारत विरोधी नई पीढ़ी पाकिस्तान से आतंकवाद की सैनिक ट्रेनिंग लेकर भारतीय सैन्यबलों की नाक में दम करने की पाक-नीति पर चल रही है। आज आतंकवाद अधिकाँश कश्मीरी युवकों की नस-नस में भर चुका है और रक्तबीज का स्वरूप ग्रहण कर चुका है। अब यह सैन्य समस्या नहीं सामाजिक समस्या का स्वरूप ले चुका है।
इसके लिए चौथा कदम भारत सरकार ने यह उठाया कि उसने पाकिस्तान में अपने नागरिक अधिकारों और स्वतंत्र अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे पंजाबी विरोधी गुटों को समर्थन और सहायता देकर उनकी समस्याओं को अपने दूतावासों के माध्यम से पूरे विश्वपटल पर लाकर उजागर कर दिया और उसकी असलियत को राष्ट्र संघ में उजागर कर क्या जिससे पाकिस्तान बैकफुट पर आ गया और उसकी फ्रंट फुट पर बल्लेबाजी बंद हो गयी। वह अपने ही जाल में फंस गया। पांचवें पग के रूप में यह कहा जा सकता है कि इस समस्या का निराकरण सामाजिक समस्या के रूप में ही किया जाना उचित होगा। यह पहेली मोदी सरकार लगभग हल कर चुकी है। इसीलिए वह कभी गरम कभी नरम की नीति पर चल रही है। सबसे पहले उसने पीडीपी से समझौता कर आतंकवाद और अलगाववाद के व्यापक जनसमर्थन को खंडित कर अलगावादियों को किनारे किया और फिर पूरी ताकत से आतंकवाद के सफाए के लिए सेना को खुली छूट दी। इसमें भी केंद्र को रिकार्ड सफलता प्राप्त हुई और आतंकवाद की कमर लगभग टूट ही गयी।
इस नीति से एक और उपलब्धि केंद्र को प्राप्त हुई स्थानीय पुलिस के सहयोग के रूप में केन्द्रीय बलों की चहुंमुखी सहायता। आज तक स्थानीय पुलिस को आतंकियों और अलगाववादियों का मूक समर्थक माना जाता था। यह पहली बार हुआ कि स्थानीय पुलिस ने सैन्यबलों का खुल कर साथ ही नहीं दिया, उसके साथ मोर्चेबंदी को भी अंजाम दिया। आज की स्थिति में लगता है कि सैन्य बल जेके पुलिस का विश्वास प्राप्त करने में सफल रहे हैं जो अभूतपूर्व कहा जा सकता है।
छठे पग के रूप में वर्तमान केंद्र सरकार पिछली सरकारों से उलट समस्या को रंगीन चश्मे से नहीं, नजर के चश्मे से देख रही है ताकि वह कश्मीरियों के दिलों पर लिखी बारीक इबारत को पढ़ सके। इसके लिए वह पत्थरबाजों पर बुलेट प्रयोग बंद करती है। हजारों पत्थरबाजों को आम माफी देने की सहमति देती है और रमजान के पवित्र महीने में बिना शर्त इक तरफा संघर्षविराम घोषित करती है। निश्चित रूप से इन तीनों निर्णयों का आतंकवादियों की कारगुजारियों पर कोई असर हो या न हो, कश्मीर की जनता के दिलों पर एक बहुत सकारात्मक प्रभाव होगा।
सातवें पग के रूप में केंद्र सेना और घाटी के लोगों के बीच की दूरियों को समाप्त करने का प्रयास कर रही है। सैनिक शिविरों में बच्चों की कोचिंग, सेना में भर्ती को वरीयता, खेलकूद प्रशिक्षण, सामाजिक और धार्मिक समारोहों में सहभागिता, दैवी आपदाओं में निस्वार्थ भाव से सेवा और भी न जाने क्या क्या करके सेना कश्मीरी आवाम विशेषरूप से युवा और बालक वर्ग के दिलों से अपने लिए वर्षों से भरी नफरत को कम या फिर खत्म करने के प्रयास कर रही है।
आठवें पग के रूप में केंद्र सरकार इस बात पर बल दे रही है कि अधिक से अधिक युवा देश की विभिन्न गतिविधियों और सेवा परीक्षाओं में सहभागिता कर उनसे जुड़ें। इसके लिए कश्मीर के बच्चों और युवाओं को देश दर्शन के विभिन्न अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं और उनको मानसिक रूप से देश की विभिन्न संस्कृतियों के सार्थक समन्वय से अवगत कराकर उन्हें परिचित कराया जा रहा है कि विभिन्न संस्कृतियों के बीच किस तरह अपनी संस्कृति बचा कर रहा जा सकता है। इस तरह उन्हें बताया जा रहा है कि देश में विभिन्नताओं के होते हुए भी इस देश के मुस्लिम अन्य मुस्लिम धर्मी देशों के मुकाबले कितने समृद्ध और सुरक्षित हैं।
हम परीक्षण कर चुके हैं कि पूर्वोत्तर और पंजाब में विद्रोहियों को राजनैतिक हल और जनसहयोग से किस तरह शांत किया जा सकता है और आज स्थिति हमारे सामने है कि वर्षों में इक्कादुक्का घटना को छो़कर इन प्रान्तों में देश से समन्वय की भावना मुखर रूप से आ गयी है और वे देश के अन्य लोगों के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रहे हैं। बस इसी प्रयोग को मोदी सरकार कश्मीर में भी सफल बनाना चाहती है और इसमें वह काफी हद तक सफल भी हो रही है।
अपनी इस नरम नीति का आभास प्रधानमंत्री मोदी ने विगत स्वतंत्रता समारोह के शुभ अवसर पर लाल किले की प्राचीर से सम्बोधित करते हुए ही कर दिया था। उन्होंने कहा था, 'न गोली से, न गाली से, कश्मीर की समस्या गले लगाने से सुलझेगी।' प्रधानमंत्री के इस फैसले से जहां कश्मीर समस्या के हल में आसानी होगी, वहीं भाजपा से समझौता करने और शासन चलाने में आ रही दुश्वारियों से दो चार होकर अपना जनसमर्थन दांव पर लगा रही महबूबा मुफ्ती की छवि में भी निश्चित सुधार आएगा और वे कश्मीर में शान्ति के अनेक पग और नीतियाँ अमल में ला सकेंगी। कश्मीर में प्रधानमंत्री के दौरे से पूर्व इस घोषणा से विरोधियों द्वारा भाजपा और मोदी की पूर्व में बनाई जा चुकी मुस्लिम विरोधी छवि में भी सुधार आएगा, यह आभास हो रहा है। कुल मिला कर यह कहा जा सकता है कि कश्मीर में शान्ति के लिए अब तक किये गये प्रयासों में यह आठों पग और बिना शर्त संघर्ष विराम एक बहुत बड़ा पग है।
कश्मीर की, अपने धर्म के लिए समर्पित जनता में इसका एक सार्थक और सकारात्मक संदेश जाएगा इसमें कोई संशय नहीं है। हमें यह भी ध्यान रखना है कि यह बिना शर्त संघर्ष विराम इस चेतावनी के साथ किया गया है कि सेना के लिए अपनी और जनता की सुरक्षा पहले है और संघर्ष विराम बाद में इसे आतंकवादी भी याद रखेंगे, हमें इस पर विश्वास करना चाहिए। हमें यह भी विश्वास करना चाहिए कि मोदी के चौतरफा राजनैतिक और सामाजिक सुधारों के ये प्रयास बहुत जल्दी ही घाटी में शान्ति स्थापित करने में सफलता के आयाम स्थापित करेंगे। छिटपुट घटनाओं के लिए तो हमें तैयार रहना ही पड़ेगा क्योंकि अलगाववादी और आतंकी सरगना इतनी आसानी से नहीं सुधरेंगे।
- राज सक्सेना

Share it
Top