मुद्दाः वहशियत - कठुआ से उन्नाव तक

मुद्दाः वहशियत - कठुआ से उन्नाव तक

एक बार फिर देश सदमे में है। 'यत्र नार्यस्तु पूज्यंते' के देश में एक विधायक पर न केवल एक लड़की के साथ बलात्कार का आरोप है अपितु आरोप यह भी है कि उसने खुद को बचाने के लिए उसी लड़की के पिता को भी पुलिस कस्टड़ी में ही मरवा डाला। सहसा यकीन ही नहीं होता कि एक लोकतांत्रिक देश में मुंह खोलने का अंजाम इतना खतरनाक भी हो सकता है मगर ऐसा कोई पहली बार नहीं हो रहा है। गाहे बगाहे इस देश में ऐसे कारनामें, ऐसे हादसे,
ऐसे घिनौने कृत्य प्रकाश में आते ही रहते हैं।
प्राय: हार्ड कोर किस्म के अपराधी जब ऐसे कारनामों को अंजाम दे जाते हैं तब रुह तो कांपती है, डर तो लगता है पर फिर प्रशासनिक फेल्योर मानकर हम संतोष कर लेते हैं, मन मार लेते हैं। कुछ उत्साही कुछ राजनैतिक हंगामे बाज अपने अपने लक्ष्य के साथ कैंडलमार्च जैसे आयोजन करते हैं और जीवन फिर से उसी ढर्रे पर लौट आता है। ऐसा लगता है ऐसे हादसे होना और सहना इस देश की आम जनता की नियति बन चुकी है।
मगर बड़ा धक्का तब लगता है जब ऐसे घिनौने प्रकरणों में किसी जन प्रतिनिधि का न केवल नाम आता है अपितु उस पर सत्ता व विपक्ष जमकर राजनीति करते हैं बिना यह सोचे कि इसका आम आदमी, देश और उनकी अपनी ही इमेज पर क्या असर पड़ेगा। इस बार भाजपा के उन्नाव के विधायक कुलदीप सेंगर इस प्रकरण के अपराधी बताए जा रहे हैं। लड़की चीख चीख कर कह रही है कि उसके साथ न केवल विधायक ने अपितु उसके भाई ने अपने साथियों के साथ इसलिए बलात्कार किया क्योंकि उसके परिवार के साथ विधायक के परिवार का लंबा विवाद चल रहा है जबकि विधायक व उसके समर्थक भी लगातार इस आरोप को राजनीति से प्रेरित व झूठा बता रहे हैं। उनके समर्थक उनके समर्थन में सड़कों पर भी उतर रहे हैं। अब सच क्या है, कौन कितना व किस तरह का सच बोल रहा है यह कहना मुश्किल है पर एक बात तो है कि सार्वजनिक जीवन से शुुचिता नाम की चिडिय़ा अब उडऩ छू हो गई दिखती है।
उन्नाव प्रकरण में एक लड़की भला क्यों चीख- चीख कर कहेगी कि 'उसके साथ बलात्कार हुआ है जबकि हुआ न हो' की बात यदि पीडि़त के पक्ष में है तो उसके व विधायक के परिवार के बीच चल रहा 'लंबा विवाद' कुछ और ही किस्सा होने का अंदेशा भी पैदा करता है। खैर, लंबी जद्दोजहद व छिछालेदारी के बाद प्रकरण घटना के एक साल बाद सी बी आई के पास भेज दिया गया है या फिर यूं कहिए कि चुनावी साल के चलते भेजना पड़ा है।
विधायक सी बी आई की कस्टडी में चले गए हैं। वे नार्को टेस्ट के लिए तैयार हैं। उनका हो रहा है पर लड़की जो पहले 'सब कुछ के लिए तैयार हूं' जैसे बयान दे रही थी, आज नार्को टेस्ट देने से इंकार करने में लगी है। अब ऐसा क्यों ? यह भी सवाल पैदा करता है।
उधर उन्नाव केस की सनसनाहट खत्म होने से पहले ही कठुआ में एक और वीभत्स बलात्कार ने लोकतंत्र के मुंह पर जोरदार तमाचा जड़ दिया है। महज आठ साल की आसिफा नाम की लड़की के साथ गैंगरेप के बाद उसकी हत्या कर देने का रुह कंपा देने वाला प्रकरण सामने आया है। इस केस में भी राजनीति व धर्म आग लगाने का खेल रहे हैं। कश्मीर की पी डी पी और भाजपा के सरकार के ही मंत्रियों का बलात्कार के हिन्दू आरोपी के पक्ष में होने वाले प्रदर्शन में भाग लेना अचंभित करता है। इस का लाभ लेने के लिए विपक्ष में बैठी सत्ता के लिए व्यग्र दिखती कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियों का कोहराम मचाना उनकी भी नीयत पर शक पैदा करता है। हालांकि भाजपा की तरफ से राम माधव ने डेमेज कंट्रोल का खेल मंत्रियों के इस्तीफे दिलवा कर खेल दिया है पर विपक्ष इस प्रकरण को साफ साफ 2019 को निशाने पर रख भुनाने पर तुला है, एक बार फिर से बिना यह सोचे कि इसका आम जनता, देश व उसकी अपनी ही इमेज पर क्या असर पड़ेगा।
किसका प्रतिशोध था, कौन पिसा, कौन पीडि़त हुआ, किसने बलात्कार का दंश झेला और कौन उसका फायदा उठा रहा है? ये सारे प्रश्न कुछ ही संवेदनशील लोगों का परेशान करते हैं बाकी तो सब चलता ही रहता है।
हां, फिर एक गहरा दाग देश को लगा है जिससे बचा जा सकता था। एक बार फिर से एक युवा लड़की, एक बच्ची दरिंदगी का शिकार हुई है। एक बार फिर से सारा देश शर्मसार है, आम आदमी में गुस्सा है। उसके जेहन में हजारों सवाल किसी सांप की मानिंद डस रहे हैं। अच्छे दिन, 21 वीं सदी, युवाओं का देश, संसार की सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था, कितने भी जुमले उछालिए पर अगर हम अपने ही देश में अपनी ही मां, बहन, बेटियों की इज्जत सुरक्षित न रख सकें तो ये सब बेमानी हो जाता है। देश को, देश की बेटियों को सुरक्षित रखने, बेखौफ कहीं भी आने जाने के सारे दावे हर दल की सरकार में व्यर्थ जा रहे हैं और दरिंदगी का खेल जारी है। कानून अपनी जगह और उसका क्रियान्वयन अपनी जगह। अब चाहे दरिंदगी दिखाने वालों को फांसी दें या उम्र कैद पर जो जख्म लड़की को मिलते हैं उनकी भरपाई कोई भी नहीं कर सकता। अब तो कुछ ऐसा किए जाने की जरुरत है कि ऐसा होना रुके। उसे सरकार करे, समाज करे या फिर कोई और पर ऐसा अब होना ही चाहिए।
जब समाज संवेदनहीन हो, रिश्ते कमजोर व चारों ओर स्वार्थी और कामुक लोग हों तब अकेली लड़की का जीना दुष्वार हो ही जाता है,,.....। इस प्रगति की अंधी दौड़ व भौतिकता में खोती संवेदनाओं व घटते मानवीय मूल्यों और टूटती बिखरती मर्यादाओं की सबसे ज्यादा मार लड़की पर ही पड़ी है। उसके उत्थान का ढोल हम भले ही पीटते रहें पर आज भी स्त्री सुरक्षा की हालत बद से भी बदतर है।
अभी अभी कठुआ में घटी गैंगरेप की घटना दिल फाड़ देने वाली है। बलात्कार केवल शरीर पर नहीं होता वह आत्मा के साथ भी होता है और एक आठ साल की बच्ची को ड्रग्स देकर, भूखी रखकर आतंकित करके बलात्कार करने वाला हिन्दू या मुसलमान नहीं केवल एक बलात्कारी, एक हैवान होता है। वह किसी भी धर्म का नहीं हो सकता। उसे तो इंसान तक कहलाने का अधिकार नहीं है। उसकी हिमायत करने से पहले बेहतर होता दलों की राजनीति करने वाले सौ बार सोचते, सोचते कि उस बच्ची के मां बाप और बाकी देश क्या सोचेगा उनकी इस हिमायत के बारे में और इससे भी ज्यादा क्या उनकी आत्मा रोई नहीं ऐसा कृत्य करने से पहले।
- घनश्याम बादल

Share it
Top