मुद्दा: चिंताजनक है एससी-एसटी कानून का दुरूपयोग

मुद्दा: चिंताजनक है एससी-एसटी कानून का दुरूपयोग

समाज की समस्याओं को दुरूस्त करने के लिए कानून के रूप में जब भी सरकारी पहल हुई है, उस कदम का परिणाम एक नए विद्रूप में दिखा है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति व जनजाति कानून का दुरूपयोग रोकने के लिए एक अहम व्यवस्था दी। उसने कहा कि एससी-एसटी कानून के तहत प्रताडऩा की शिकायत मिलने पर तत्काल प्राथमिकी दर्ज नहीं होगी। पहले डीएसपी शिकायत की जांच करेंगे कि मामला फर्जी या किसी दुर्भावना से प्रेरित तो नहीं है। इसमें गिरफ्तारी से पहले एसएसपी की मंजूरी लेनी होगी। कानून का तकाजा भी है कि सौ गुनहगार बच जाएं लेकिन एक बेगुनाह को सजा न हो। शायद इसीलिए इस कानून के बढ़ते दुरूपयोग को रोकने के लिए शीर्ष अदालत ने यह व्यवस्था दी है।
यह पहली बार नहीं है जब सामाजिक मसलों पर बनाए गए कानूनों के दुरूपयोग को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट को आगे आना पड़ा है। दहेजरोधी कानून हो या घरेलू हिंसा रोकथाम कानून, सभी के दुरूपयोग की बातें जगजाहिर हैं। पिछले साल जुलाई में 15.6 फीसदी की दोषसिद्धि की दर को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दहेज कानून(धारा 498ए) को लेकर भी इसी तरह की टिप्पणी की थी। दरअसल किसी पीडि़त को मदद पहुंचाने के नेक मकसद से कभी ये तमाम कानून बनाए गए लेकिन बाद में इसके बढ़ते दुरूपयोग ने इन कानूनों का असली मकसद ही छीन लिया। ऐसे में इन कानूनों के अनुभव बताते हैं कि सामाजिक समस्याओं को ठीक करने की पहल कानून-कायदे से ज्यादा समाज को सशक्त बनाकर की जाने की दरकार है। जितना ज्यादा लोग जागरूक होंगे, सामाजिक कुरीतियां उतनी ही जल्दी दम तोड़ती दिखेंगी।
डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर भी जातिगत नफरत के विष से वाकिफ थे। उन्होंने 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में दिए गए अपने भाषण में कहा था कि भारत में जातियां हैं। जातियां राष्ट्रविरोधी होती हैं क्योंकि सबसे पहले ये सामाजिक जीवन में विघटन लाती हैं। एससी-एसटी कानून के तहत 2016 में दर्ज शिकायतें और उसके निस्तारण के क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े देखें तो पता चलता है कि पुलिस जांच में एससी पर अत्याचार के 5347 और एसटी के 912 केस झूठे पाए गए। इसके अलावा 2015 में अदालतों ने एससी-एसटी एक्ट के कुल 15638 मुकदमों का निस्तारण किया जिसमें से 11024 मामलों में अभियुक्त बरी या आरोपमुक्त हुए। 495 मुकदमें वापस ले लिए गए सिर्फ 4119 मामलों में अभियुक्तों को सजा हुई।
यह स्थापित तथ्य है कि समाज में जब से कानून बने हैं तब से उनका सदुपयोग और दुरूपयोग दोनों ही होते रहे हैं। कानून को शिथिल कर हम अपने नागरिकों को क्या संदेश दे रहे हैं? क्या हमने अपने संविधान की प्रस्तावना में सामाजिक न्याय की अवधारणा को केवल दिखावे के लिए रखा है? क्या इससे सामाजिक न्याय की लड़ाई कमजोर नहीं होगी? आखिर भारतीय संसद को ऐसा कड़ा कानून बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? मारपीट, लड़ाई-झगड़ा करने वालों का पेशेवर गुट अक्सर अपने साथ एक-दो लोग अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के रखते हैं जिससे झगड़े की शिकायत उन्हीं लोगों की ओर से दर्ज कराई जाए और दूसरा पक्ष कानून के कड़े प्रावधानों का शिकार हो।
अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों के साथ सामाजिक भेदभाव की खबरें देश के तमाम हिस्सों से आती रहती हैं। इनके साथ होने वाले अपराधों में भी साल दर साल बढ़ोत्तरी हो रही है लेकिन इस तथ्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि कानून का बड़े पैमाने पर दुरूपयोग भी हो रहा है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में आपसी वैमनस्य को जातीय समीकरणों से जोड़कर कानूनी जामा पहना दिया जाता है। कानून बना था कमजोर और सदियों से सताए जा रहे लोगों को बराबरी, सम्मान, इंसाफ और आत्मविश्वास देने के लिए। कानून की मंशा उन्हें शक्ति संपन्न कर जातिगत घृणा और भेदभाव से मुक्ति देने और सामाजिक हैसियत ऊपर उठाने की थी लेकिन इसी कानून के दुरूपयोग का जिक्र करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा है कि कानून जातिगत नफरत बढ़ाने वाला नहीं होना चाहिए क्योंकि इसका समाज की एकता और संवैधानिक मूल्यों पर विपरीत असर पड़ता है। कानून पीडि़तों को न्याय दिलाने का जरिया बने, इससे तो सहमत हुआ भी जा सकता है लेकिन इस कानून के दुरूपयोग का समर्थन शायद ही कोई करे। अदालत ने सही निष्कर्ष निकाला कि कानून बनाते समय संसद को इसके दुरूपयोग की आशंका नहीं रही होगी। यह बात सही है कि देश में शायद ही कोई कानून ऐसा हो जिसका दुरूपयोग नहीं होता। न्यायालय ने कहा है कि इस कानून का दुरूपयोग बढ़ गया है और राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो(एनसीआरबी) के आंकड़े इसके प्रमाण हैं। एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि 15-16 प्रतिशत मामलों में तहकीकात के बाद बंद करने वाली रिपोर्ट लग जाती है और अदालत तक आए 75 प्रतिशत मामलों में अभियुक्त या तो बरी हो जाते हैं या मुकदमे वापस हो जाते हैं। इससे आशंका बनती है कि राजनीतिक दुश्मनी के चलते किसी बेगुनाह को परेशान या ब्लैकमेल करने के लिए मुकदमें लगाए गए हों।
सवाल इस दुरूपयोग को रोकने का है। देश की शीर्ष अदालत के कहे बिना भी पुलिस मामले की पहले जांच कर सकती थी। कानून कोई भी क्यों न हो, किसी शिकायत की जांच किए बिना गिरफ्तारी को तर्कसंगत नहीं ठहराया जा सकता। जितनी शिकायतें कमजोरों को सताने की आ रही हैं उतनी ही उनके द्वारा निर्दोषों के खिलाफ कानून को हथियार की तरह इस्तेमाल कर वैमनस्य और बदला लेने की आ रही हैं। सौ टके का सवाल ये है कि क्या सामाजिक समस्या का निराकरण कानून से हो सकता है। क्या कानून की परफारमेंस आडिट नहीं होनी चाहिए? समय-समय पर कानून की समीक्षा होनी चाहिए ताकि पता चल सके कि जिस उद्देश्य से कानून लाया गया था वो उसमें कितना सफल रहा और ये भी पता चले कि कहीं कानून से समस्या का रूप तो नहीं बदल गया। कानून का दुरूपयोग करने वालों के खिलाफ सख्ती किए बिना असली पीडि़तों को इसका लाभ नहीं मिल सकता। सरकारों को आगे आकर तमाम कानूनों में हो रहे दुरूपयोग को रोकने की व्यवस्था करनी चाहिए। हर काम अदालत के भरोसे छोडऩे की प्रवृत्ति भी ठीक नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून के संदर्भ में गिरफ्तारी और हिरासत में रखने को लेकर भी कई सवाल खड़े किए हैैं। मतलब साफ और सीधा है। सर्वोच्च न्यायालय चाहता है कि दलित और वंचितों को न्याय दिलाने के लिए बने कानून का दुरूपयोग रोकना पुलिस का भी काम है और सभी अदालतों का भी।
-नरेंद्र देवांगन

Share it
Top