बहू को बेटी के समान समझें

बहू को बेटी के समान समझें

बहू पराये घर की बेटी होती है। वह अपने माता-पिता, भाई-बहन सबको छोड़कर ससुराल में आती है। ससुराल में सबसे उसका नया रिश्ता बनता है। सब उसके लिए नये नये और अजनबी होते हैं। सबकी आदत और स्वभाव को पहचानने में उसे थोड़ा समय लगता है।
ससुराल में बहू संकोच व लज्जा के साथ रहती है। किसी भी कार्य में गड़बड़ होने की आशंका से वह ससुराल वालों की प्रताडऩा और लड़ाई-झगड़े के भय से आतंकित रहती है।
प्राय: ससुराल में बहू और सास में अनबन रहती है। बात-बात पर सास-बहू को डांटती रहती है। बहू का कोई भी काम उसे पसंद नहीं आता, इसलिए बहू सहमी-सहमी सी रहती है।
बहू पराये घर की बेटी होती है। वह लक्ष्मी के रूप में बहू बनकर ससुराल में आती है। उससे मार-पीट, लड़ाई झगड़ा और भेदभावपूर्ण व्यवहार शोभा नहीं देता। उसके साथ इस प्रकार व्यवहार करना चाहिए जिससे वह ससुराल को अपने घर जैसा समझने लगे। उसके मन में किसी प्रकार की हीन भावना तथा आशंका न रहे।
इसके लिए यह आवश्यक है कि ससुराल में बहू को बेटी के समान महत्त्व दें। तभी वह ससुराल में अपने-अपको स्वतंत्र और निर्भीक महसूस कर सकेगी।
यदि बहू से कोई गलती हो जाये तो उसे प्यार से समझाना चाहिए। दूसरी बार वह गलती नहीं करेगी। कहा जाता है कि तलवार का घाव भर सकता है परन्तु वाणी का घाव कभी नहीं भरता।
कई बार सास क्रोधवश बहू को ऐसे शब्द कह देती है जो उसे नहीं कहने चाहिएं। बहू के लिए कटु-कठोर, अशोभनीय अपशब्दों का प्रयोग कदापि नहीं करना चाहिए।
-महेन्द्र सिंह शेखावत

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