कन्याएं अभिशाप नहीं

कन्याएं अभिशाप नहीं

नए युग में कन्याएं लड़कों के समान ही उन्नतिशील हैं। वे शिक्षित हैं। समाज के प्रति अधिक संवेदनशील हैं। आज वे कार्यशील हैं और माता-पिता का सहारा बन रही हैं। लड़कियां उच्च पदों पर भी आसीन हो रही हैं। चाहे राजनीति हो, पत्रकारिता हो अथवा अध्यापन हो, वे सभी कार्यक्षेत्रों में बढ़ चढ़कर काम कर रही हैं। वे जहाज उड़ा रही हैं, सेना में कमान संभाल रही हैं। डॉक्टर, इंजीनियर बनकर वे देश के विकास में भागीदारी निभा रही हैं।
समाज-सेवा में भी लड़कियां पीछे नहीं हैं। प्रगतिशील होने के बावजूद कन्या जन्म पर पाबंदी दुर्भाग्यपूर्ण है। रूढि़वादी मानसिकता वाले चंद लोग न जाने क्यों ऐसी कुसंस्कृति को सुसंस्कृत देश में बढ़ावा दे रहे हैं।
प्रसव पूर्ण निदान लिंग-चयन प्रतिषेध अधिनियम के तहत गर्भस्थ शिशु के लिंग परीक्षण पर रोक है। इस कारण भ्रूण हत्याओं के साथ ही अनिच्छित नवजात कन्याओं के प्रति क्रूरता की घटनाएं घटित हो रही हैं। पूर्ण-अपूर्ण भू्रणों एवं नवजात कन्याओं को कचरापात्रों, झाडिय़ों, अस्पतालों या नालों के आसपास फेंकने की कई घटनाएं देश के कुछेक हिस्सों में हुई हैं।
इस अमानवीय कृत्य के विरुद्ध आवाज बुलंद करना आज की जरूरत बन पड़ी है। इसमें सरकार और सरकारी-एजेंसियों के प्रयासों के साथ ही महिलाओं, समाजसेवियों, संत-महंतों, पत्रकारों, राजनेताओं, परिवारीजनों और समाज के वरिष्ठों को भी अपनी-अपनी भागीदारी तय करनी चाहिए ताकि भ्रूणों एवं नवजात कन्याओं के प्रति मारक दुस्साहस पर विराम लग सके।
भारतीय संस्कृति में नारी को पूज्य माना गया है, उसी नारी बीज के विनाश की कुप्रथा संस्कृति में दाग लगा रही है। इसके चलते कितनी ही मांओं से उनके समूह की संतति छीनी जा रही है। इस कृत्य से प्रति हजार पुरूषों पर स्त्री संख्या का अनुपात बिगड़ गया है।
ऐसा घृणित अपराध करने वाले स्त्री-पुरूष सृष्टि क्रम को बाधित करने के दोषी हैं। ऐसे अपराधियों को खोजकर दंड देने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, ताकि सृष्टि-वृद्धि की धरोहर कन्याओं का जीवन सम्मानपूर्ण और निष्कंटक हो सके।
- सतीश कुमार कुलश्रेष्ठ

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