महिलाओं के हक में एक और बेहतरीन फैसला

महिलाओं के हक में एक और बेहतरीन फैसला

देश में हजारों-लाखों ऐसी महिलाएं होंगी जो अकेले दम पर अपने बच्चों की परवरिश कर रही हैं। इनमें से बहुत सी ऐसी महिलाएं हैं जिनके पति की मौत हो चुकी है। बहुत सी ऐसी महिलाएं हैं, जिनका तलाक हो गया है और बहुत सी ऐसी महिलाएं भी हैं जिनके पति उन्हें छोड़कर चले गए हैं। ऐसी हालत में बच्चों की अच्छी परवरिश करना और उन्हें शिक्षा दिलाना आसान काम नहीं है।
आसान काम इसलिए नहीं है क्योंकि भारत जैसे पितृ सत्तात्मक समाज में महिलाओं को हर कदम पर पुरुष के नाम की जरूरत पड़ती है। शादी से पहले उसे पिता के नाम की जरूरत होती है और शादी के बाद पति का नाम उसके लिए अनिवार्य कर दिया जाता है लेकिन जिनके पिता नहीं हैं, पति नहीं हैं, वे महिलाएं कहां जाएं। क्या महिला का अपना वजूद ही उसके लिए काफी नहीं है। जो महिला जननी है, जो पुरुष को जन्म देकर इस दुनिया में लाती है, समाज ने उसे इतना बेबस और मजबूर क्यों बना दिया है, शायद इसलिए कि पुरुष महिलाओं की शक्ति को जानता है, पहचानता है। उसे डर है कि जिस दिन महिला अपने अस्तित्व को, अपनी शक्ति को जान जाएगी, पहचान जाएगी, उस दिन वह उसकी गुलामी से निकल जाएगी।
महिलाओं को बांधने के लिए उसने तरह-तरह के नियम-कायदे गढ़े और महिलाओं को उन्हें मानने पर मजबूर किया। इसके लिए उसने महिलाओं का भी सहारा लिया मगर अब वक्त बदल रहा है। महिलाओं ने खुद को समझना शुरू कर दिया है। वे अपने अस्तित्व को जानने लगी हैं, अपनी शक्ति को पहचानने लगी हैं। नतीतजन, समाज में बदलाव की हवा चलने लगी है। देश की सरकारें महिलाओं के हक में फैसले करने लगी हैं। इसकी ताजा मिसाल है विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा डिग्री पर पिता का नाम वैकल्पिक बनाने की दिशा में काम करना।
गौरतलब है कि पिछले महीने महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को पत्र लिखकर छात्रों के डिग्री प्रमाण पत्र पर पिता के नाम की अनिवार्यता संबंधी नियम में बदलाव का आग्रह किया था। अपने पत्र में उन्होंने लिखा था, मेरी मुलाकात ऐसी कई महिलाओं से हुई जो अपने पति को छोड़ चुकी हैं। ऐसी महिलाएं भारी कठिनाइयों का सामना कर रही हैं। उन्हें बच्चों का डिग्री प्रमाण पत्र लेने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। पिता के नाम के बगैर प्रमाण पत्र नहीं मिलता है।
उन्होंने यह भी लिखा था कि शादी का टूटना अथवा पति से अलग रहना आज के दौर की कटु सच्चाई है। लिहाजा हमें अकेली मां के दर्द को समझना होगा। उनकी समस्याओं का समाधान करने के लिए नियमों में बदलाव करना वक्त की मांग है। मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का कहना है कि छात्र अपनी इच्छा से माता या पिता के नाम का उल्लेख कर सकते हैं। हम इस विचार को पसंद करते हैं और हमें कोई आपत्ति नहीं है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के मशविरे पर मानव संसाधन विकास (एचआरडी) मंत्रालय की सैद्धांतिक सहमति के बाद यूजीसी यह कदम उठाएगा।
काबिले-गौर यह भी है कि पिछले साल मेनका गांधी की पहल पर विदेश मंत्रालय ने अपना पासपोर्ट आवेदन नियम बदल दिया था। मेनका गांधी ने अकेली मां प्रियंका गुप्ता की उस ऑनलाइन याचिका का संज्ञान लिया था जिसमें पासपोर्ट आवेदन पत्र से पिता के नाम की अनिवार्यता खत्म करने का अनुरोध किया गया था। इस संबंध में मेनका गांधी ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को पत्र लिखकर पासपोर्ट आवेदन पत्र पर पिता के नाम की अनिवार्यता खत्म करने का आग्रह किया था। इसके बाद विदेश मंत्रलय ने ऐलान किया था कि पासपोर्ट आवेदन पत्र में माता या पिता में से किसी एक का नाम होना चाहिए। दोनों के नाम की जरूरत नहीं है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि हमारे देश में महिलाओं की हालत अच्छी नहीं है। अच्छी इसलिए नहीं है क्योंकि आज भी उन्हें पुरुष से कमतर माना जाता है। उनके जन्म पर घर में मातम पसर जाता है जबकि लड़के के जन्म पर लड्डू बांटे जाते हैं। मंगल गीत गाए जाते हैं, उत्सव मनाए जाते हैं। यह बात अलग है कि उन्हें देवी मानकर पूजा जाता है। यही वह समाज है जो एक तरफ मंदिर में रखी देवी की प्रतिमा की पूजा भी करता है, वहीं दूसरी तरफ महिलाओं की कोख में कन्या भ्रूण की हत्या करता है। कभी कन्या भ्रूण की हत्या की जाती है तो कभी जन्म के बाद उसकी हत्या कर दी जाती है। कभी ससुराल में घर की लक्ष्मी मानी जाने वाली बहू को दहेज के लिए जिन्दा जला दिया जाता है।
इन सबके बीच अच्छी बात यह है कि अब महिलाओं ने अपने हक के लिए आवाज उठानी शुरू कर दी है। हालात बदलने लगे हैं। महिलाएं घर की चारदीवारी से बाहर आकर पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। सरकार भी महिलाओं के हक में लगातार अच्छे फैसले ले रही है जिससे उनकी जिन्दगी की मुश्किलें कम हो सकें।
हाल ही में सरकार ने नई राष्ट्रीय महिला नीति बनाने की भी बात कही है, जिसमें उन्हें कई अधिकार मिल जाएंगे। बहरहाल, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के फैसले से उन महिलाओं को बहुत राहत मिलेगी जो अकेले अपने बच्चों की परवरिश कर रही हैं। इससे उन बच्चों को भी फायदा होगा जिनके पिता उनके साथ नहीं हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार आगे भी महिलाओं के अच्छे फैसले करती रहेगी।
वैसे अकेली महिलाओं को अधिकार दिए जाने से ज्यादा जरूरी है कि हम उनका सम्मान करना सीखें। अगर समाज में महिलाओं के साथ होने वाले बुरे बर्ताव को खत्म कर दिया जाए और हमारी कथनी-करनी में कोई अंतर न रहे तो किसी भी महिला को अपने पिता या पति से अलग रहना ही नहीं पड़ेगा। इसके लिए जरूरी है कि हम अपनी सोच में बदलाव लाएं। देश में महिलाओं के सम्मान से रहने लायक माहौल बनाएं।
-फिरदौस खान

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