व्यंग्य को हास्य में उड़ा देने वाले युग को नमन

व्यंग्य को हास्य में उड़ा देने वाले युग को नमन

पिछले दशकों में हास्य और व्यंग्य एक नयी साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित हुआ है। व्यंग्य जहाँ गुदगुदाता है वहीं समाज को शिक्षा भी देता है। सम सामयिक घटनाओं पर भी व्यंग्यकार इस तरह लिखते हैं कि रचना पठनीय बन जाती है, कुछ संदेश देती है, कुछ तंज कसती है। समाज की कमजोरियों को उजागर करती है। जिस पर व्यंग्य किया जाता है वह तिलमिलाकर रह जाता है।
आदर्श स्थिति तो यह है कि इशारों इशारों में अपनी गलती समझकर उसे स्वयं में सुधार कर लेना चाहिये पर व्यंग्य को हास्य में उडा देने वाले युग को नमन। समाज में उन लोगों की चमड़ी बहुत मोटी होती जा रही है जिन पर व्यंग्य करने के लिये व्यंग्यकार विवश हो रहा है। वे उन पर कसी जा रही फब्तियों से बचने के लिये कुर्सी से चिपके रहने के लिये और अपना कालिख हुआ मुंह छिपाने के लिये नये नये कुतर्क ढ़ूंढ़ लेते हैं। बेशर्मी से अपनी गलतियां दूसरो पर थोप देते हैं। मान हानि के मुकदमों का सहारा लेकर स्वयं को साफ पाक बताने का भरसक यत्न करते दिखते हैं।
हास्य और व्यंग्य में एक सूक्ष्म अंतर है, जहां हास्य लोगों को गुदगुदाकर छोड़ देता है। वही व्यंग्य हमें सोचने पर विवश करता है। व्यंग्य के कटाक्ष हमें तिलमिलाकर रख देते हैं। व्यंग्य लेखक के संवेदनशील और करुण हृदय के असंतोष की प्रतिक्रिया के रूप में उत्पन्न होता है। शायद व्यंग्य , उन्ही तानों और कटाक्ष का साहित्यिक रचना स्वरूप है जिसके प्रयोग से सदियों से सासें नई बहू को अपने घर परिवार के संस्कार और नियम कायदे सिखाती आई हैं और नई नवेली बहू को अपने परिवार में घुलमिल जाने के हित चिंतन के लिये तात्कालिक रूप से बहू की नजरों में स्वयं बुरी कहलाने के लिये भी तैयार रहती हैं। व्यंग्य यथार्थ के अनुभव से ही पैदा होता है। इशारे से गलती करने वाले को उसकी गलती का अहसास दिलाकर सच को सच कहने का साहस ही व्यंग्यकार की ताकत है।
लक्षणा शक्ति में कही व्यंग्य की बातों के विपरीत हास्य का प्रयोजन विशुद्ध मनोरंजन होता है पर इधर देखने में आ रहा है कि शायद हास्य पर भी व्यंग्य करने की जरूरत आन पड़ी है क्योंकि मंचों पर और टेलीविजन के हास्य कार्यक्रमों में फूहड़ता, अश्लीलता, द्विअर्थी संवादों के सहारे लोगों को हंसाने के प्रयत्न चल रहे हैं। जातिगत व्यवहारों को हास्य का संसाधन बनाया जा रहा है। समाज के ढेर सारे सुप्रसिद्ध आईकान ऐसे मंचों पर सुशोभित होते दिखते हैं तो लगता है कि हास्य के इन फूहड़ कार्यक्रमों को जैसे सामाजिक मान्यता मिल चुकी है। मिमिक्री, पैरोडी, लतीफे, चुटकुले पुराने पड़ चुके लगते हैं। भांडपन, सस्तापन, अस्तरीय संभाषण इनका स्थान ले रहा है। मंचीय कवि सम्मेलनों में हास्य के नाम पर अतुकांत बेतुकी बातचीत को कविता के रूप में ऊ टपटांग हावभाव के साथ परोसा जा रहा है। स्त्री पुरुष संबंधों से लेकर नित्य कर्म की गतिविधियों सहित तमाम सामाजिक मर्यादाओं का खुला उल्लंघन इन आयोजनों में होता लगता है।
जो जितनी ज्यादा बेशर्मी से प्रस्तुति दे रहा है, लोग अपनी दबी हुई कुंठाओं को मुखर पाकर उसके लिये उतनी ही ज्यादा तालियां बजा रहे हैं। ऐसे समय में आज के हास्य और व्यंग्य के रचनाकारों व कलाकारों की जवाबदारी है कि हम रचना की शास्त्रीयता और उसकी शुचिता को बनाये रखने हेतु यत्न करें।
- विवेक रंजन श्रीवास्तव

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